शनिवार, 7 जुलाई 2018

मीडिया भी 'अमीर और गरीब' हो गया (विरासत के झरोखे से...भाग-दौड़-10)

विश्वत सेन

हमारा देश भारत आम तौर पर विकासशील देश या फिर गरीबों वाला देश कहा जाता है। कहा जाना भी वाजिब है, क्योंकि यहां की अर्थव्यवस्था में चंद मुट्ठी भर करीब दो फीसदी के आसपास ऐसे लोग हैं, जिनके पास देश की आधी से अधिक संपत्ति है। बाकी के 98 फीसदी लोगों के पास 50 फीसदी। 
हमारे देश में जहां कहीं भी अव्यवस्था या गरीबों और मजलूमों के साथ अन्याय की घटना सामने आती थी, तो यहां की मीडिया शासन-प्रशासन की नाक में दम कर देता था, लेकिन अब शासन और प्रशासन के साथ-साथ मीडिया भी गरीबों और मजलूमों से विमुख हो गया है। चाहे वह सरकार में शामिल राजनेता हो या फिर गली-कूचे का छुटभैय्या नेता, लालफीताशाही में अहम किरदार निभाने वाला बड़ा वाला आईएएस ऑफिसर हो या फिर हजारीबाग के बंदोबस्त कार्यालय में काम करने वाला कोई कर्मचारी, सबको हर जगह हरियाली ही हरियाली दिखाई दे रही है और इन्हीं लोगों के साथ मीडिया के लोगों को भी हरियाली दिखायी दे रही है। खासकर, भोंपू मीडिया और बुद्धू बक्सा के लोगों को तो और भी अधिक हरियाली दिखाई दे रही है, क्योंकि उन्हें सत्ता की सरपरस्ती हासिल है। इसीलिए उन्हें अपने-अपने बक्सों पर राजनेताओं के पैनल के साथ राष्ट्रवाद, फ्रॉडवाद, रेप, गैंगरेप, धोखाधड़ी, बाबागिरी आदि मुद्दों पर बहस करने से फुर्सत ही नहीं होती। अब कोई यह नहीं दिखाता या फिर छापता है कि आज फलाने स्थान पर फलाने अधिकारी ने फलाने गरीब के साथ अनर्थ किया और मजलूम की रोटी को रिश्वत में बदलकर अपनी जेब में रख लिया।
आजकल मीडिया यह दिखाने और छापने में मशगूल है कि फलाना नेता पर फलानी जांच एजेंसी ने कार्रवाई की और फलाने को जेल भेज दिया। यह इसलिए भी उसके लिए जरूरी हो जाता है, क्योंकि ऐसा करने के लिए उसे उसके आका की ओर से निर्देश दिया जाता है। फिजां में फूल खिला है, तो धरती लाल होगी ही। यह फूल पलाश का नहीं है कि उसके इर्द-गिर्द भौंरे या मधुमक्खियां टहलेंगे और उसके पराग से मधु या शहद बनाकर सूखी धरती पर मिठास फैलायेंगे। यह फूल कमल का कंटीला फूल है, जिसमें से पराग लेने के लिए भौंरे जाते हैं और उसका पराग भी चूसते हैं, मगर सही मायने में शहद बनाने वाली मधुमक्खियां दूर ही रहती हैं। शायद इसीलिए इस फूल की पंखुड़ियां कोमल न होकर तलवार के सरीखे धारदार हो गयी हैं और वहशियों के लिए हथियार बन गयी हैं। शायद यही कारण है कि देश का मीडिया भी तलवार सरीखे हो गयी इन पंखुड़ियों के भय से दीन-हीन गरीबों और मजलूमों से  विमुख होकर अमीरी-अमीरी का खेल खेल रहा है। अलबत्ता, कमजोर आदमी की सुंदर बहू की तरह कुछ दबे-कुचले टाइप के मीडिया के धड़े हैं, जो अपनी पत्रकारिता के धर्म का निर्वहन करते हुए गरीबों और मजलूमों का अब भी साथ दे रहे हैं। मगर, उनकी दशा भी दयनीय हो गयी है या दयनीय करने का प्रशासकीय प्रयास किया जा रहा है, ताकि वह शासकीय सकारात्मकता को परोसकर वाहवाही के पात्र बन सकें।
मगर, इन सबके बीच सबसे बड़ा सवाल यह पैदा होता है कि मीडिया के अमीरी और गरीबी का यह खेल कितना दिन तक चलेगा? आज सामाजिक विकृतियों को जन्म देने वाले सत्तासीन है, तो इनकी पांचों उंगलियां घी में नजर आ रही हैं। कल यह तलवार की धार वाले फूल की पंखुड़ियां मुरझा जाएंगी, तब क्या होगा? क्या कभी किसी ने इस बारे में कुछ सोचा है?

