शुक्रवार, 14 जून 2019

कौआ आज भी प्यासा है...

फोटो साभार : शटर स्टॉक.कॉम

विश्वत सेन

बुद्धिजीवी वह होता है, जिसकी बुद्धि जीवित हो। जिसे समाज के दर्द से दर्द हो और जो मर्दों में मर्द हो...
बाक़ी सब तो लाश हैं, पोस्टमार्टम हाउस की तलाश हैं...
चिल्लाने के लिए तो स्त्रियां भी चिल्लाती हैं...
हिजड़े, विधुर, विधवा, पति परित्यक्ता, पत्नी परित्यक्त, अरीपार, तड़ीपार आदि में वह दम कहां, जो चिंघाड़ सके...
चिंघाड़ते तो शेर हैं जंगलों में...
जिनकी पत्नी शेरनियों को ह्यूम पाइप में ले जाकर स्वानदत्त सहवास तक कर डालते हैं...
तलाश तो रामराज की थी, मगर ससुरा दुःशासनी राज आ गया...
अन्न का दोष है...
अन्न के दोष से भीष्म पितामह न्याय और अन्याय तथा पाप और पुण्य का फर्क नहीं कर पाये...
विदुर और विभीषण हर जाति, धर्म और समाज में होते हैं...
ताड़का, सूर्पनखा और सुरसा का जो फर्क जान न सका, समस्या का समाधान हनुमान जी लेकर आ गये....
मृत संजीवनी सुरा जब एक अंग्रेजी शराब के क्वाटर के बराबर नशा कर सकती है, तो अर्जुनारिष्ट और अशोकारिष्ट की दो-दो ठेपी तीन बार औरतें क्यों पीती हैं, यह छुपा है क्या....???
नशा तो नशा है साहिब, मगर कोई 495 हारकर भी नशे में है और कोई तीन सौ का झूठा आंकड़ा पार करने के बाद...
भारत दुनिया का सबसे बड़ा बाजार है और बाजार में जो दिखता है, वही बिकता है साहिब...
चाहे मिड टर्म अप्रेजल हो, सालाना अप्रेजल हो या फिर सैलरी करेक्शन हो...
काली मैया झखुरा पसार के रेवड़ी अपने अपनो को ही देगी...
तेल चाटने वाले कीड़े को तेलचट्टा कहते हैं और पत्तल उठाकर चाटकर फेंकने वाले को पत्तलचट्टकरफेंकवा कहते हैं...
गिरीश कर्नाड होने के लिए कलेजा में दम चाहिए...
हिम्मत और कलम चाहिए...
कलम तो मौत का फरमान लिखने वाले भी चलाते हैं और नरपिशाचों को बाइज्जत बरी करने वाले भी चलाते हैं...
कौआ आज भी प्यासा है...
वालमार्ट की जग गई आशा है...
अंबा, अंबानिके, अडानिके ही के राज हैं...
कंक्रीटों के जंगल में व्याप्त जंगलराज है...
कंक्रीटों के जंगल में व्याप्त जंगलराज है...

शनिवार, 25 मई 2019

अब आ रही है नेताओं के फन पटकने की बारी


विश्वत सेन

अक्सर हम अपनी दादी-नानी रे कहानी सुनते हैं, तो उन कहानियों मणिधारी सांप की कहानी जरूर होती है। इन कहानियों में अक्सरहां इस बात की चर्चा होती है कि कोई साहसी पुरुष मणिधारी नाग की मणि को साहस और तरकीब के बल पर हासिल कर लेता है। साहसी पुरुष के हाथ मणि लगते ही लगते ही जहरीला नाग अपना फण पटक-पटक के मर जाता है और फिर उसके मरने के बाद नागिन भी मणि हासिल करने वाले साहसी और तिकड़मी आदमी की दर पर अपना फन पटकना शुरू कर देती है, ताकि वह मणि को हासिल कर सके।
यह तो हुई दंतकथाओं की बात। अगर आप दुनिया के सबसे लोकतांत्रिक देश भारत को देखेंगे, तो हर पांच साल के देश साहसी और तिकड़मी राजनेता मतदाताओं से विजय रूपी मणि हासिल कर लेते हैं और फिर मतदाता अपनी मणि यानी अपना अधिकार और सुविधा रूपी मणि हासिल करने के लिए पूरे पांच साल तक तिकड़मी नेताओं की दर पर अपना फन पटकता रह जाता है। इनमें कई मतदाता फन पटकते-पटकते स्वर्ग सिधार जाते हैं, तो बाकी बचे मतदाताओं का फन पटकते-पटकते पांच साल गुजर जाता है। उधर, दूसरी ओर मतदाताओं से विजय रूपी मणि हासिल कर तिकड़मी और दुस्साहसी राजनेता पूरे पांच साल तक मनी पर मनी यानी नोटों की इमारत खड़ी करने के साथ पूरे ऐशो-आराम की जिंदगी बसर करते हैं। इन पांच सालों में वे इतना धन एकत्र कर लेते हैं कि उससे उनका जीवन ही नहीं, बल्कि आल-औलादों की जिंदगी भी पूरी मस्ती से कटने लग जाती है।
मगर, अब यह राजनेताओं का तिकड़म और दुस्साहस किम्वदंती बनने के कगार पर पहुंच रहा है। अब फन मतदाता नहीं पटकेंगे, बल्कि कुछेक साल में वे खुद विजय रूपी मणि हासिल करने के लिए फन पटकते नजर आएंगे। आप कहेंगे कैसे? तो इसका जवाब है कि नोटा यानी इनमें से कोई नहीं का विकल्प है न!
जी हां, इन राजनेताओं के प्रति गुस्सा प्रकट करने और इन्हें खारिज करने के लिए मतदाताओं के पास सशक्त विकल्प 'नोटा' है, जिसका इस्तेमाल अब बड़े पैमाने पर होने लगा है। अभी हाल में संपन्न हुए 2019 के लोकसभा चुनाव की बात करें, तो इसमें भाजपा और राजग के घटक दलों को भले ही प्रचंड बहुमत मिला हो, मगर 'नोटा' ने भी जबरदस्त असर दिखाया है। इस चुनाव में कुल 65,85,823 मतजाताओं ने नोटा का इस्तेमाल कर देश के राजनीतिक दलों के प्रति गुस्से का इजहार किया है, जो 2014 के चुनाव से 5,85,823 नोटा मत अधिक है। 2014 के चुनाव में कुल 60 लाख मतदाताओं ने नोटा का इस्तेमाल कर राजनेताओं को खारिज किया था।
गौर करने वाली बात यह भी है कि देश में भाजपा या राजग शासित राज्यों के मतदाताओं ने जबरदस्त तरीके से नोटा का इस्तेमाल कर नेताओं को मणि हासिल करने के लिए फन पटकने पर मजबूर किया है। इन राज्यों में सुशासनी बाबू का राज्य बिहार करीब 8,17,139 नोटा मत के साथ पहले पायदान पर है। वहीं, पीएम मोदी के परम भक्त योगी आदित्यनाथ का राज्य उत्तर प्रदेश 7,25,079 नोटा मत हासिल करके दूसरे पायदान पर है। इन राज्यों के अलावा, बंगाली बाला ममता बनर्जी का बंगाल 5,46,778 नोटा मत के साथ तीसरे, अम्मा की चरणपादुका रखकर शासन करने वाला राज्य तमिलनाडु 5,41,250 नोटा मत के साथ चौथे स्थान पर, रोड मंत्री नितिन गडकरी का राज्य महाराष्ट्र 4,88,766 नोटा मत के साथ पांचवें स्थान पर, महाठगबंधन के जुगाड़ में राजनीतिक दरों पर फन पटकने वाले चंद्र बाबू नायडू का आंध्र प्रदेश 4,69,863 नोटा मत के साथ छठे स्थान पर, प्रधानमंत्री नरेंद्र दामोदर भाई मोदी का मॉडल राज्य गुजरात 4,00,941 नोटा मत के साथ सातवें स्थान पर, कांग्रेसी कमल के नाथ वाला राज्य मध्यप्रदेश 3,40,984 नोटा मत के साथ आठवें स्थान पर, राजा-रजवाड़ों का राज्य राजस्थान 3,27,569 नोटा मत के साथ नौवें स्थान पर और माइंड ब्लोइंग राजनीति करने नवीन पटनायक का राज्य ओड़िशा 3,10,824 नोटा मतों के साथ 10वें स्थान पर है।
इन राज्यों के अलावा कर्नाटक में 2,50,810, छत्तीसगढ़ में 1,96,265, तेलंगाना में 1,90,798, झारखंड में 1,89,367, असम में, 1,78,335, पंजाब में 1,54,423, दिल्ली में 1,03,996, और केरल में 1,03,596 नोटा मत पड़े। सबसे कम लक्षद्वीप में 125 नोटा मतों का इस्तेमाल किया गया।
हालांकि, देश में नोटा के इस्तेमाल की यह स्थिति तब है, जब निर्वाचन आयोग और राज्यों के प्रशासन द्वारा उसे हतोत्साहित करने का अभियान तक चलाया गया, मगर साहिब उन मतदाताओं का क्या करेंगे, जिनके मन राजनेताओं के प्रति नाराजगी और गुस्सा है। यह इस बात का संकेत है कि निकट भविष्य में दुस्साहसी और तिकड़मी नेताओं को नोटा के आगे अपना फन पटकना ही पड़ेगा।
बामुलाहिजा होशियार!

गुरुवार, 23 मई 2019

रुको, रुको, रुको...इक नया पैमाना आया है...

विश्वत सेन
आज यानी 23 मई 2019 को 17वीं लोकसभा के लिए हुए चुनाव का समापन हो गया। एक्जिट पोल सर्वे और भाजपा व एनडीए के सहयोगी दलों के मुताबिक भाजपा और उसके सहयोगी दलों को 2014 के आम चुनाव की तुलना से कहीं अधिक प्रचंड बहमत मिला है, मगर रुको, रुको, रुको....। मतगणना शुरु होने के बाद से लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संबोधन तक के दरम्यान मुझे एक नया पैमाना मिला है।
अब आप पूछेंगे कि भई, वह नया पैमाना आखिर है क्या?
मेरा उत्तर होगा कि आप जरा 2009 से लेकर 2014 तक यूपीए-दो के शासनकाल में गरीबी का पैमाना तय करने वाली दरों पर गौर करें। 2014 के पहले तक देश में योजना आयोग नाम की एक संस्था थी, जिसका पदेन अध्यक्ष देश का प्रधानमंत्री होता था। 2014 में मोदी सरकार आयी, तो योजना आयोग भंग हो गया और उसकी जगह पर नीति आयोग हो गया, जिसका पदेन अध्यक्ष अब भी प्रधानमंत्री ही होता है। यूपीए-दो के योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह अहलूवालिया थे, जो देश में व्याप्त गरीबी का पैमाना शहर और गांव में एक दिन में एक परिवार के एक व्यक्ति के भोजन पर खर्च होने वाली रकम के आधार पर तय करवाते थे। इन पैमानाकारों में अहलूवालिया के अलावा तत्कालिन ज्ञान आयोग के अध्यक्ष और वर्तमान में अखिल भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष सैम पित्रोदा, एक-दो दक्षिण भारतीय अर्थशास्त्री और समाजवादी पार्टी छोड़कर कांग्रेस में आये नये-नवेले राजनेता बनाम अभिनेता राज बब्बर हुआ करते थे।
खैर, जबसे देश में श्रीमान नरेंद्र दामोदर भाई मोदी का शासन आया, तो कांग्रेस समेत तमाम विपक्षी दल मटियामेट होने लगे। 23 मई, 2019 को 17वीं लोकसभा के लिए हुए चुनाव की मतगणना का दिन था, जिसमें भाजपा समेत राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन को प्रचंड बहुमत मिला। इस प्रचंड बहुमत के लिए पीएम मोदी, उनकी आईटी सेल और खासकर भारत के निर्वाचन आयोग को बहुत-बहुत बधाई।
दोबारा प्रचंड बहुमत मिलने के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जीत की बधाई अपनी पार्टी के कार्यकर्ताओं को देने के लिए नयी दिल्ली स्थित भाजपा मुख्यालय में पहुंचे और उन्होंने जो भाषण दिया, उसमें से एक बात मेरे दिमाग में क्लिक कर गयी और वह यह कि उन्होंने कहा कि "अब इस देश में कोई जाति नहीं है। बस, दो ही जाति है। एक गरीब और दूसरी वह जो गरीबों के विकास में अपना सहयोग देती है।"
मित्रों, यही वह नया पैमाना है। सदियों से इस देश में ही नहीं पूरी दुनिया में आर्थिक मजबूती का मूल्यांकन "अमीरी और गरीबी" से किया जाता है या किया जाता रहा है। पीएम मोदी की इस अवधारणा ने गरीबों के पैमाने या हैसियत की लकीर खींच तो दी, लेकिन इसने अमीरों की हैवानियत, लूट, मुनाफाखोरी, क्रोनी कैपिटलिज्म, विजय माल्या, नीरव मोदी, ललित मोदी, मेहुल चौकसी, अडानी, अंबानी जैसे धनाढ्यों की करतूतों पर पर्दा डाल दिया। उनका यह बयान इस ओर साफ इशारा करता है कि मोदी ने अमीरों या यूं कहें कि बड़े कारपोरेट घरानों के बूते 2014 में जिस सत्ता को हासिल किये थे, 2024 तक उन्हीं देश के बड़े कारपोरेट घरानों के लिए काम करते रहेंगे और उनकी हर गलती को क्लीनचिट देते रहेंगे; तो यह अतिशयोक्ति नहीं होगी। अनेकता में एकता और बहुजाति प्रथा वाले देश में यदि केवल दो ही जाति (एक गरीब और दूसरी गरीबों के उत्थान में सहयोग करने वाली) को परिभाषित किया जा रहा हो, तो यह चिंता का विषय जरूर है।