अंतिम कड़ी

शनिवार, 3 मार्च 2018

यह 'जोर' खतरनाक है

विश्वत सेन
आज त्रिपुरा में ढाई दशक पुरानी वामदल की 'मानिक' सरकार ध्वस्त हो गयी। आज के करीब पांच साल पहले बंगाल में भी ज्योति बसु का राजनीति से संन्यास लेने के बाद बनी बुद्धदेव सरकार भी ध्वस्त हो गयी थी। दोनों सरकारों की सरकार के अवसान में एक ही समानता है और वह हिंसा है। तब महीनों तक राजनीतिक जुगलबंदी से महीनों तक सिंगूर जला था, आज दार्जिलिंग समेत पूरा देश जल रहा है।
आज देश में हर काम जोर-जबरदस्ती किया जा रहा है या कराया जा रहा है। राजनीति में दक्षिण पंथ जोर-जबरदस्ती कर रहा है, तो सार्वजनिक और निजी क्षेत्र के संस्थानों में पेबस्त समर्थक। हर जगह लोग-बाग मनमानी के शिकार हैं। प्रत्यक्ष रूप से गैर-भाजपा दलों के नेताओं को जबरिया भाजपा या एनडीए के घटक दल बनने पर मजबूर किया जा रहा है या नहीं मानने पर उन्हेंं विभिन्न आरोपों में 'भितराया' जा रहा है।
सरकारी और निजी प्रतिष्ठानों में गैर-भाजपा सोच रखने वाले कामगारों को या तो धकियाया जा रहा है या फिर ऐसा माहौल बनाया जा रहा है कि आत्मसम्मानी जिल्लत और जलालत की नौकरी को रात मार दे।
देश में इस समय यह जो 'जोर-जबरदस्ती' किया जा रहा है, उसका एकमात्र कारण देश के लोगों का माइंडवाश करना है। जो उनकी बात मान गये, वे भी प्रताड़ना के शिकार और जो नहीं मानने रहे, वे प्रताड़ित तो किये ही जा रहे हैं। जो लोग प्रताड़ना के भय से कायराना अंदाज में तोहफा कबूल करवा रहे हैं, उनसे यह सोचकर बदला लिया जा रहा है कि तुम और तुम्हारे पूर्वजों ने हमें सत्ता से दूर रखा। अब हम तुम्हें अपने पास रखकर समुचित सुविधा से भी दूर रखेंगे।
आज यही वजह है कि जितनी श्रमशक्ति को हर साल देश में रोजगार दिया नहीं जा रहा, उससे कहीं ज्यादा नौकरी-पेशा लोग बेरोजगार होने के कगार पर हैं या बेरोजगार हो गये हैं। देसी-विदेशी सर्वेक्षण एजेंसियां हर साल पैदा होने वाली नयी श्रमशक्ति के आंकड़ों को तो पेश करती हैं, मगर बिरली एजेंसी ही ऐसी है, जो 40-45,  46-50, 51-55 और 56-60 आयु वर्ग के बीच नौकरी गंवाने वालों की रिपोर्ट पेश करती हो।
चौंकाने वाली बात यह भी है कि बीते चार सालों के दौरान 40-60 आयु वर्ग के कामगारों का रोजगार या तो समर्थक अधिकारियों की वजह से जा रही है या फिर मजबूरन उन्हें छोड़ना पड़ रहा है। देश में यह जो एक अलग तरह की बेरोजगारी पैदा हो रही है, वह नवसृजित श्रमशक्ति की बेरोजगारी से भी अधिक खतरनाक है।
नवसृजित श्रमशक्ति में एक युवक को रोजगार की दरकार रहती है, मगर बरसों से कार्यरत कामगारों के पीछे परिवार के अनेक सदस्यों की फौज रहती है, जिसमें नवसृजित श्रमशक्ति भी शामिल होती है। ऐसे में, जरा गौर कीजिए कि आज देश में जो 'जोर-जबरदस्ती का खेल चल रहा है, वह राजनीति के लिए ही नहीं, आम अवाम के लिए भी ख़तरनाक है।

बुधवार, 21 फ़रवरी 2018

'फार्ट अटैक' करना भी एक कला है...(विरासत के झरोखे से...भाग-नौ)

विश्वत सेन

बात 1990 के दशक की है। गर्मी का मौसम था और शाम का समय। वहीं करीब पांच बजे रहा होगा। हम बच्चे घर के पास महुआ के पेड़ के नीचे बैठ घटिया रहे थे। साथी खिलाड़ियों का इंतजार था कि आएं, तो घर के सामने वाले फील्ड में फुटबॉल खेलना जाए। उधर, बाबा घर के सामने खटिया बिछाकर किसी की जन्म कुंडली बना रहे थे। उनकी खाट के नीचे हमारा 'कारा' कुत्ता बैठा था। बाबा का कुत्तों से बैर रहता, मगर कारा खासकर उनकी खाट के नीचे ही बैठता। खैर, हम बच्चे बात कर ही रहे थे कि अचानक बम फटने जैसी धड़ाम की आवाज हुई और इस आवाज के साथ ही बाबा की खाट के नीचे बैठा कारा जोर से भौंकते हुए निकला और फील्ड का पता नहीं कितना चक्कर लगा गया। उधर, हम बच्चों को हंसते-हंसते पेट में बल पड़ गया, मगर हंसी थमने का नाम न ले। हालांकि, हमें थे कि बाबा जोर का फार्ट मारते हैं, मगर हंसी कारें की हालत देखकर आ रही थी। उस बेचारे को लाख पुकारें मगर न चुप होने का नाम ले और न रुकने का और बार-बार बाबा की ही ओर मुंह करके भौंके। इसकी परिणति यह हुई कि बाबा अगर दुरा पर बैठ जाएं, तो कारा फील्ड में चला जाए बाबा उसे कभी-कभार प्यार से बुलाएं भी, तो वह उनके पास सटता ही नहीं।
अच्छा, ऐसा भी नहीं था कि बाबा एकांत में फार्ट मारते, जब वह निकलने को होता, तो मार देते। वे उसे अपानवायु कहते। उनके पास मारने की कला भी थी। अगर वे राह में चल रहे होते और फार्ट जोर मार गया, तो धोती पकड़कर 'चुर-चुर, चुर-चुर' करते हुए कुछ दूर चले जाते। खंड़ाऊ की आवाज के साथ फार्ट की आवाज एक अलग आवाज बनाती।
बात फार्ट की है, तो यह जान लेना भी जरूरी है कि उसे निकालना भी बहुत जरूरी है। फार्ट निकालना जीवन का सामान्य प्रक्रिया है, कई बार अगर तेज आवाज के साथ फार्ट निकल जाए तो शर्मिंदगी महसूस होती है। 
एक रिसर्च के मुताबिक, इसमें शर्मिंदगी की कोई बात नहीं बल्कि यह आपके पाचनतंत्र के स्वस्थ होने का संकेत है। पेट के अंदर गैस बनने से हवा निकलती है और हमेशा हवा छोड़ते समय आवाज नहीं होती या दुर्गंध नहीं फैलती है।
एक व्यक्ति औसत रूप से दिन में 14 बार हवा छोड़ता है। ज्यादातर समय हवा बगैर आवाज के बाहर निकलती है और ऐसे में ज्यादातर कार्बन डाइ ऑक्साइड गैस निकलती है। जब तेज गंध के साथ हवा निकलती है तो यह इस बात का संकेत है कि आपको फाइबर लेवल सही मिल रहा है और आपकी आंत में पर्याप्त संख्या में अच्छे बैक्टीरिया हैं। आपकी गैस से बहुत ही असहनीय गंध आती है तो इसका मतलब यह नहीं कि आप अस्वस्थ हैं। इसके उलट इसका मतलब यह है कि आप ऐसी चीजें खा रहे हैं, जिससे हाइड्रोजन सल्फाइड गैस काफी मात्रा में पैदा हो रही है। साथ ही इसका यह मतलब भी है आप हाई फाइबर वाली डायट ले रहे हैं। गैस से गंध निकलना उस समय चिंताजनक हो सकता है जब आप डेयरी उत्पाद का ज्यादा इस्तेमाल कर रहे हैं।
हायर पर्सपेक्टिव नाम की पत्रिका के मुताबिक, फार्ट (हवा छोड़ना) में गंध मुख्य रूप से हाइड्रोजन सल्फाइड के कारण आती है। हम कई तरह के खाने खाते हैं जिनके पचने के बाद कम्पाउंड्स यानी हाइड्रोजन सल्फाइड बनती है। इससे कई तरह की गंध पैदा होती है जो गैस के साथ बाहर निकलती है। जब फार्ट में तेज गंध हो तो यह इस बात का मजबूत संकेत है कि आपके पेट में सब कुछ ठीक है।
कई स्टडी में यह बात सामने आई है कि गैस सूंधने वाले लोगों को भी फायदा होता है। मेथेन की गंध बीमारियों के खतरे को कम कर देती है और लोगों को लम्बे समय तक जिंदा रहने में मदद करती है। इस गंध से सही होने वाली एक बीमारी डिमेंशा है। हाइड्रोजन सल्फाइड इस बीमारी में जिस तरह एंजाइम काम करते हैं, उस तरीके को बदल देती है।
हालांकि आपको इस बात को लेकर सचेत रहना है कि कहां गैस छोड़ी जाए लेकिन गैस से डरने की जरूरत नहीं है। अगर उसमें गंध है तो इसका मतलब आप अच्छा काम कर रहे हैं।