शनिवार, 7 जुलाई 2018

मीडिया भी 'अमीर और गरीब' हो गया (विरासत के झरोखे से...भाग-दौड़-10)

विश्वत सेन

हमारा देश भारत आम तौर पर विकासशील देश या फिर गरीबों वाला देश कहा जाता है। कहा जाना भी वाजिब है, क्योंकि यहां की अर्थव्यवस्था में चंद मुट्ठी भर करीब दो फीसदी के आसपास ऐसे लोग हैं, जिनके पास देश की आधी से अधिक संपत्ति है। बाकी के 98 फीसदी लोगों के पास 50 फीसदी। 
हमारे देश में जहां कहीं भी अव्यवस्था या गरीबों और मजलूमों के साथ अन्याय की घटना सामने आती थी, तो यहां की मीडिया शासन-प्रशासन की नाक में दम कर देता था, लेकिन अब शासन और प्रशासन के साथ-साथ मीडिया भी गरीबों और मजलूमों से विमुख हो गया है। चाहे वह सरकार में शामिल राजनेता हो या फिर गली-कूचे का छुटभैय्या नेता, लालफीताशाही में अहम किरदार निभाने वाला बड़ा वाला आईएएस ऑफिसर हो या फिर हजारीबाग के बंदोबस्त कार्यालय में काम करने वाला कोई कर्मचारी, सबको हर जगह हरियाली ही हरियाली दिखाई दे रही है और इन्हीं लोगों के साथ मीडिया के लोगों को भी हरियाली दिखायी दे रही है। खासकर, भोंपू मीडिया और बुद्धू बक्सा के लोगों को तो और भी अधिक हरियाली दिखाई दे रही है, क्योंकि उन्हें सत्ता की सरपरस्ती हासिल है। इसीलिए उन्हें अपने-अपने बक्सों पर राजनेताओं के पैनल के साथ राष्ट्रवाद, फ्रॉडवाद, रेप, गैंगरेप, धोखाधड़ी, बाबागिरी आदि मुद्दों पर बहस करने से फुर्सत ही नहीं होती। अब कोई यह नहीं दिखाता या फिर छापता है कि आज फलाने स्थान पर फलाने अधिकारी ने फलाने गरीब के साथ अनर्थ किया और मजलूम की रोटी को रिश्वत में बदलकर अपनी जेब में रख लिया।
आजकल मीडिया यह दिखाने और छापने में मशगूल है कि फलाना नेता पर फलानी जांच एजेंसी ने कार्रवाई की और फलाने को जेल भेज दिया। यह इसलिए भी उसके लिए जरूरी हो जाता है, क्योंकि ऐसा करने के लिए उसे उसके आका की ओर से निर्देश दिया जाता है। फिजां में फूल खिला है, तो धरती लाल होगी ही। यह फूल पलाश का नहीं है कि उसके इर्द-गिर्द भौंरे या मधुमक्खियां टहलेंगे और उसके पराग से मधु या शहद बनाकर सूखी धरती पर मिठास फैलायेंगे। यह फूल कमल का कंटीला फूल है, जिसमें से पराग लेने के लिए भौंरे जाते हैं और उसका पराग भी चूसते हैं, मगर सही मायने में शहद बनाने वाली मधुमक्खियां दूर ही रहती हैं। शायद इसीलिए इस फूल की पंखुड़ियां कोमल न होकर तलवार के सरीखे धारदार हो गयी हैं और वहशियों के लिए हथियार बन गयी हैं। शायद यही कारण है कि देश का मीडिया भी तलवार सरीखे हो गयी इन पंखुड़ियों के भय से दीन-हीन गरीबों और मजलूमों से  विमुख होकर अमीरी-अमीरी का खेल खेल रहा है। अलबत्ता, कमजोर आदमी की सुंदर बहू की तरह कुछ दबे-कुचले टाइप के मीडिया के धड़े हैं, जो अपनी पत्रकारिता के धर्म का निर्वहन करते हुए गरीबों और मजलूमों का अब भी साथ दे रहे हैं। मगर, उनकी दशा भी दयनीय हो गयी है या दयनीय करने का प्रशासकीय प्रयास किया जा रहा है, ताकि वह शासकीय सकारात्मकता को परोसकर वाहवाही के पात्र बन सकें।
मगर, इन सबके बीच सबसे बड़ा सवाल यह पैदा होता है कि मीडिया के अमीरी और गरीबी का यह खेल कितना दिन तक चलेगा? आज सामाजिक विकृतियों को जन्म देने वाले सत्तासीन है, तो इनकी पांचों उंगलियां घी में नजर आ रही हैं। कल यह तलवार की धार वाले फूल की पंखुड़ियां मुरझा जाएंगी, तब क्या होगा? क्या कभी किसी ने इस बारे में कुछ सोचा है?

अंतिम कड़ी

शनिवार, 3 मार्च 2018

यह 'जोर' खतरनाक है

विश्वत सेन
आज त्रिपुरा में ढाई दशक पुरानी वामदल की 'मानिक' सरकार ध्वस्त हो गयी। आज के करीब पांच साल पहले बंगाल में भी ज्योति बसु का राजनीति से संन्यास लेने के बाद बनी बुद्धदेव सरकार भी ध्वस्त हो गयी थी। दोनों सरकारों की सरकार के अवसान में एक ही समानता है और वह हिंसा है। तब महीनों तक राजनीतिक जुगलबंदी से महीनों तक सिंगूर जला था, आज दार्जिलिंग समेत पूरा देश जल रहा है।
आज देश में हर काम जोर-जबरदस्ती किया जा रहा है या कराया जा रहा है। राजनीति में दक्षिण पंथ जोर-जबरदस्ती कर रहा है, तो सार्वजनिक और निजी क्षेत्र के संस्थानों में पेबस्त समर्थक। हर जगह लोग-बाग मनमानी के शिकार हैं। प्रत्यक्ष रूप से गैर-भाजपा दलों के नेताओं को जबरिया भाजपा या एनडीए के घटक दल बनने पर मजबूर किया जा रहा है या नहीं मानने पर उन्हेंं विभिन्न आरोपों में 'भितराया' जा रहा है।
सरकारी और निजी प्रतिष्ठानों में गैर-भाजपा सोच रखने वाले कामगारों को या तो धकियाया जा रहा है या फिर ऐसा माहौल बनाया जा रहा है कि आत्मसम्मानी जिल्लत और जलालत की नौकरी को रात मार दे।
देश में इस समय यह जो 'जोर-जबरदस्ती' किया जा रहा है, उसका एकमात्र कारण देश के लोगों का माइंडवाश करना है। जो उनकी बात मान गये, वे भी प्रताड़ना के शिकार और जो नहीं मानने रहे, वे प्रताड़ित तो किये ही जा रहे हैं। जो लोग प्रताड़ना के भय से कायराना अंदाज में तोहफा कबूल करवा रहे हैं, उनसे यह सोचकर बदला लिया जा रहा है कि तुम और तुम्हारे पूर्वजों ने हमें सत्ता से दूर रखा। अब हम तुम्हें अपने पास रखकर समुचित सुविधा से भी दूर रखेंगे।
आज यही वजह है कि जितनी श्रमशक्ति को हर साल देश में रोजगार दिया नहीं जा रहा, उससे कहीं ज्यादा नौकरी-पेशा लोग बेरोजगार होने के कगार पर हैं या बेरोजगार हो गये हैं। देसी-विदेशी सर्वेक्षण एजेंसियां हर साल पैदा होने वाली नयी श्रमशक्ति के आंकड़ों को तो पेश करती हैं, मगर बिरली एजेंसी ही ऐसी है, जो 40-45,  46-50, 51-55 और 56-60 आयु वर्ग के बीच नौकरी गंवाने वालों की रिपोर्ट पेश करती हो।
चौंकाने वाली बात यह भी है कि बीते चार सालों के दौरान 40-60 आयु वर्ग के कामगारों का रोजगार या तो समर्थक अधिकारियों की वजह से जा रही है या फिर मजबूरन उन्हें छोड़ना पड़ रहा है। देश में यह जो एक अलग तरह की बेरोजगारी पैदा हो रही है, वह नवसृजित श्रमशक्ति की बेरोजगारी से भी अधिक खतरनाक है।
नवसृजित श्रमशक्ति में एक युवक को रोजगार की दरकार रहती है, मगर बरसों से कार्यरत कामगारों के पीछे परिवार के अनेक सदस्यों की फौज रहती है, जिसमें नवसृजित श्रमशक्ति भी शामिल होती है। ऐसे में, जरा गौर कीजिए कि आज देश में जो 'जोर-जबरदस्ती का खेल चल रहा है, वह राजनीति के लिए ही नहीं, आम अवाम के लिए भी ख़तरनाक है।

बुधवार, 21 फ़रवरी 2018

'फार्ट अटैक' करना भी एक कला है...(विरासत के झरोखे से...भाग-नौ)

विश्वत सेन

बात 1990 के दशक की है। गर्मी का मौसम था और शाम का समय। वहीं करीब पांच बजे रहा होगा। हम बच्चे घर के पास महुआ के पेड़ के नीचे बैठ घटिया रहे थे। साथी खिलाड़ियों का इंतजार था कि आएं, तो घर के सामने वाले फील्ड में फुटबॉल खेलना जाए। उधर, बाबा घर के सामने खटिया बिछाकर किसी की जन्म कुंडली बना रहे थे। उनकी खाट के नीचे हमारा 'कारा' कुत्ता बैठा था। बाबा का कुत्तों से बैर रहता, मगर कारा खासकर उनकी खाट के नीचे ही बैठता। खैर, हम बच्चे बात कर ही रहे थे कि अचानक बम फटने जैसी धड़ाम की आवाज हुई और इस आवाज के साथ ही बाबा की खाट के नीचे बैठा कारा जोर से भौंकते हुए निकला और फील्ड का पता नहीं कितना चक्कर लगा गया। उधर, हम बच्चों को हंसते-हंसते पेट में बल पड़ गया, मगर हंसी थमने का नाम न ले। हालांकि, हमें थे कि बाबा जोर का फार्ट मारते हैं, मगर हंसी कारें की हालत देखकर आ रही थी। उस बेचारे को लाख पुकारें मगर न चुप होने का नाम ले और न रुकने का और बार-बार बाबा की ही ओर मुंह करके भौंके। इसकी परिणति यह हुई कि बाबा अगर दुरा पर बैठ जाएं, तो कारा फील्ड में चला जाए बाबा उसे कभी-कभार प्यार से बुलाएं भी, तो वह उनके पास सटता ही नहीं।
अच्छा, ऐसा भी नहीं था कि बाबा एकांत में फार्ट मारते, जब वह निकलने को होता, तो मार देते। वे उसे अपानवायु कहते। उनके पास मारने की कला भी थी। अगर वे राह में चल रहे होते और फार्ट जोर मार गया, तो धोती पकड़कर 'चुर-चुर, चुर-चुर' करते हुए कुछ दूर चले जाते। खंड़ाऊ की आवाज के साथ फार्ट की आवाज एक अलग आवाज बनाती।
बात फार्ट की है, तो यह जान लेना भी जरूरी है कि उसे निकालना भी बहुत जरूरी है। फार्ट निकालना जीवन का सामान्य प्रक्रिया है, कई बार अगर तेज आवाज के साथ फार्ट निकल जाए तो शर्मिंदगी महसूस होती है। 
एक रिसर्च के मुताबिक, इसमें शर्मिंदगी की कोई बात नहीं बल्कि यह आपके पाचनतंत्र के स्वस्थ होने का संकेत है। पेट के अंदर गैस बनने से हवा निकलती है और हमेशा हवा छोड़ते समय आवाज नहीं होती या दुर्गंध नहीं फैलती है।
एक व्यक्ति औसत रूप से दिन में 14 बार हवा छोड़ता है। ज्यादातर समय हवा बगैर आवाज के बाहर निकलती है और ऐसे में ज्यादातर कार्बन डाइ ऑक्साइड गैस निकलती है। जब तेज गंध के साथ हवा निकलती है तो यह इस बात का संकेत है कि आपको फाइबर लेवल सही मिल रहा है और आपकी आंत में पर्याप्त संख्या में अच्छे बैक्टीरिया हैं। आपकी गैस से बहुत ही असहनीय गंध आती है तो इसका मतलब यह नहीं कि आप अस्वस्थ हैं। इसके उलट इसका मतलब यह है कि आप ऐसी चीजें खा रहे हैं, जिससे हाइड्रोजन सल्फाइड गैस काफी मात्रा में पैदा हो रही है। साथ ही इसका यह मतलब भी है आप हाई फाइबर वाली डायट ले रहे हैं। गैस से गंध निकलना उस समय चिंताजनक हो सकता है जब आप डेयरी उत्पाद का ज्यादा इस्तेमाल कर रहे हैं।
हायर पर्सपेक्टिव नाम की पत्रिका के मुताबिक, फार्ट (हवा छोड़ना) में गंध मुख्य रूप से हाइड्रोजन सल्फाइड के कारण आती है। हम कई तरह के खाने खाते हैं जिनके पचने के बाद कम्पाउंड्स यानी हाइड्रोजन सल्फाइड बनती है। इससे कई तरह की गंध पैदा होती है जो गैस के साथ बाहर निकलती है। जब फार्ट में तेज गंध हो तो यह इस बात का मजबूत संकेत है कि आपके पेट में सब कुछ ठीक है।
कई स्टडी में यह बात सामने आई है कि गैस सूंधने वाले लोगों को भी फायदा होता है। मेथेन की गंध बीमारियों के खतरे को कम कर देती है और लोगों को लम्बे समय तक जिंदा रहने में मदद करती है। इस गंध से सही होने वाली एक बीमारी डिमेंशा है। हाइड्रोजन सल्फाइड इस बीमारी में जिस तरह एंजाइम काम करते हैं, उस तरीके को बदल देती है।
हालांकि आपको इस बात को लेकर सचेत रहना है कि कहां गैस छोड़ी जाए लेकिन गैस से डरने की जरूरत नहीं है। अगर उसमें गंध है तो इसका मतलब आप अच्छा काम कर रहे हैं।

जारी....

मंगलवार, 20 फ़रवरी 2018

झोले वाला किरोड़ीमल (विरासत के झरोखे से...भाग-आठ)

विश्वत सेन

सदी के महानायक श्री अमिताभ बच्चन। वे फिल्म बनाने के शौकीन और हम देखने के। अच्छा लगता, उनकी फिल्म देखकर। कुछ सीखने को मिलता। उनकी फिल्मों में एक चीज कामन थी और वह थी किरोड़ीमल या फिर सेठ किरोड़ीमल। यह किरोड़ीमल फिल्म में सिक्वेंस के हिसाब पटकथा लेखक डालते थे या फिर दर्शकों के बीच रोचकता पैदा करने के लिए महानायक किरोड़ीमल वाला एकाध सीन पेबस्त कराते, इसका मुझे पता नहीं। इसे वही जानें। हमने तो देखा, उसी को फिल्म की ब्यूटी मानी। अब जैसे फिल्म जादूगर को ही ले लें। पूरा एक सीन किरोड़ीमल पर पेबस्त है।
 खैर, फिल्म है। देखा, मनोरंजन और बात खत्म। मगर, बाद के बरसों में जानने-समझने का मौका मिला तो समझा, 'हो सकता है दिल्ली के किरोड़ीमल कॉलेज से उनका नाता रहा है, इसलिए एक काल्पनिक किरदार के तौर पर उसे पेश किया गया। वैसे, फिल्मों के लिए किरोड़ीमल टाइप के सेठों के किरदार आम तौर पर काफी प्रचलित रहा है। इस लिहाज से भी हमने इस चिरजीवि पात्र पर ज्यादा माथा-पच्ची नहीं की। भाई फिल्म है, उसे मनोरंजन के तरीके से दो। अब यह थोड़े पता था कि 20वीं सदी के फ़िल्मों का यह चिरजीवि किरदार 21वीं सदी तक अपने आपको फिल्मी पर्दे से निकालकर आम जनजीवन में इतनी गहरी पैठ बना लेगा? ये बात अब समझ में आ रही है कि सदी के महानायक श्री अमिताभ बच्चन और उनके पहले के फिल्मकारों ने किरोड़ीमल को जीवंत क्यों बनाए रखा था।
एक बात और। वह यह कि हमारे यहां भारत में झोला का बहुत अधिक महत्व है। दुनिया मंगल पर जाने की सोच रही है, मगर आज भी भारत में एक कहावत सरेआम सार्वजनिक तौर पर प्रचलित है, "मेरा क्या, मैं तो ठहरा फक्कड़। झोला उठाऊंगा और चल दूंगा।"
ये झोला और किरोड़ीमल वाला फंडा मुझे बीते चार-पांच दिनों से बखूबी तब और समझ में आने लगा है, जब एक महाघोटाले का उद्भेदन हुआ है। मैं इस पचड़े में नहीं पड़ना चाहता कि उसके राजनीतिक निहितार्थ क्या हैं, मगर यह जरूर समझ में आ गया कि बैंकों का हजारों करोड़ रुपयों का कर्ज डालकर विदेश भागने वाले वहीं तो झोले वाले किरोड़ीमल हैं, जिनका अक्स अक्सर फ़िल्मों में उकेरा गया है। यह बात दीगर है कि संदर्भों में बदलाव आया है, मगर चरित्र तो हू-ब-हू वहीं है।
आपने, हमने सबने देखा है कि फिल्मों के किरोड़ीमल जनता के पैसों पर एशो-आराम का साम्राज्य खड़ा करते हैं और जब भेद खुल जाता है या खुलने लगता है, तो झोला उठाकर विदेश भाग जाते हैं या फिर भागने की तैयारी कर रहे होते हैं। अब सवाल यह पैदा होता है कि क्या सरकार इन झोले वाले किरोड़ीमलों को फिल्मों के नायकों की तरह पकड़ेगी या फिर...?

जारी...

सोमवार, 19 फ़रवरी 2018

"मुर्गा भौंकता है" (विरासत के झरोखे से...भाग-सात)

विश्वत सेन

"मुर्गा भौंकता है।" है न अचरज की बात! यह वाक्य पढ़कर आप कहेंगे कि आपसे होली के मौसम में ठिठोली की जा रही है, मगर आप इसे होली की ठिठोली न समझें। यह हकीकत है। प्राकृतिक तौर पर तो कुत्ता भौंकता है, मगर दुनिया में लोग मुर्गे को भी भौंका रहे हैं; जैसे भारत में पेपरलेस इकोनॉमी के लिए 'अनहोनी को होनी और होनी को अनहोनी' में तब्दील किया जा रहा है।

मुर्गे का भौंकना भी नेचुरली हैरान करने वाली बात है, मगर मलेशिया की सरकार ने इसे सच कर दिखाया है। मलेशिया भारत का मित्र राष्ट्र है और सत्तासीन होने के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र दामोदर भाई मोदी मलेशिया का दौरा भी कर चुके हैं। जाहिर सी बात है, 'दुनिया का विश्वगुरु बनने के लिए प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व वाली सरकार अननेचुरल को प्रैक्टिकल बनाने के लिए भगीरथ प्रयास कर सकती है, तो भला मलेशिया पीछे क्यों रहे। सो, उसने 'मुर्गे को भौंकाने का भगीरथ प्रयास' कर दिया। आखिर भारत का मित्र है और हर मित्र अपने अनन्य का अनुकरण करता ही है और करना चाहिए।

दरअसल, वाकिया यह है कि मलेशिया सरकार ने लूनर न्यू ईयर को सेलिब्रेट करने के लिए पूरे पन्ने का एक विज्ञापन प्रकाशित करवाया है। इस विज्ञापन में मुर्गे को भौंकते हुए दिखाया गया है। इसका कारण यह है कि चीनी राशि चक्र में 12 साल का एक चक्र माना जाता है। इसमें हर साल को एक जानवर के रूप में दर्शाया जाता है। इस हिसाब से मलेशिया में चीनी राशि चक्र के अनुसार रूस्टर ईयर यानी मुर्गे वाला साल अभी हाल ही में खत्म हुआ है। अब डॉग ईयर शुरू हुआ है। मलेशिया सरकार के वाणिज्य मंत्रालय ने विज्ञापन के माध्यम से डाग ईयर की शुभकामनाएं दी, मगर इस विज्ञापन में मुर्गे को चीनी भाषा में कुत्ते की तरह भौंकता हुआ दर्शाया गया है यानी दो जैविक प्रजातियों के नेचुरल कार्य-व्यवहार का घालमेल। जैसे भारत में इस समय हिंदू धर्म के नाम पर घालमेल किया जा रहा है। आर्य संस्कृति के सनातन धर्म को जबरन हिंदू धर्म बनाया जा रहा है।

खैर, मलेशिया सरकार के वाणिज्य मंत्रालय ने विज्ञापन के जरिए घालमेल तैयार कर तो दिया, मगर इस विज्ञापन के बाद उसे आलोचना का भी शिकार होना पड़ा। आनन फानन में वाणिज्य मंत्रालय इसे तकनीकी त्रुटि बताकर माफी भी मांग लिया, मगर तब तक बहुत देर हो चुकी थी। डिजिटाइजेशन के इस युग में जहां व्हाट्सएप जैसे महाज्ञानियों की यूनिवर्सिटी संचालित हो रही हो, तो भला #मिर्च_मुसल्लम के साथ यह ज्ञान प्रसारित न हो, यह संभव नहीं। सो, मुर्गे के भौंकने वाला ज्ञान भी सोशल मीडिया पर वायरल हो गया और अब भारतीय अखबारों की सुर्खियां बन गया। मुर्गे को भौंकने वाली यह खबर सहूलियत के हिसाब से प्रकाशित की जा रही है और लोगों द्वारा नमक, मिर्च मसाले के साथ इसका मजा भी लिया जा रहा है। मैंने भी सहूलियत के हिसाब से आपके लिए परोसा है, आप भी मजे लें।

जारी...

सोमवार, 12 फ़रवरी 2018

देश ही नहीं, विदेशों में भी हिंदी का 'हवा महल' बना रहा रेडियो (विरासत के झरोखे से...भाग-छह)

विश्वत सेन

1924 में जब मद्रास प्रेसीडेंसी क्लब ने भारत में स्थापना की थी, तब उसके संस्थापकों को यह गुमान भी नहीं होगा कि यह रेडियो एक दिन भारत ही नहीं, दुनिया के कई देशों में हिंदी का 'हवा महल' तैयार कर देगा। जी हां, आप सौ फीसदी सही पढ़ रहे हैं। भारत में रेडियो की स्थापना आज से करीब 194 साल पहले 1924 में हुई थी। इसकी शुरुआत मद्रास प्रेसीडेंसी क्लब ने की थी। स्थापना के तीन साल बाद तक इस क्लब ने रेडियो से प्रसारण का काम किया, मगर आर्थिक तंगी के कारण इसका प्रसारण बंद कर दिया गया।

मद्रास प्रेसीडेंसी क्लब का रेडियो प्रसारण बंद होने के बाद 1927 में ही तब के बांबे और आज की मुंबई के कुछ व्यापारियों ने कलकत्ता और मुंबई से भारतीय प्रसारण कंपनी (Indian Broadcasting Company) की स्थापना कर रेडियो पर कार्यक्रमों का प्रसारण शुरू किया। यह कंपनी भी 1930 के आते-आते रेडियो कार्यक्रम के प्रसारण में विफल साबित हुई। इसके दो साल बाद भारत में शासन कर रही अंग्रेजी हुकूमत ने रेडियो कार्यक्रमों का प्रसारण करने का जिम्मा अपने हाथों में ले लिया। उसने अलग से एक प्रसारण विभाग स्थापित कर भारतीय प्रसारण सेवा की शुरुआत की, जिसका 1936 में नाम बदलकर All India Radio कर दिया गया। इसे संचार विभाग देखा करता था। देश जब आजाद हुआ और आजाद भारत की नमी सरकार पर रेडियो के प्रसारण का भार पड़ा, तो 1957 में इसका नाम "आकाशवाणी" रखा गया। आकाशवाणी को संचालित करने का प्रसारण एवं सूचना मंत्रालय को सौंपा गया।

देश आजाद होने तक यानी 1947 तक देश में रेडियो के कुल छह स्टेशन ही हुआ करते थे। 1990 का दशक आते-आते पूरे देश में करीब 146 एएम रेडियो स्टेशन खोले जा चुके थे, जिनसे हिंदी और अंग्रेजी के अलावा अन्य क्षेत्रीय भाषाओं में समाचारों और कार्यक्रमों का प्रसारण किया जाता था। 1990 के मध्य तक 31 नरेंद्र एएम और एफ एम स्टेशनों की स्थापना की जा चुकी थी। 1994 में देश के लोगों को आपस में जोड़ने के लिए करीब 85 FM और 73 वेब स्टेशनों की स्थापना की गई।