जारी....

मंगलवार, 20 फ़रवरी 2018

झोले वाला किरोड़ीमल (विरासत के झरोखे से...भाग-आठ)

विश्वत सेन

सदी के महानायक श्री अमिताभ बच्चन। वे फिल्म बनाने के शौकीन और हम देखने के। अच्छा लगता, उनकी फिल्म देखकर। कुछ सीखने को मिलता। उनकी फिल्मों में एक चीज कामन थी और वह थी किरोड़ीमल या फिर सेठ किरोड़ीमल। यह किरोड़ीमल फिल्म में सिक्वेंस के हिसाब पटकथा लेखक डालते थे या फिर दर्शकों के बीच रोचकता पैदा करने के लिए महानायक किरोड़ीमल वाला एकाध सीन पेबस्त कराते, इसका मुझे पता नहीं। इसे वही जानें। हमने तो देखा, उसी को फिल्म की ब्यूटी मानी। अब जैसे फिल्म जादूगर को ही ले लें। पूरा एक सीन किरोड़ीमल पर पेबस्त है।
 खैर, फिल्म है। देखा, मनोरंजन और बात खत्म। मगर, बाद के बरसों में जानने-समझने का मौका मिला तो समझा, 'हो सकता है दिल्ली के किरोड़ीमल कॉलेज से उनका नाता रहा है, इसलिए एक काल्पनिक किरदार के तौर पर उसे पेश किया गया। वैसे, फिल्मों के लिए किरोड़ीमल टाइप के सेठों के किरदार आम तौर पर काफी प्रचलित रहा है। इस लिहाज से भी हमने इस चिरजीवि पात्र पर ज्यादा माथा-पच्ची नहीं की। भाई फिल्म है, उसे मनोरंजन के तरीके से दो। अब यह थोड़े पता था कि 20वीं सदी के फ़िल्मों का यह चिरजीवि किरदार 21वीं सदी तक अपने आपको फिल्मी पर्दे से निकालकर आम जनजीवन में इतनी गहरी पैठ बना लेगा? ये बात अब समझ में आ रही है कि सदी के महानायक श्री अमिताभ बच्चन और उनके पहले के फिल्मकारों ने किरोड़ीमल को जीवंत क्यों बनाए रखा था।
एक बात और। वह यह कि हमारे यहां भारत में झोला का बहुत अधिक महत्व है। दुनिया मंगल पर जाने की सोच रही है, मगर आज भी भारत में एक कहावत सरेआम सार्वजनिक तौर पर प्रचलित है, "मेरा क्या, मैं तो ठहरा फक्कड़। झोला उठाऊंगा और चल दूंगा।"
ये झोला और किरोड़ीमल वाला फंडा मुझे बीते चार-पांच दिनों से बखूबी तब और समझ में आने लगा है, जब एक महाघोटाले का उद्भेदन हुआ है। मैं इस पचड़े में नहीं पड़ना चाहता कि उसके राजनीतिक निहितार्थ क्या हैं, मगर यह जरूर समझ में आ गया कि बैंकों का हजारों करोड़ रुपयों का कर्ज डालकर विदेश भागने वाले वहीं तो झोले वाले किरोड़ीमल हैं, जिनका अक्स अक्सर फ़िल्मों में उकेरा गया है। यह बात दीगर है कि संदर्भों में बदलाव आया है, मगर चरित्र तो हू-ब-हू वहीं है।
आपने, हमने सबने देखा है कि फिल्मों के किरोड़ीमल जनता के पैसों पर एशो-आराम का साम्राज्य खड़ा करते हैं और जब भेद खुल जाता है या खुलने लगता है, तो झोला उठाकर विदेश भाग जाते हैं या फिर भागने की तैयारी कर रहे होते हैं। अब सवाल यह पैदा होता है कि क्या सरकार इन झोले वाले किरोड़ीमलों को फिल्मों के नायकों की तरह पकड़ेगी या फिर...?

जारी...

सोमवार, 19 फ़रवरी 2018

"मुर्गा भौंकता है" (विरासत के झरोखे से...भाग-सात)

विश्वत सेन

"मुर्गा भौंकता है।" है न अचरज की बात! यह वाक्य पढ़कर आप कहेंगे कि आपसे होली के मौसम में ठिठोली की जा रही है, मगर आप इसे होली की ठिठोली न समझें। यह हकीकत है। प्राकृतिक तौर पर तो कुत्ता भौंकता है, मगर दुनिया में लोग मुर्गे को भी भौंका रहे हैं; जैसे भारत में पेपरलेस इकोनॉमी के लिए 'अनहोनी को होनी और होनी को अनहोनी' में तब्दील किया जा रहा है।

मुर्गे का भौंकना भी नेचुरली हैरान करने वाली बात है, मगर मलेशिया की सरकार ने इसे सच कर दिखाया है। मलेशिया भारत का मित्र राष्ट्र है और सत्तासीन होने के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र दामोदर भाई मोदी मलेशिया का दौरा भी कर चुके हैं। जाहिर सी बात है, 'दुनिया का विश्वगुरु बनने के लिए प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व वाली सरकार अननेचुरल को प्रैक्टिकल बनाने के लिए भगीरथ प्रयास कर सकती है, तो भला मलेशिया पीछे क्यों रहे। सो, उसने 'मुर्गे को भौंकाने का भगीरथ प्रयास' कर दिया। आखिर भारत का मित्र है और हर मित्र अपने अनन्य का अनुकरण करता ही है और करना चाहिए।

दरअसल, वाकिया यह है कि मलेशिया सरकार ने लूनर न्यू ईयर को सेलिब्रेट करने के लिए पूरे पन्ने का एक विज्ञापन प्रकाशित करवाया है। इस विज्ञापन में मुर्गे को भौंकते हुए दिखाया गया है। इसका कारण यह है कि चीनी राशि चक्र में 12 साल का एक चक्र माना जाता है। इसमें हर साल को एक जानवर के रूप में दर्शाया जाता है। इस हिसाब से मलेशिया में चीनी राशि चक्र के अनुसार रूस्टर ईयर यानी मुर्गे वाला साल अभी हाल ही में खत्म हुआ है। अब डॉग ईयर शुरू हुआ है। मलेशिया सरकार के वाणिज्य मंत्रालय ने विज्ञापन के माध्यम से डाग ईयर की शुभकामनाएं दी, मगर इस विज्ञापन में मुर्गे को चीनी भाषा में कुत्ते की तरह भौंकता हुआ दर्शाया गया है यानी दो जैविक प्रजातियों के नेचुरल कार्य-व्यवहार का घालमेल। जैसे भारत में इस समय हिंदू धर्म के नाम पर घालमेल किया जा रहा है। आर्य संस्कृति के सनातन धर्म को जबरन हिंदू धर्म बनाया जा रहा है।