बात जब रेडियो की हो और उसमें विविध भारती की चर्चा न हो, तो बेमानी ही होगी। जी हां, वहीं अमीन चाचा यानी अमीन सयानी वाला विविध भारती, जिनकी आवाज का जादू आज भी रेडियो सुनने वालों के सिर चढ़कर बोलता है। इस विविध भारती की स्थापना 1967 में विज्ञापन सेवा प्रभाग द्वारा की गयी।

विविध भारती आकाशवाणी या All India Radio की सबसे अच्छी सेवाओं में एक थी। विविध भारती का 'हवा महल' और 'सैनिक भाइयों के लिए गीत-संगीत का कार्यक्रम सबसे ज्यादा लोकप्रिय है।

देश के अलावा विदेशों में भी All India Radio या अन्य रेडियो स्टेशनों के माध्यम से हिंदी एवं अन्य भारतीय भाषाओं का प्रसारण किया जाता है। कहा जाता है कि 1 अक्टूबर, 1939 को ब्रिटिश हुकूमत ने अफगानिस्तान के निवासियों पर निर्देशित कार्यक्रम नाजियों के दुष्प्रचार के मुकाबले के लिए किया था। उस समय ऐसे कार्यक्रमों का प्रसारण 16 विदेशी और 11 भारतीय भाषाओं में किया गया था।

खैर, जहां तक भारतीय रेडियो का विदेशों में प्रसारण की बात है, तो 1994 में भारत सरकार ने विदेशों में हिंदी समेत अन्य भारतीय भाषाओं के श्रोताओं के लिए 70 घंटे की खबरें और मनोरंजक कार्यक्रमों के प्रसारण की शुरुआत की। यह प्रसारण 32 साफ्टवेयर ट्रांसमीटर ओर हाई पावर शार्ट वेब बैंड के माध्यम से किया जाता था। आज आलम यह है कि दुनिया के कई प्रमुख देशों में रेडियो के जरिए हिंदी कार्यक्रमों का प्रसारण किया जा रहा है।

इन देशों में रेडियो पर है हिंदी की धूम
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मारीशस
रेडियो प्लस- हिंदी, भोजपुरी, तमिल, तेलुग

बेस्ट एफ एम- हिंदी, अंग्रेजी, क्रियोल

टाप एफ एम- हिंदी, फ्रेंच, क्रिओल

रेडियो मारीशस- हिंदी, उर्दू

ताल एफ एम- हिंदी, भोजपुरी

रेडियो प्लस- हिंदी, फ्रेंच, क्रियोल

म्यूजिक एफ एम- हिंदी, अंग्रेजी, क्रिओल

अमेरिका
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104.9 एफ एम- भारतीय भाषा

1110 एएम- भारतीय भाषा

92.7- भारतीय भाषा

ईज़ी 96- हिंदी

मेरा संगीत- बालीवुड के हिंदी गीत

ईसीबी रेडियो- हिंदी, अंग्रेजी

त्रिनिदाद और टोबैगो
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रेडियो जागृति- हिंदी
हेरिटेज रेडियो- हिंदी
रेडियो 90.5 एफ एम- हिंदी

दुबई
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हम 106.2- हिंदी
सिटी 1016- हिंदी
रेडियो स्पिइस 105.4 एफ एम- हिंदी

नोट: विश्व रेडियो दिवस पर विशेष

जारी.....

शुक्रवार, 9 फ़रवरी 2018

बदल गये 'महात्मा' (विरासत के झरोखे से....(भाग-पांच)

विश्वत सेन

बचपन में जब हम एक क्लास उत्तीर्ण करके दूसरे वाले बड़े क्लास में जाते, तब एक अलग तरह का उत्साह, उल्लास और ललक रहती। अब एक ही तरह के पाठों को रोज बांचना नहीं पड़ेगा और न ही एक ही तरह के अभ्यास वाले प्रश्नों को हल करना पड़ेगा। आज के निजी स्कूलों के बच्चों की तरह चमचमाते जिल्द वाली किताब और कापियां आसानी से उपलब्ध नहीं होतीं। बिहार पेपर मर्चेंट एसोसिएशन (बी पी एम ए) की कापियां राशन की सरकारी दुकान या कोटे से खरीदी जातीय और किताबें सरकार द्वारा अनुदानित होतीं और स्कूल से ही मिलती नहीं थीं। अच्छा, हमारे समय में हर दूसरे-तीसरे महीने सिलेबस भी नहीं बदलता, इसलिए स्कूल में किताब आने के पहले वार्षिक परीक्षा के समय से ही अपने वरिष्ठ छात्रों से पुरानी क़िताबें लेने का छोड़-छोड़ शुरू हो जाता। मजे की बात देखिए, पहली कक्षा से पांचवीं कक्षा तक की किताबें आसानी से मिल जातीं, मगर छठी से 10वीं तक में झोल था। पांचवीं तक हद से हद पांच किताबें होतीं और दो BPMA की अभ्यास पुस्तिका। इनमें पहाड़ा, गिनती और गणित के लिए सादे पन्ने वाली एक और हिंदी समेत अन्य विषयों के लिए दूसरी रूलदार। छठी में जाने के बाद एक अंग्रेजी की चार लाइन वाली काफी बढ़ जाती। अच्छा, पांचवीं तक हम अभ्यास पुस्तिका का इस्तेमाल कम और स्लेट-पेंसिल का इस्तेमाल ज्यादा करते, ताकि एक तो अक्सर गोल-गोल बने और दूसरा कोटे से मिलने वाली अभ्यास पुस्तिका के पन्ने कम खर्च हों। तीसरा यह कि फाउंटेन पेन, स्याही और नींबू के पैसों की भी बचत हो। हिंदी अंग्रेजी में लिखना लिखने के अलावा केवल हिसाब बनानें में ही उसका इस्तेमाल होता।
खैर, इसी तरह घिसते-घसीटते हम पहुंच गये नौंवीं कक्षा में। नौंवीं कक्षा मतलब एक सम्मानजनक क्लास। इसके बाद अब 10वीं और फिर सीधा मैट्रिक बोर्ड। मैट्रिक बोर्ड उत्तीर्ण करने का अर्थ यह कि आयरन गेट पार। इसके बाद शिक्षा के लिए खुला आसमान। मगर, नौंवीं कक्षा तक पहुंचने के पहले शर्त यह थी कि आपने पहले की कक्षाओं में जो पढ़ा है, उसका भली-भांति ज्ञान होना आवश्यक है। चाहे वह कोई भी विषय क्यों न हो। जिस विषय में कोई छात्र कमजोर दिखा नहीं कि उसे उसी क्लास में रोक दो, जिसमें वह पढ़ रहा है। अब एक ही क्लास में साल जाया करने के भर से प्राय: सभी बच्चे पूरे साल जी-तोड़ मेहनत करने में लगे रहते। नौंवीं कक्षा के पहले तीसरी-चौथी से ही हमें संस्कृत की सुक्तियां, कबीरदास के दोहे, सुरदास की कुंडलियां, रहीम के दोहे-सवैया, हरिवंश राय बच्चन की बाल कविताएं, सुमित्रानंदन पंत की कविताएं आदि कंठस्थ करा दी गयी थीं या हमने कर लिया था। इन्हीं संस्कृत की सुक्तियों में एक सुक्ति है या उसे श्लोक भी कह सकते हैं, जिसे आज अक्सर बात-बात में राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर आधे-अधूरे तरीके से अपनी राजनीतिक, आर्थिक, धार्मिक सांस्कृतिक सहूलियत के हिसाब से पेश किया जाता है।
श्लोक है-यह
"अयं निज परोवेति गणना लघुचेतसां।
उदार चरितानाम तू वसुधैव कुटुंबकम्।।"

इसका अर्थ यह हुआ कि
"अपना-पराया, तेरा मेरा आदि की गणना करने के बजाय उदार चरित वालों के लिए पूरी पृथ्वी ही कुटुंब के समान है।"

अर्थात
जो व्यक्ति उदार चरित के होते हैं, उनके लिए अपना परिवार, सगे-संबंधी और कुटुंब की बात कौन करे, पूरी पृथ्वी पर निवास करने वाले चराचर जीव-जंतु सभी परिवार या संबंधी हैं।"
इसीलिए हमारे शास्त्रों में पर्वतों, वृक्षों, जीव-जंतुओं को मनुष्यों की तरह व्यवहार करते हुए दर्शाया गया है। आज जिस तरीके से "वसुधैव कुटुंबकम्" के सिद्धांत को परोसा जा रहा है, उसे कहने की जरूरत नहीं है। किसी रटंतु तोते की तरह इसे वांचा तो जा रहा, मगर कर्म की धरातल से यह कोसों दूर है।
खैर, जब हम नौंवीं कक्षा में आए तो समझ और शिक्षा का दायरा बढ़ गया। यहां पर संस्कृत की सूक्तियों के बजाय यक्ष के प्रश्न और युधिष्ठिर के उत्तर आ गये। इन्हीं यक्ष-युधिष्ठिर की प्रश्नोत्तरी में यक्ष ने एक सवाल पूछा था-"क: महात्मनां?" अर्थात "महात्मा कौन है?"

धर्मराज युधिष्ठिर ने जवाब दिया है:
"विपदि धैर्यमथाभ्युदये क्षमा,
सदसि  वाक्पटुता  युधि  विक्रमः।
यशसि  चाभिरुचिर्व्यसनं  श्रुतौ,
प्रकृतिसिद्धमिदं   हि  महात्मनाम् ।।
अर्थात
जो व्यक्ति विपत्ति में धैर्य ,समृद्धि में क्षमाशीलता , सभा में वाक्पटुता , युद्ध में पराक्रम ,यशस्वी ,वेद शास्त्रों को जानता हो, वह इन छह गुण से परिपूर्ण व्यक्ति स्वाभाविक रूप से महात्मा या महापुरुष कहलाता है। 
आज आलम यह है कि हर गली में गेरूआ रूप धारण करके महात्मा जी पधारे जाते हैं। आसाराम और राम रहीम जैसे लोग भी महात्मा ही कहलाना चाहते हैं। यही नहीं बहुत सारे महात्मा तो टेलीविजन के समाचार चैनलों पर बैठकर डिबेट में अपनी महतमै झाड़ते रहते हैं। कोई गेरुआ में, तो कोई सच्चाई के प्रतीक लकदक सफेद कपड़ों में प्रवचन सुना रहे होते हैं। भारत को एक बार फिर विश्व गुरु होने का सपना देखते और दिखाते हैं। मौका पड़ने पर "मां की-धी की" करने से बाज नहीं आते।
खैर, नौंवीं के बाद 10वीं और बोर्ड के बाद इंटर में आया। यहां आने के बाद राष्ट्रपिता महात्मा गांधी, बापू या फिर मोहनदास करमचंद गांधी से रूबरू हुआ। हालांकि, बापू को बचपन से ही जानते थे, मगर व्यापक पैमाने पर समझने का सिलसिला यहीं से शुरू हुआ। हालांकि, बीते दो दशकों से बापू को समझने के प्रयास में लगा हूं, मगर आज तक उन्हें समझ नहीं पाया। हो सकता है, यह मेरी मंदअक्ली हो। फिर हमने यह देखा कि बापू का राजनीतिक इस्तेमाल कैसे होता है। आज के चार साल पहले तक बापू को कांग्रेस की थाती कहा जाता था और आरोप चार साल पहले वाली उदारवादी हिंदूवादी विचारधारा के लोग लगाते थे। आज अचानक बापू का स्वरूप बदल गया। जैसे द्वापर और कलियुग वाले महात्माओं का स्वरूप बदला, उसी तरह महात्मा गांधी या बापू का स्वरूप बदल गया। अब हम जैसे लोग यह सोचने पर मजबूर हैं कि महात्मा का उपयोग सहूलियत के हिसाब वसुधैव कुटुंबकम् की तरह कहां-कहां किया जाएगा? मैं समझता हूं कि बापू को बापू के स्वरूप में और महात्मा को महात्मा के स्वरूप में ही रहने दिया जाए, तो बेहतर हो।
जारी...

गुरुवार, 8 फ़रवरी 2018

संसद में शूर्पणखा, तो फिर लक्ष्मण कौन? (विरासत के झरोखे से...भाग-चार)

विश्वत सेन

बुधवार यानी आठ फरवरी, 2018 को संसद बजट सत्र के पहले दिन दिए गए अभिभाषण पर चर्चा हो रही थी। लोकसभा में जो चर्चा हुई, उसे सुन देख नहीं पाया। राज्यसभा में हो रही चर्चा के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की बात सुनने को मौका मिला। मौका क्या मिला, दफ्तर में था। दफ्तर में एक साथी हैं, जो खुद को राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ, भारतीय जनता पार्टी और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के अनन्य अनुयायी मानते हैं। अपनी भावना प्रदर्शित करने के लिए वे भाजपा भक्त अथवा सरकार भक्त समाचार चैनल ही देखते हैं। पदेन वरिष्ठ हैं, तो उनके कामों में हस्तक्षेप करना मैं उचित नहीं समझता। बुधवार आठ फरवरी, 2018 को जब मैं दफ्तर पहुंचा, तो दूरदर्शन का समाचार चैनल ट्यून कर दिया गया। इस नाते मैं भी राज्यसभा में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ओर से पढ़ा जा चुटीला टाइप भाषण देखने सुनने लगा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपने कार्यकाल के करीब चार साल की अवधि के दौरान खुद की सरकार द्वारा किये गये कार्यों की शुरुआत करने का श्रेय पूर्ववर्ती संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन की सरकार और खासकर कांग्रेस को लेकर उन कार्यों को अमलीजामा पहनाने का श्रेय खुद पर या अपनी सरकार पर दे रहे थे। बीच-बीच में वे सुसभ्य भाषा और मजाकिया लहजे में कटाक्ष भी कर रहे थे। किसी-किसी बात पर विपक्ष और कांग्रेस के सदस्यों की ओर से कटाक्ष पर विरोध भी जताया जा रहा था। इसी बीच, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कोई बात कही, मुझे ध्यान नहीं है, उस पर एक अट्टहास टाइप की हंसी सुनाई दी। इस हंसी पर सत्ता पक्ष के लोगों ने ऐतराज जाहिर किया। इस ऐतराज पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने टिप्पणी की, "उन्हें हंस लेने दीजिए, रामायण के बाद पहली बार तो ऐसी हंसी सुनने को मिल रही है।"
प्रधानमंत्री की इस टिप्पणी पर सभी ने गौर किया और आपस में चर्चा की कि रेणुका चौधरी को पीएम ने "शूर्पणखा" कहा है। शूर्पणखा मतलब राक्षसी? यानी रेणुका चौधरी की हंसी राक्षसी है या फिर रेणुका राक्षसी है? तमाम तरह की बातें होने लगीं। इसी बीच, देर शाम तक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की इस टिप्पणी पर राजनीति में उबाल आ गया।
अब में सोचने लगा कि यदि प्रधानमंत्री ने कांग्रेस की एक सदस्या को शूर्पणखा यानी राक्षसी कहा है और वह भी भरी संसद में, तब तो उसी संसद में कोई न कोई "राम" और "लक्ष्मण" भी होंगे। अब राम कौन और लक्ष्मण कौन? यह बहुत बड़ा सवाल है। वह इसलिए कि संसद की सदस्यता ने पीएम के भाषण पर कटाक्षपूर्ण अट्टहास किया, यह निंदनीय, अशोभनीय, अमर्यादित और असंसदीय है, मगर प्रधानमंत्री के एक गरिमामय पद पर आसीन होने के नाते सभ्य भाषा में किसी को राक्षस या राक्षसी नहीं कहना चाहिए।
शूर्पणखा की चर्चा जब संसद और संसद से बाहर होने लगी, तब मैंने सोचा कि क्यों शूर्पणखा और राक्षस-राक्षसी को लेकर ज्ञानवर्धन कर लिया जाए। आचार्य चतुर सेन की पुस्तक "वयं रक्षाम:" पढ़ी थी, तो उन्होंने राक्षसों को वंश या कुल रक्षक के रूप में प्रस्तुत किया है। संस्कृत के 'रक्ष' शब्द का अर्थ रक्षा करना होता है, जिसमें 'रक्ष, रक्षति, रक्षति...' करके धातुरूप और शब्द रूप भी है। इसके अलावा रक्षा संस्कृति भी है, जिसका वर्णन सनातनी ग्रंथों, पुरानों और शास्त्रों में भी है। मेरा मतलब यहीं पर आकर रुक जाने से नहीं था, मेरा मतलब गूढ़ता को जरा और धारण करने और फिर उसका सरलीकरण करने से था।
मेरा अभियान शुरू हुआ। पहले मैंने सोशल मीडिया के विद्वानों से सवाल दागा। शूर्पणखा के कितने नाम थे? इस सवाल का कारण यह था कि "रावण की बहन थी शूर्पणखा। शूर्पणखा दंडकारण्य निवासिनी थी। पंचवटी में उसने मर्यादा पुरुषोत्तम राम को देखा और वह उन पर मोहित हो गयी।" यहां इस कहानी को रोक रहा हूं और वह इसलिए कि रावण की बहन शूर्पणखा, सूर्पनखा, सुपनेखा या फिर स्वर्णनखा को शास्त्रकारों, कहानीकारों, उपन्यासकारों और देशज-विदेशज तमाम रचनाधर्मियों ने "राक्षसी" या "राक्षसनी" कहकर खलनायिका के रूप में पेश किया है, तो पहले हमें यह जान लेना जरूरी है कि "राक्षसी" या "राक्षसनी" कहते किसको हैं।
मेरे पास चौखंभा सुभारती प्रकाशन द्वारा प्रकाशित डा ब्रह्मानंद तिवारी द्वारा व्याख्यायित और अमर सिंह द्वारा रचित अमरकोश है। मैंने "राक्षसी" की परिभाषा वहां खोजना शुरू किया। इस पुस्तक के दूसरे कांड के चौथे वर्ग में 128वां श्लोक मिला। आप भी उस श्लोक से रूबरू होंगे, तो बेहतर होगा। यथासंभव इसका अन्वय के साथ अर्थ समझाने का प्रयास करूंगा। हो सकता है, मेरे अन्वय और भावार्थ में त्रुटि हो, क्योंकि अभी मैंने ढंग से हिंदी तो सीखी ही नहीं है, तो संस्कृत क्या खाक बांचूंगा। फिर भी...।
श्लोक:-
"कुणि: कच्छ: कांतलको नन्दिवृक्षोsथ राक्षसी।
चंबा धनहरी क्षेम-दुष्पत्र-गणहासका:।।"

अन्वय: 1
कुणि: कच्छ:= कुणिणक: अच्छ: स: कुणिकच्छ:। कुणिक:=सूर्यपुत्र भगवान शनि और अच्छ:=आंख।
अर्थात, सूर्यपुत्र भगवान शनि की आंख के समान आंख हो जिसकी।
सूर्यपुत्र शनि देव को कणिकाक्षी भी कहा जाता है।

अन्वय:2

कांतलको=कांत: कथयसि चंद्रमाश्च अलक: केशवारूणि। अर्थात चंद्रमा की तरफ बाल उठे हों जिसके।

अन्वय:3
नंदिवृक्षोथ=भगवान शंकर वाहन: नंदी अर्थात वृषभ: समान वृक्ष: अर्थात वक्ष: तथा ओष्ठ:
यानी बैल के समान वक्ष और ओंठ हों जिसके।
चंडा=विकराल
धनहरी=मेघ के समान काली
क्षेमदुष्पत्र=उत्पात मचाने वाला
गणहासका:= समूह में खड़े लोगों की हंसी के समान अकेला हंसने वाला या अट्टहास करने वाला।

भावार्थ

जिसकी आंखों से अंगारे बरसते हों, जिसके बाल आकाश की ओर उठे हों, चेहरा कुरूप एवं छाती बैलों जैसी हो, बदन विकराल हो, जो हमेशा उत्पात मचाने वाली हो; वह "राक्षसी" या "राक्षसनी" कहलाती है।

अब "राक्षसी शूर्पणखा ने मर्यादा पुरुषोत्तम राम के रूप-गुण पर मोहित होकर प्रणय निवेदन किया, तो उन्होंने कहा-"मेरे पास मेरी भार्या सीता तो है, मगर लक्ष्मण अविवाहित है; तुम उसके पास जाओ। कामांध "राक्षसी" शूर्पणखा लक्ष्मण के पास गती और प्रणय निवेदन किया। लक्ष्मण ने फिर उसे रामजी के पास भेज दिया पुनश्च राम ने लक्ष्मण के पास। अंत में उसने लक्ष्मण से विवाह करने की जिद ठान ली, जिसपर लक्ष्मण ने उसका नाक काट दिया। इस घटना के बाद वह लंका गती और रावण से व्यथा बताती। रावण ने खर-दूषण को भेजा। आदि-आदि।"
~सोशल मीडिया विद्वान और महाज्ञानी गूगल महाराज के अनुसार।
अब सवाल यह पैदा होना स्वाभाविक है कि यदि कांग्रेस की सदस्या ने संसद में प्रधानमंत्री के भाषण के दौरान अट्टहासी उपहास उड़ाने की वजह से "राक्षसी" हो सकती है, तो उन्हीं सत्तपक्षी या विपक्षी सदस्यों में से कोई न कोई तो राम और लक्ष्मण भी होगा?

नोट: यह लेख किसी राजनीतिक दुर्भावना, कटाक्ष या किसी आम या खास व्यक्ति की आलोचना के लिए नहीं लिखा गया है। यह महज मन में उपजे सवालों का जवाब ढूंढने का प्रयास भर है।

जारी.....


मंगलवार, 6 फ़रवरी 2018

'....अब आप अनंत कुमार से प्रादेशिक समाचार सुनिए' (विरासत के झरोखे से भाग-तीन)

विश्वत सेन

1980 के दशक बिहार (तब झारखंड राज्य नहीं बना था) विकास कर रहा था. शाम 7.30 बजे तली में सटे किरासन तेल से ऊर्जा लेकर मद्धम लालिमा वाले लौ के साथ लालटेन प्रकाशमान अंधेरों को चीरने का काम करता रहता. सर्दी, गर्मी और बरसात के थपेड़ों से जूझने वाले चिरायु लालटेन के इर्द-गिर्द लोग बैठे रहते. वे दिनभर के कामों से थके रहते. उधर, गौ माताएं पागुर पारतीं, भैंसें अपनी पूछों से रक्त पिपासु मच्छरों को भगाने का उपक्रम करतीं, मकड़ियां अपने ही बुने जाल से आजाद होने का प्रयास करतीं, फतींगे लालटेन के मद्धम प्रकाश के इर्द-गिर्द मंडराते रहते और छिपकलियां उन फतींगों को चट करने की फिराक में लगी रहतीं.
इस बीच, हम जैसे अबोध बच्चे चिरायु लालटेन मद्धम लालिमा लिये देदीप्यमान लालटेन के प्रकाश में किसी वीर की भांति गोल घेरे में चक्रव्यूहाकार बैठे रहते. इस दौरान हमारी आंखें पुस्तकों के अक्षरों के साथ युद्ध कर रही हाेतीं. उधर, खाट या फिर चौकी पर बाबूजी अपने सहकर्मी के साथ बैठे होते. सामने वाली चौकी पर बाबा और एक स्पेशल खाट पर दुखहरण पंडित जी. तभी रेडियो पर सुस्पष्ट बुलंद आवाज "ये आकाशवाणी का पटना केंद्र है. अब आप अनंत कुमार से प्रादेशिक समाचार सुनिए" उभरती.
इस आवाज के सुनते ही चिरायु लालटेन के पास चक्रव्यूहाकार बैठे अबोध बालकों, खाट-चौकी पर बैठे बड़े-बुजुर्गों, गौशालाओं की गाय-भैंसों, मकड़ियों और छिपकलियों के कान खड़े हो जाते. लगता, 'सभी इस आवाज की प्रतीक्षा कर रहे हाें.' सबका तात्कालिक कार्य-व्यवहार बंद हो जाता. रेडियो पर प्रसारित वाक्य के दो शब्द 'आकाशवाणी' और 'अनंत' मानो हमारी चेतना को अनंत शून्य में लेकर चला जाता. 'आकाशवाणी' शब्द सुनते ही लगता, 'अब अनंत आकाश में देवी-देवता, यक्ष-गंधर्व, किन्नर-किरीट सभी उपस्थित होंगे और आकाशवाणी होने वाली है-'देवव्रत, आज से तुम भीष्म कहलाओगे.' उस समय हमारे बाल मन के लिए आकाशवाणी का मतलब यही था.
पटना रेडियो स्टेशन के समाचार वाचक अनंत कुमार की बुलंद आवाज सुनकर यही प्रतीत होता, मानो इस आवाज में सूर्य, चंद्रमा और पृथ्वी एक कतार में खड़े हों. समाचार वाचक अनंत कुमार हमारी आकांक्षाओं के अनुरूप कई तरीकों से विभिन्न समाचारों को पढ़ रहे होते. हम एकाग्रतापूर्वक उस दैवीय आवाज को सुनते. हमारी एकाग्रता तब भंग होती, जब 7.39 पर वे कहते, 'एक बार फिर से मुख्य समाचार सुनिए.' सबसे बड़ी बात यह होती, जिस दिन समाचार पढ़ने अनंत कुमार नहीं आते, लगता, 'आज हमने कुछ खो दिया है.' हालांकि, उनके स्थान पर श्री संजय बनर्जी को भेजा जाता, मगर मन में इस बात की कसक बनी रहती. संजय बनर्जी मुख्य रूप से क्रिकेट की कमेंट्री के लिए जाने जाते थे.
आवाज की सुपष्टता और बुलंदी अमीन चाचा यानी श्री अमीन सयानी और श्री अमिताभ बच्चन की आवाजों में भी देखने को मिलती है, मगर अनंत कुमार के आगे सारी आवाज आज भी फीकी लगती है. अनंत कुमार की उसी आवाज को सुनने की लालसा पिछले साल भी तब जगी, जब मैं पटना में स्थानांतरित कर दिया गया था. जिज्ञासा को शांत करने रेडियो स्टेशन पहुंचा, तो पता चला कि आकाशवाणी के पटना केंद्र के समाचार वाचक अनंत कुमार अनंत लोकवासी हो गये और जिस युग में वे समाचार वांचा करते थे; उस युग में रिकाॅर्डिंग की व्यवस्था नहीं थी. समाचार डाइरेक्ट टेलीकास्ट किया जाता था.
खैर, 1980 के ही दशक में दूरदर्शन के क्षेत्र में महान क्रांतिकारी हुई. इस दौरान रामानंद सागर की रामायण और बीआर चोपड़ा का महाभारत धार्मिक धारावाहिक आया. रामानंद सागर के रामायण ने टेलीविजन को लोकख्याति प्रदान की और बीआर चोपड़ा के महाभारत ने उसे घर-घर, झोपड़ी-मोहल्ले का वासी बना दिया. हिंदी समाचार जगत के क्षेत्र में अखबार और रेडियो के अलावा दूरदर्शन ने भी जगह बना ली थी, मगर उस पर सरकारी होने का ठप्पा लगा हुआ था.
दूरदर्शन समाचार के दर्शकों को सरकारी ठप्पे से आजाद कराने के ध्येय से श्री एसपी सिंह 'जनता के द्वारा, जनता के लिए' के सिद्धांत पर चौबीस घंटे का समाचार चौबीस मिनट के कार्यक्रम 'आजतक' के रूप में लेकर आए. इस कार्यक्रम का अलग तेवर-कलेवर था. दिल्ली के कनॉट प्लेस स्थित एफ-19 इनर सर्किल में इसका दफ्तर और स्टुडियो दोनों था. दर्शकों से मिल रहे रिजल्ट के बाद इसे दूरदर्शन से हटाकर पूरे 24 घंटे का खांटी निजी समाचार चैनल बना दिया गया.
हालांकि, इस दौर में हिंदी-अंग्रेजी के अन्य समाचार कार्यक्रम थे, मगर 24 मिनट से 24 घंटे का यह पहला प्रयोग था. इस प्रयोग के बाद जब पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने मीडिया में 27 फीसदी विदेशी निवेश की छूट दी, तो 24 घंटे वाले निजी समाचार चैनलों की बाढ़ आ गयी. आज  1980 के दशक से लेकर 21वीं सदी के दूसरे दशक के उत्तरार्द्ध तक आलम यह हो गया है कि निजी चैनलों पर ही युद्ध लड़ा जाता है और इसी पर फैसले भी सुना दिए जाते हैं. आभासी और दूरदर्शन वाले इस मीडिया के दौर में मानो अनंत कुमार की वह देदीप्यमान आवाज कहीं गुम सी हो गयी है.