खैर, मलेशिया सरकार के वाणिज्य मंत्रालय ने विज्ञापन के जरिए घालमेल तैयार कर तो दिया, मगर इस विज्ञापन के बाद उसे आलोचना का भी शिकार होना पड़ा। आनन फानन में वाणिज्य मंत्रालय इसे तकनीकी त्रुटि बताकर माफी भी मांग लिया, मगर तब तक बहुत देर हो चुकी थी। डिजिटाइजेशन के इस युग में जहां व्हाट्सएप जैसे महाज्ञानियों की यूनिवर्सिटी संचालित हो रही हो, तो भला #मिर्च_मुसल्लम के साथ यह ज्ञान प्रसारित न हो, यह संभव नहीं। सो, मुर्गे के भौंकने वाला ज्ञान भी सोशल मीडिया पर वायरल हो गया और अब भारतीय अखबारों की सुर्खियां बन गया। मुर्गे को भौंकने वाली यह खबर सहूलियत के हिसाब से प्रकाशित की जा रही है और लोगों द्वारा नमक, मिर्च मसाले के साथ इसका मजा भी लिया जा रहा है। मैंने भी सहूलियत के हिसाब से आपके लिए परोसा है, आप भी मजे लें।

जारी...

सोमवार, 12 फ़रवरी 2018

देश ही नहीं, विदेशों में भी हिंदी का 'हवा महल' बना रहा रेडियो (विरासत के झरोखे से...भाग-छह)

विश्वत सेन

1924 में जब मद्रास प्रेसीडेंसी क्लब ने भारत में स्थापना की थी, तब उसके संस्थापकों को यह गुमान भी नहीं होगा कि यह रेडियो एक दिन भारत ही नहीं, दुनिया के कई देशों में हिंदी का 'हवा महल' तैयार कर देगा। जी हां, आप सौ फीसदी सही पढ़ रहे हैं। भारत में रेडियो की स्थापना आज से करीब 194 साल पहले 1924 में हुई थी। इसकी शुरुआत मद्रास प्रेसीडेंसी क्लब ने की थी। स्थापना के तीन साल बाद तक इस क्लब ने रेडियो से प्रसारण का काम किया, मगर आर्थिक तंगी के कारण इसका प्रसारण बंद कर दिया गया।

मद्रास प्रेसीडेंसी क्लब का रेडियो प्रसारण बंद होने के बाद 1927 में ही तब के बांबे और आज की मुंबई के कुछ व्यापारियों ने कलकत्ता और मुंबई से भारतीय प्रसारण कंपनी (Indian Broadcasting Company) की स्थापना कर रेडियो पर कार्यक्रमों का प्रसारण शुरू किया। यह कंपनी भी 1930 के आते-आते रेडियो कार्यक्रम के प्रसारण में विफल साबित हुई। इसके दो साल बाद भारत में शासन कर रही अंग्रेजी हुकूमत ने रेडियो कार्यक्रमों का प्रसारण करने का जिम्मा अपने हाथों में ले लिया। उसने अलग से एक प्रसारण विभाग स्थापित कर भारतीय प्रसारण सेवा की शुरुआत की, जिसका 1936 में नाम बदलकर All India Radio कर दिया गया। इसे संचार विभाग देखा करता था। देश जब आजाद हुआ और आजाद भारत की नमी सरकार पर रेडियो के प्रसारण का भार पड़ा, तो 1957 में इसका नाम "आकाशवाणी" रखा गया। आकाशवाणी को संचालित करने का प्रसारण एवं सूचना मंत्रालय को सौंपा गया।

देश आजाद होने तक यानी 1947 तक देश में रेडियो के कुल छह स्टेशन ही हुआ करते थे। 1990 का दशक आते-आते पूरे देश में करीब 146 एएम रेडियो स्टेशन खोले जा चुके थे, जिनसे हिंदी और अंग्रेजी के अलावा अन्य क्षेत्रीय भाषाओं में समाचारों और कार्यक्रमों का प्रसारण किया जाता था। 1990 के मध्य तक 31 नरेंद्र एएम और एफ एम स्टेशनों की स्थापना की जा चुकी थी। 1994 में देश के लोगों को आपस में जोड़ने के लिए करीब 85 FM और 73 वेब स्टेशनों की स्थापना की गई।