जारी....

फुलौरी बिन चटनी कैसे बनी (विरासत के झरोखे से...भाग-दो)

विश्वत सेन

'कैसे बनी, कैसे बनी; फुलौरी बिना चटनी कैसे बनी...'
1980 के दशक में भोजपुरिया फिल्म इंडस्ट्री अथवा भोजपुरिया बेल्ट में यह गाना बहुत अधिक प्रचलित हुआ noथा। इस गाने का मूल भाव ' बिना चटनी के फुलौरी कैसे बनेगी' था, जिसका दूसरा भाव उस समय के युवाओं और गीतकारों ने अपने अंदाज में पेश किया और स्वीकारा। दरअसल, भोजपुरी भाषा का यह गीत भारत के भोजपुरिया फिल्म इंडस्ट्री अथवा भोजपुरिया बेल्ट में काफी बाद में आया, जब कंचन और बाबला ने इसे 1983 में रिमेक गीत को गाया। इसके पहले इसे त्रिनिदाद में सुंदर पोपो ने गाया था। 1983 में कंचन और डाबला के इस गीत को तत्कालीन समाज में भोंडा माना जाता था। किसी शादी-समारोह या सार्वजनिक स्थल पर इसे बजाया जाता था, तो मां-बहनें चेहरे पर साड़ी का पल्लू रखकर मुंह छुपा लेती और गीत बजने वाले स्थान से बुदबुदाती-गरियाती हुई चुपके से चमककर रुखसत हो जातीं।
1980 के ही दशक में बंबइया फिल्म इंडस्ट्री में एक गाना 'दोनों जवानी के मस्ती में चूर, तेरा कुसूर न मेरा कुसूर, एक्सीडेंट हो गया रब्बा-रब्बा...।' यह गाना किस फिल्म का है, इसके अभिनेता कौन हैं और इसे किस सिचुएशन में फिल्माया गया, कहने की जरूरत नहीं। यह गीत भी उस जमाने के नौजवानों के रंगों में बहने वाले लहू में उबाल भर देता और वे नारियों के प्रति आसक्त हो जाते। इस गाने के बारे में भी तत्कालीन सभ्य समाज के लोगों में वही धारणा थी, जो 'कंचन और बाबला' के गाए गीत के प्रति थी। इस गीत को भी सार्वजनिक स्थल अथवा शादी-समारोह में बजाने के बाद औरतों की वहीं प्रतिक्रिया होती, जो 'फुलौरी बिना चटनी' को लेकर होती।
इन दोनों गीतों के प्रति सभ्य समाज के लोगों की इस तरह की अवधारणा इसलिए थी, क्योंकि हमारे समाज में उस समय इस तरह का भोंडापन या खुलापन नहीं था, जो उसे आसानी हजम कर सके। बाद के बरसों में फिल्मकारों ने अपनी-अपनी फिल्मों में ऐसा-ऐसा व्यंजन परोसा कि भाई लोग 1990 का दशक आते-आते रशियन टीवी के आदी हो गए। 21 सदी में तो पूछिए ही मत, कुकुरमुत्तों की तरह पोर्नोसाइट्स की बाढ़ ही आ गई। 21वीं सदी की शुरुआत से 2016 के सितंबर तक तो फिर भी यह साइबर कैफे, लैपटॉप और डेस्कटॉप तक ही सिमटा था, मगर दूरसंचार के क्षेत्र में तथाकथित तौर पर क्रांति लाने के लिए पेश किये गये 'जिओ' इसे हर घर के हर बिस्तर के नीचे, गली-कूचों, राह-बाट, स्कूल-कॉलेज, जहां हम आप सोच भी नहीं सकेंगे; वहां उतार कर रख दिया। दूरसंचार क्षेत्र की तथाकथित इस क्रांति ने भले ही कुछ नहीं दिया हो, मगर भारत के नौजवानों की किस्मत और हाथों में क्लीवता की डोर थमाने का काम जरूर किया। 1980 के दशक के जिस भारत देश में यहां की औरतें होंगे गानों के बोल सुनकर शर्म और नफ़रत से लाल हो जाया करती थीं, आज 21वीं सदी के दूसरे दशक के आते-आते उसी भारत में कैसा माहौल बदला है, यह भी कहने की जरूरत नहीं है।
1980 के ही दशक के दौरान भारतीय राजनीति में भी कई परिवर्तन देखे गए। आपातकाल और जेपी के आंदोलन से देश उबरा था। भारत में इंदिरा गांधी की सरकार थी। जनसंघ भारतीय जनता पार्टी बन चुका था। राजनीतिक स्वच्छता कायम करने को लेकर बहस और प्रयास जारी थे। राजनीतिक गलियारों में एक-दूसरे दल के लोगों द्वारा आरोप-प्रत्यारोप लगाते जाते, मगर भाषायी शुचिता और मर्यादा का भी ख्याल रखा जाता। 1990 के दशक में जब पूर्व प्रधानमंत्री मंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह की ओर से मंडल कमीशन की सिफारिशों को लागू किया गया और जनमोर्चा से टूटकर नये राजनीतिक दलों का अभ्युदय होने लगा, तो राजनीतिक गलियारे से भाषायी मर्यादा पर भी आघात होने लगा। लालू प्रसाद यादव के राजनीतिक पटल पर अभ्युदय के बाद यह मर्यादा तार-तार हो गई। आज जब 21वीं सदी का दूसरा दशक आने को है, तो देश के राजनीतिक गलियारों में किस तरह की भाषा का प्रयोग किया जा रहा है, वह कहने की जरूरत नहीं है। जैसे फिल्मकारों ने अपने प्रोडक्ट को बेचने के लिए सामाजिक सोच को बदला, वैसे ही आज के राजनेताओं ने वोट की राजनीति करने के लिए देश की आबोहवा को बदल कर रख दिया। अब इसमें देश के नागरिकों को यह तय करना होगा कि इस बदले परिवेश में उन्हें क्या ग्रहण करना है और किसे त्यागना है। देश में हर जगह उत्पादों की भरमार है।

जारी....

लाजो न लागौ सजनवा तोरा

विश्वत सेन

लाजो न लागौ सजनवा तोरा, सब जनवा मोराबे हो।
जनवा मोराबे तू काहे सजन, मनवा भरमावै हो।
लाजो न लागौ सजनवा तोरा.....

चाह बेच चहबच्चा बनैलों, बचन बेच कै बागी;
आह बेच अलबत्ते कमैलों, बचे न कोई रागी;
अब्बो न जो तू संभरबे सजनवा, सब जनवा मोराबे हो;
लाजो न लागौ सजनवा तोरा....

गाय-माय नहिं हाय लेबै हे, आह भरै नहीं नानी;
धांय-धाय तुहि प्राण लेबै जो, स्याह भई है जवानी;
अब्बो न जो तू संभरबे सजनवा, सब जवना मोराबे हो;
लाजो न लागौ सजनवा तोरा...

भोट मिलौ नहिं चोट करे तू, घोंट-घोट मन खोट करै तू;
नोच-खसोट कै नोट भरै तू, लोटपोट तन सोंट करै तू;
अब्बो न जो तू संभरबे सजनवा, सनतवा मोराबे हो;
लाजो न लागौ सजनवा तोरा, सब जनवा मोराबे हो।


~घड़ियाल बाबू

सोमवार, 29 जनवरी 2018

विरासत के झरोखे से-(भाग-एक)

विश्वत सेन
हमारे बाबूजी बचपन में बताते थे, "मकदुनिया का शासक सिकंदर (जिसे सिकंदर महान भी कहा जाता है।) जब दुनिया को जीतने के अभियान के दौरान भारत पर आक्रमण करने की तैयारी में था, तब उसने अपने राजनीतिक गुरु अरस्तू (384 ईपू-322 ईपू) से पूछा था-"गुरुजी मैं भारत जा रहा हूं, वहां से आपके लिए क्या लाऊंगा।" इस पर अरस्तू ने जवाब दिया था-"भारत जा रहे हो, तो हमारे लिए क्या लाओगे?"
सिकंदर-"जो आप कहेंगे।"
पहले तो अरस्तू अपनी इच्छा जताने में दिलचस्पी नहीं दिखाए, मगर सिकंदर ने जिद किया, तो उन्होंने कहा-" अव्वल यह कि तुम भारत विजय की मंशा त्याग दो। दूसरा यह कि अगर तुम भारत जा ही रहे हो और जिंदा वापस आ जाओ, तो वहां के संत पुरुषों (गेरुआ धारण करने मात्र से कोई संत नहीं हो जाता।) से मुलाकात करते आना और अगर हो सके, तो कौटिल्य (375 ईपू-283 ईपू) से मिलते आना।"
सिकंदर भारत आया, आक्रमण किया; मगर न तो उसकी मुलाकात संतों से हो सकी और न कौटिल्य से। वजह ये थी कि वह मगध तक आधिपत्य जमाने के पहले पंजाब में ही युद्ध के दौरान गंभीर रूप से घायल हो गया। घायलावस्था में ही वह वापस लौटने लगा, लेकिन उसकी रास्ते में ही मौत हो गयी।"
बाबूजी यह बात हम लोगों को आज से कम से कम तीन दशक पहले बताते थे। आज जब बाबूजी की यह बात जेहन में आयी कि ईसा पूर्व चौथी शताब्दी में आज की तरह संचार और सूचना के इतने सारे तीव्रगामी साधन नहीं थे और कौटिल्य या फिर अरस्तू अपने देश से बाहर नहीं निकले, क्योंकि तब आज के बड़े और बुद्धजीवी लोगों की तरह घुटनों में उड़न खटोले का पंख भी बंधा नहीं होता था; बावजूद इसके सात समद पार का एक बुद्धजीवी सात समद पार के दूसरे बुद्धजीवी को इतने करीब से जानता था? 
दूसरा आवागमन के आज की तरह द्रुतगामी साधन न होने के बावजूद करोबार और उन्नत कारोबार होता था। भारत के लोगों ने कभी भी अपने यहां निवेश के लिए किसी दूसरे राष्ट्र को आमंत्रित करने नहीं जाते थे, फिर भी भारत सोने की चिड़िया था।
आज आवागमन के द्रुतगामी साधन हैं, संचार और सूचना के मुफ्त तीव्रगामी साधन उपलब्ध हैं और बुद्धजीवी लोगों का भंडार है, बावजूद इसके देश में अमन नहीं है, विकास की बात की जाती है, मगर पेट पर आफत है। देश का मुखिया निवेश के लिए दुनिया भर के देश से गिड़गिड़ा रहा है, विदेश जाता है, पर मारीशस ही साथ देता है।

जारी.....

मंगलवार, 19 सितंबर 2017

क्या यही रामराज है?

विश्वत सेन
रामराज। समभावी एवं समग्राही अथवा सर्वग्राही शासन की परिकल्पना। शायद लोकतंत्र के सूत्रधारों ने यही सोचकर इस रामराज के शासकीय सिद्धांत को प्रतिपादित किया था कि इस समभावी सिद्धांत पर जनता की जरूरत के अनुरूप सुविधा उपलब्ध कराने के लिए माहौल तैयार किया जाए और शासन में समरूपता हो, ताकि जनता खुशहाल रहे। शायद यही लोकतंत्र की मर्यादा भी है।
यह शास्त्रोक्त और किंवदंती भी है कि दशरथ पुत्र मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम चंद्र जी के राज्य में जनता खुशहाल थी। वह त्रेता युग था और तब राजतंत्र था। आम तौर पर यह माना जाता रहा है कि शासन के राजतंत्रात्मक प्रणाली में राजा चाहे कितना ही उदार क्यों न हो, मगर उसमें वर्चस्विता और एकात्मवादी भाव होता ही है। वर्चस्विता का भाव न केवल अपने पड़ोसी राज्यों के साथ होता है, बल्कि उसका असर जनजीवन पर भी पड़ता रहा है।
राजतंत्रात्मक शासकीय प्रणाली में राजा के द्वारा शासन चलाने के लिए कथित तौर पर मंत्रियों की नियुक्ति की तो जाती थी, मगर वे सभी राजेच्छा के विपरीत शायद ही कोई कदम उठाते। मंत्रीगण अपने पद को बचाते रखने की खातिर  ठकुरसुहाती और चारण प्रथा का सहारा लेते। अधिकतर राजा चूंकि अपने राज़ प्रासादिक भोग-विलास में लिप्त रहते, इसलिए उन्हें राज्य वास्तविक वस्तुस्थिति का भान कम ही रहता। जनता की दशा-दिशा को लेकर जो माहौल ठकुरसुहाती करने वाले मंत्रियों द्वारा पेश किया जाता, राजा उसे अंतिम सत्य मानकर लेते। न मानने का कोई कारण न बनता, क्योंकि राज्य में सर्वत्र खुशहाली की ऐसी तस्वीर और उसके समर्थन में ऐसे साक्ष्य पेश किये जाते कि यकीन न करने का कोई कारण न बनता। बिरले राजा ऐसे होते, जो राज्य की वास्तविक वस्तुस्थिति को जानने के लिए जासूसी का सहारा लेते या फिर खुद यदा-कदा वेश बदलकर राज्य भ्रमण पर अज्ञातवास के नाम पर निकल जाते। इन राजाओं को वास्तविक वस्तुस्थिति का भान तो तब होता, जब दूर या पड़ोस का दुश्मन राज उन पर हमला करता या फिर राजविद्रोह के परिणामस्वरूप वे जबरिया अपदस्थ कर दिये जाते। कुछ राजा जो अतिमहत्वाकांक्षी होते, तो वे चक्रवर्ती बनने के लिए अपने द्वीप समूह के राजा-रजवाड़ों पर अपना वर्चस्व स्थापित कर एकच्छत्र राज्य स्थापित करते। प्रत्येक राजा अपने हिसाब से खुद का चारणान करवाता या फिर आत्मकथा लिखवाता और अपनी ही मर्जी से जनता पर शासन करता।
न्याय और शासन व्यवस्था पूरी तरह से एक ही व्यक्ति के हाथों में होती। शासन के इस प्रणाली में राजा, उसके सगे-संबंधी, मंत्री और उसके सगे-संबंधी, व्यापारी और उसके सगे-संबंधी, विद्वान और उसके सगे-संबंधी, राज पुरोहित और उसके सगे-संबंधी तथा शासन के नजदीक रहने वाले और उसके सगे-संबंधियों में खुशहाली नजर तो आती, मगर आम जनता तब भी निरीह ही रहती।
राजतंत्रात्मक प्रणाली की यह गाथा अकेले भारतीय उपमहाद्वीप की नहीं है, बल्कि दुनिया के सात महाद्वीपों के देशों में थी। चाहे वह फ्रांस हो, रूस हो, ग्रेट ब्रिटेन हो या फिर कोई और देश; व्यक्तिवादी और वंशवादी निरंकुशता की वजह से कई देशों में राजद्रोह भी हुए और राजाओं को अपदस्थ कर नये राजा को गद्दी भी मिली, मगर राजकीय प्रमाद अक्सर निरंकुशता को जन्म दे ही देती।
यही वजह रही कि पूरी दुनिया में राजतंत्रात्मक प्रणाली विफल रही और फिर शासन की लोकतंत्रात्मक प्रणाली की परिकल्पना को मूर्त रूप दिया गया, जिसे दूसरे शब्दों में रामराज भी कह सकते हैं।
भारत दुनिया के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देशों में एक है। वजह यह है कि इस देश पर करीब दो सौ सालों तक अंग्रेजी हुकूमत रहने के बाद आजादी देने की बात आई, तब इसे एक गणतांत्रिक देश बनाने के लिए दुनिया के कई देशों के कानून और संविधान को मिलाकर एक संविधान तैयार किया गया, ताकि यहां पर रामराज स्थापित किया जा सके। आजादी के आज सत्तर साल से अधिक हो गये, मगर रामराज का प्रतिबिंब अभी तक नजर नहीं आया है। हालांकि, राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के समय से लेकर आज तक राजनीतिक तौर पर इसकी चर्चा की तो जाती है, मगर यह जमीनी स्तर पर शासन से अभी कोसों दूर है।
क्रमशः जारी...


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गुरुवार, 21 अप्रैल 2016

...और जब अंगूरी तड़ीपार हो गयी

विश्वत सेन
बिहार के मुख्यमंत्री सुशासन बाबू कहते हैं कि नासपीटी, अंगूर की इस बेटी ने उनके सूबे के लोगों को नशे में सराबोर करके जिंदगियों को बरबाद करके रख दिया है। वह गरीबों की जिंदगी को लील रही है। लोग दारू पीकर अपनी घरैतिन को पीटते हैं। बच्चों को दाने-दाने के बिना तरसाते हैं। अपनी कमाई का ज्यादातर हिस्सा अंगूर की बेटी को भेंट कर आते हैं। वे इतना ही नहीं कहते, बल्कि ये भी कहते हैं कि इसी अंगूर की बेटी ने बिहार के लोगों को बिगाड़कर अपराधी बना दिया। इसी नासपीटी की वजह से उनके शासन में अपराध के ग्राफ बढ़ रहे हैं। अचंभा तो तब होता है, जब वे यह कहते हैं कि पटना के श्रीकृष्ण हॉल में एक चुनावी कार्यक्रम के तहत एक महिला ने उनसे सूबे में बढ़ते शराब के चलन और उससे होने वाले नुकसान को देखते हुए उसे पूरी तरह बंद करने की गुजारिश की। इस कपोलकल्पित कहानी को सुशासन बाबृ ने हकीकत में बदल दिया और राजस्व के नुकसान की परवाह किये बिना एक अप्रैल, 2016 से बिहार में पूर्ण शराब बंदी का ऐलान कर दिया।
शराब दिल, लीवर और फेफड़ों को जलती है। इसके साथ ही लोगों के घरों को भी फूंक देती है। इसे पीने वाला सेवन करने के पहले तक लोगों को इससे दूर रहने की नसीहत देता है, लेकिन शाम ढलते ही रगों में कीड़े कुलबुलाने शुरू हो जाते हैं और दिन में नसीहत देने वाला देर रात तक मधुशाला में नजर आता है। मतलब साथ है कि जैसे शराब में घमंड नहीं है, वैसे ही शराब के सेवन करने वाले भी घमंडी नहीं होते। कसम खाते हैं, मगर अहम में उस पर अड़े भी नहीं रहते। मौका पाते ही कसम तोड़कर पहले वह काम करते हैं, जिसकी जरूरत होती है। दूसरा, जैसे शराब अमीर-गरीब और गंदगी और सफाई में फर्क नहीं करती, वैसे ही शराब के पुजारी अमीर-गरीब में फर्क नहीं समझते। समाजवाद का असली नजारा देर रात तक मयखाने में ही देखने को मिलता है। तीसरा, जैसे शराब कभी भी अपनी नशा चढ़ाने के लक्ष्य को नहीं भूलती, वैसे ही शराबी कभी अपने लक्ष्य को कभी नहीं भूलते। अंगूर की बेटी को हलक से उतारने के बाद चाहे नशा कितना भी चढ़ा हो, पहला लक्ष्य घर पहुंचने का होता है। इसका मतलब साफ है कि शराब और शराबी कभी अपने लक्ष्य से भटकते नहीं हैं। यह शराब का सामाजिक सरोकार है। सामाजिक सरोकार के इनते अधिक फायदे रखने के बाद भी बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार इसे अछूत मानकर अपने राज्य से तड़ीपार कर दिया।
आज अंगूर की बेटी अंगूरी को तड़ीपार हुए करीब 20 दिन हो गए हैं। इन 20 दिनों में पूरी दुनिया देख रही है कि बिहार में अपराध का ग्राफ पहले की ही तरह बरकरार है। लोगों के घर शराबी पतियों की वजह से नहीं, गरमी की आग से झुलसकर खाक हो रहे हैं। अब अंगूरी उत्पात नहीं मचा रही, बल्कि वे लोग तांडव कर रहे हैं, जिन्होने शराब बंदी के बाद सुशासन बाबू की तारीफ के पुल बांधे थे। अब बिहार और बिहारियों की नजर में अपराध नहीं हो रहा है। पूर्णत: शराब बंदी के बाद अपराध भी पूरी तरह समाप्त हो गया। अब बिहार में अपराध नहीं, राजनेताओं औ सियासतदानों का तांडव हो रहा है और सूबे में तांडव कर रहे हैं पालित-पोषित घाघ अपराधी। पीने वाले अब भी बाहर से मंगाकर पी रहे हैं। शराब और शराबी अमीर-गरीब में फर्क नहीं करता, लेकिन सरकार और सुशासन बाबू अमीर-गरीब फर्क कर रहे हैं। पैसे वाले पहले भी शराब की बहती गंगा में गरीबों को बदनाम करके शराब छलकाते थे। अब जबकि बिहार में शराब का सूखा पड़ा है, तब भी पैसे की गंगा बहाकर जाम छलका रहे हैं। सही मायने में महरूम तो वह बेचारा गरीब हो गया, जो दिनभर हाड़तोड़ मेहनत करने के बाद शाम को बदन का दर्द मिटाने के लिए अंगूरी की आगोश में चला जाता था। अब यदि दिनभर हाड़तोड़ मेहनत करने के बाद जब घरैतिन अपने आगोश में लेने के बजाय शाम को खरी-खोटी सुनाएगी, तो भला कौन इंसान ऐसा नहीं होगा, जो आगोश में जाने के लिए विकल्प की तलाश नहीं करेगा। सो, उसने किया, मगर उसकी घरैतिन और नासपीटी सुशासन बाबू की सरकार को वह भी नहीं सुहाया। 
सुशासन बाबू चाहे जितनी अपनी पीठ थपथपा लें, चाहे वह सूबे की घरैतिनों की चाहे जितनी वाहवाही ले लें, लेकिन इतना तय है कि बिहार के लाखों बेवड़ों की हाय उन्हें जरूर लगेगी। इन साफदिल और संगदिल बेवड़ों की हाय जब लगेगी, तो कहीं ऐसा न हो कि पांच साल बाद घरैतिनों का वोट मिलने के पहले ही उनकी सरकार भी तड़ीपार न हो जाए।

रविवार, 13 मार्च 2016

व्यापक होता रहा है ट्रिपल एस

विश्वत सेन
ट्रिपल एस (सेक्स, स्कैंडल एंड सिक्योर या सेक्स, सेंसेशन एंड सिक्वल) के फॉर्मूले को जिस किसी ने भी गढ़ा है, बड़ा ही नेक काम किया है. पहले इस फॉर्मूले को एक खास वर्ग द्वारा उपयोग किया जाता था, मगर आज यह सार्वभौमिक हो गया है. किसी भी क्षेत्र में नजर उठाकर देख लीजिए ट्रिपल एस का फॉर्मूला व्यापक तरीके से नजर आता है. ताज्जुब तो तब होता है, जब धार्मिक कार्यों में भी इसका उपयोग किया जाने लगा है. हालांकि, पहले भी इसका उपयोग होता रहा है, लेकिन किसी कार्यक्रम को खास बनाने के लिए तो यह खास तौर पर उपयोग किया जाता है. भाई, उपयोग आखिर क्यों न किया जाए. जमाना ही इसका है. युवाओं को आकर्षित करना है, तो इसका तड़का लगाना ही होगा, अन्यथा कोई भी कार्यक्रम नीरस हो जाएगा. सबसे बड़ी बात यह है कि इस ट्रिपल एस फॉर्मूले में एक एस का उपयोग प्राय: अपने फायदे के लिए किया जाता है. 

रविवार, 5 अप्रैल 2015

बनारसी घाट के बीच गंगा बेचारी


विश्वत सेन
गंगा. पतित पावनी गंगा. इलाहाबाद वाली नहीं. हरिद्वार और ऋषिकेश वाली भी नहीं, ठेठ बनारस वाली. एकदम सपाट. दक्खिन से उत्तर की ओर बहने वाली. इस सतत अविरल प्रवाहिनी गंगा की सफाई के लिए केंद्र सरकार ने अलग एक मंत्रालय का गठन किया है. नयी सरकार बनी, तो पतित पावनी गंगा की सफाई का अभियान चला. अभी मार्च के अंतिम सप्ताह में बनारसी गंगा में लावारिस या सावारिस शवों को न बहने देने के लिए वित्त मंत्री अरुण जेटली ने शववाहिनी नौका भी उदघाटन किया. दुखद और बेहद चिंताजनक बात है कि यह शववाहिनी नौका मणिकर्णिका घाट के सामने खड़ी रहती है और उसी के सामने से लावारिस शव गंगा में प्रवाहित होता हुआ दक्षिण से उत्तर की ओर बढ़ जाता है. यही तो है बनारसी ठाठ. ठाठदार भला किसी की चिंता करता है? बनारसी ठाठ की बात ही निराली है. यह ज्ञान का विश्वविख्यात केंद्र है. इस शहर में ज्ञानी पैदा होते हैं औरनिवास भी करते हैं. ज्ञान और आस्था का केंद्र है, तभी तो यहां के दशाश्वमेध, अस्सी और ललिता घाट पर नित्यप्रति सायंकाल को गंगा आरती होती है. आरती के समय साधु-संत, देसी-विदेशी पर्यटकों के अलावा गंगा की छाती पर सुरक्षा कवच बनाते हुए चौकड़ी मारने वाले नाविक अपने-अपने नावों पर लोगों को सवार करके विहंगम दृश्य तैयार करते हैं. अभियान पर आस्था भारी पड़ जाती है. ज्ञानियों की इस नगरी में लोग भूल जाते हैं कि अविरल प्रवाहिनी गंगा को स्वच्छ रखना भी है. गंगा जब संसार के पतितों के पाप को धो सकती है, तो भला खुद को स्वच्छ नहीं रख सकती? गंगा को लेकर ज्ञानगंगा शिथिल हो जाती है और शिथिल हो जाते हैं वे लोग, जिनके कंधों पर इसे निर्मल बनाने की जिम्मेदारी है. उदघाटन और शिलान्यास कर दिया जाता है. क्रियान्वयन की निगरानी का इंतजाम भी गंगा की धाराओं की तरह बह जाता है. अगर बनारस का अपना अलग अंदाज और ठाठ है, तो भला उनका नहीं है क्या, जो निर्मलता को बढ़ावा देने का दिखावा कर रहे हैं? पान की पचपचाती पीक की तरह शहर की गलियों से निकलने वाला अवजल भी गंगा में समाहित होकर पाक-साफ होने के लिए बेचैन नजर आता है. आपस में नालियां होड़ मचाती हैं कि पहले मेरा, तो पहले मेरा. यह अवजल थोड़े ही है? यह तो जल निगम द्वारा यहां के निवासियों को दिया जाने वाला गंगाजल ही है, जो नालियों के माध्यम से फिर गंगा में समाहित हो रहा है. यह तो प्रकृति का नियम है. वर्षा का पानी नदियों में और नदियों का पानी सागर में, फिर सागर का पानी संघनित होकर वर्षा की बूंद बन जाता है. उसी तरह गंगा पानी नदी से निकलकर घरों में जाता है और फिर वही पुन: गंगा में आता है, तो इसमें बुराई क्या है? यह उसी का निकला हुआ अंश ही तो है, जो कुछ घंटे के लिए उससे जुदा हुआ था. जब गंगाजल पवित्र है, तो भला यह अपवित्र कैसे हो सकता है? यह व्यापारियों, ज्ञानियों, औघड़ों, फक्कड़ों, फकीरों और फटेहालों की नगरी है. तभी तो यहां घाट घाट का पानी पीने वाले लोग आते हैं और बनारसी बाबू बन जाते हैं. तभी तो गंगा के घाटों के किनारे हर शाम मिलने वाला माता अन्नपूर्णा के प्रसाद को ग्रहण करनेवालों का तांता लगा रहता है. क्या अमीर और क्या गरीब. सभी समभाव से दान-दक्षिणा देते हुए प्रसाद ग्रहण करते हैं. यहीं दिखता है देश का असली समाजवाद. एक ही पांत में बैठ कर खानेवाले अमीर और गरीब, लेकिन जिस गंगा के घाट पर समाजवाद का यह चेहरा दिखाई देता है, गंगा की सफाई के समय इसमें विद्रुपता आ जाती है. लोग बिसर जाते हैं सफाई अभियान को. बिसरें भी क्यों नहीं. जब बड़े-बड़े समाजवादी सूरमा बिसर जाते हैं. कुछ भी हो भइया, बनारसी ठाठ के बीच गंगा की जो दयनीय स्थिति बनी है, वह चिंतन के लायक नहीं, बल्कि चिंतनीय है. बनारसी ठाठ के बीच गंगा लाचार और बेबस बनी है.
जय हो गंगा मइया की, जय हो बाबा विश्वनाथ की.
अप्रैल पांच, 2015

सोमवार, 8 सितंबर 2014

नेताओं का कैंपस सलेक्शन

विश्वत सेन
‘कादिर मियां! यह भारत है. इक्कीसवीं सदी का भारत. दुनिया की नजरों में आज का भारत सिर्फ एक मंडी भर है. यहां पूरे संसाद के कारोबारी सूई से लेकर हवाई जहाज तक बेचने आते हैं. इसीलिए आप देखते हैं कि किसी वस्तु का अनुसंधान अमेरिका में होता है, निर्माण यूरोपीय देश करते हैं और बिक्री के लिए सबसे पहले उसकी लॉन्चिंग भारत में की जाती है. उदारवादी अर्थव्यवस्था में हमारा देश सिर्फ और सिर्फ एक बड़ा बाजार है, क्योंकि यहां के दिखावापसंद लोगों के पास क्रयशक्ति अधिक है. गरीब से गरीब आदमी भूखा मरता रहेगा, फिर भी दो आने का जुगाड़ होते ही वह सीधा बाजार की ओर भागता है. यह हम ही नहीं, अंगरेज भी कहा करते थे.’ भूपाल बाबू पार्टी के दफ्तर में कार्यकताओं की मीटिंग में प्रदेश प्रमुख को ‘क्रांति के डॉ डैंग’ की तरह संबोधित कर रहे थे. वे रुके नहीं, अपने ही रौ में बोल रहे थे-‘आज जब हम इक्कीसवीं सदी के भारत की बात करते हैं, तो हमारे पास आउटसोर्सिग और कैंपस सलेक्शन के अलावा बचा ही क्या है? हम वैज्ञानिक, आइआइटियन, इंजीनियर, डॉक्टर, डाटा एंट्री ऑपरेटर, कंप्यूटर ऑपरेटर, छात्र, शिक्षक, नेता, अभिनेता, चोरद्व डाकू, पत्रकार, पैंतराकार, झाड़-पोंछा लगाने वाली दाई, नर्स, अंडरवर्ल्ड डॉन, पंडित, मुल्ला, मुख्तार सबकी आउटसोर्सिग ही तो करते हैं. इन्हें भारत में पाल-पोस कर, पढ़ा-लिखा कर व्यावसायिक कोर्स कराते हैं और मल्टीनेशनल कंपनियों के माध्यम से मोटे सालाना पैकेज पर कैंपस सलेक्शन करके झट बाहर भेज देते हैं. हर क्षेत्र में ट्रेनिंग देने के स्कूल और कॉलेज खुले हुए हैं. हमारी राजनीति का भी ट्रेनिंग स्कूल और इंस्टीट्यूट है.’ भूपाल बाबू अब भी टेप रिकॉर्डर की तरह बोले जा रहे थे. बोल रहे थे-‘पहले हमारा विद्यार्थी कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में संचालित छात्र राजनीति संगठनों में दाखिला लेकर ट्रेनिंग लेता था, लेकिन बदले जमाने के अनुसार अब हम भी मल्टीनेशनल कंपनियों की तरह डाइरेक्ट कैंपस सलेक्शन करना शुरू कर दिये हैं. जो लड़का चोर है, झूठा है, फरेबी और धोखेबाज है, चाकू व गोली-बारूद चलाता हो या चलवाता हो, दंगा करता हो या करवाता हो ऐसे लड़कों को हम मोटे दैनिक पैकेज पर कैंपस सलेक्शन करते हैं. वहीं, जो लड़की या महिलाएं पति, सास, मां-बाप, भाई-बंधु, समाज विरोधी हो, बेवजह सीधे-सादे या फिर मनचलों को अपनी जाल में फांसती हो और फिर उस पर कानून का सहारा लेते हुए यौन शोषण का आरोप लगवाती हो, जेल भिजवाती हो, नश्तर चलाती है, नैन मटकाती हो, वह हमारी परीक्षा में फस्र्ट डिविजनर है. उसे भी हम दैनिक मोटे पैकेज पर सलेक्ट करते हैं. हम जानते हैं कि इस तरह के बालक-बालिकाएं, पुरुष महिलाएं अव्वल दज्रे का नेता हो सकते हैं. कादिर मियां, ऐसे लोगों को हम पार्टी में ऊंचे ओहदे पर बिठाने के साथ राजसी ठाट-बाट भी उपलब्ध कराते हैं.’
भूपाल बाबू ने प्रदेश प्रमुख कादिर मियां को आदेशी लहजे में कहा-‘हमने मंगरू की बेटी के बारे में चर्चाएं खूब सुनी है. जाइए उसका कैंपस सलेक्शन करके ले आइए. उसे पार्टी में ऊंचा ओहदा देने के साथ ही राजसी ठाट-बाट भी उपलब्ध करायेंगे. वोट में जीत हासिल करनी है, तो मंगरू की बेटी को युवाओं को लुभाने के लिए सलेक्ट करना जरूरी है.’
आधे घंटे के लेक्चर के बाद भूपाल बाबू के इस आदेश पर कादिर मियां ने ऐतराज जाहिर किया. कहा-‘लेकिन साहब, यदि हम मंगरू की बेटी को सलेक्ट कर लेते हैं, तो नीचे और ऊपर के नेताओं में हड़कंप मच जायेगा. पहले उन दोनों से विचार तो कर लेते. फिर साह-पुरैनी भी नाराज हो जायेंगे.’
कादिर मियां की यह बात मानों भूपाल बाबू को बचकानी लगी. उन्होंने कहा-‘निरा मूर्ख हो. यदि मैंने उसे सलेक्ट करने के लिए कहा, तो समझो सभी शक्तियां मेरे आदेश में ही छिपी हैं. जाओ, मौका मत गंवाओ और मंगरू को सूचना दे दो कि उसकी बेटी का राजनीति में कैंपस सलेक्शन हो गया है. उसे मोटी रकम के साथ पूरे शानो-शौकत से रहने-सहने की व्यवस्था कर दी जायेगी.’
इसी बीच कादिर मियां कार्यकताओं की ओर देख कर बोले-‘क्यों भाइयों, आपलोगों को यह प्रस्ताव मंजूर है?’ उनके यह बात कहते ही मानों रटंतू तोतों ने एक साथ कहा-‘हां जी, हमें पसंद है. हमें हमारा नया नेता मिल जायेगा, इससे अच्छी बात और क्या हो सकती है.’
सितंबर, 08, 2014