बात जब रेडियो की हो और उसमें विविध भारती की चर्चा न हो, तो बेमानी ही होगी। जी हां, वहीं अमीन चाचा यानी अमीन सयानी वाला विविध भारती, जिनकी आवाज का जादू आज भी रेडियो सुनने वालों के सिर चढ़कर बोलता है। इस विविध भारती की स्थापना 1967 में विज्ञापन सेवा प्रभाग द्वारा की गयी।

विविध भारती आकाशवाणी या All India Radio की सबसे अच्छी सेवाओं में एक थी। विविध भारती का 'हवा महल' और 'सैनिक भाइयों के लिए गीत-संगीत का कार्यक्रम सबसे ज्यादा लोकप्रिय है।

देश के अलावा विदेशों में भी All India Radio या अन्य रेडियो स्टेशनों के माध्यम से हिंदी एवं अन्य भारतीय भाषाओं का प्रसारण किया जाता है। कहा जाता है कि 1 अक्टूबर, 1939 को ब्रिटिश हुकूमत ने अफगानिस्तान के निवासियों पर निर्देशित कार्यक्रम नाजियों के दुष्प्रचार के मुकाबले के लिए किया था। उस समय ऐसे कार्यक्रमों का प्रसारण 16 विदेशी और 11 भारतीय भाषाओं में किया गया था।

खैर, जहां तक भारतीय रेडियो का विदेशों में प्रसारण की बात है, तो 1994 में भारत सरकार ने विदेशों में हिंदी समेत अन्य भारतीय भाषाओं के श्रोताओं के लिए 70 घंटे की खबरें और मनोरंजक कार्यक्रमों के प्रसारण की शुरुआत की। यह प्रसारण 32 साफ्टवेयर ट्रांसमीटर ओर हाई पावर शार्ट वेब बैंड के माध्यम से किया जाता था। आज आलम यह है कि दुनिया के कई प्रमुख देशों में रेडियो के जरिए हिंदी कार्यक्रमों का प्रसारण किया जा रहा है।

इन देशों में रेडियो पर है हिंदी की धूम
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मारीशस
रेडियो प्लस- हिंदी, भोजपुरी, तमिल, तेलुग

बेस्ट एफ एम- हिंदी, अंग्रेजी, क्रियोल

टाप एफ एम- हिंदी, फ्रेंच, क्रिओल

रेडियो मारीशस- हिंदी, उर्दू

ताल एफ एम- हिंदी, भोजपुरी

रेडियो प्लस- हिंदी, फ्रेंच, क्रियोल

म्यूजिक एफ एम- हिंदी, अंग्रेजी, क्रिओल

अमेरिका
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104.9 एफ एम- भारतीय भाषा

1110 एएम- भारतीय भाषा

92.7- भारतीय भाषा

ईज़ी 96- हिंदी

मेरा संगीत- बालीवुड के हिंदी गीत

ईसीबी रेडियो- हिंदी, अंग्रेजी

त्रिनिदाद और टोबैगो
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रेडियो जागृति- हिंदी
हेरिटेज रेडियो- हिंदी
रेडियो 90.5 एफ एम- हिंदी

दुबई
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हम 106.2- हिंदी
सिटी 1016- हिंदी
रेडियो स्पिइस 105.4 एफ एम- हिंदी

नोट: विश्व रेडियो दिवस पर विशेष

जारी.....

शुक्रवार, 9 फ़रवरी 2018

बदल गये 'महात्मा' (विरासत के झरोखे से....(भाग-पांच)

विश्वत सेन

बचपन में जब हम एक क्लास उत्तीर्ण करके दूसरे वाले बड़े क्लास में जाते, तब एक अलग तरह का उत्साह, उल्लास और ललक रहती। अब एक ही तरह के पाठों को रोज बांचना नहीं पड़ेगा और न ही एक ही तरह के अभ्यास वाले प्रश्नों को हल करना पड़ेगा। आज के निजी स्कूलों के बच्चों की तरह चमचमाते जिल्द वाली किताब और कापियां आसानी से उपलब्ध नहीं होतीं। बिहार पेपर मर्चेंट एसोसिएशन (बी पी एम ए) की कापियां राशन की सरकारी दुकान या कोटे से खरीदी जातीय और किताबें सरकार द्वारा अनुदानित होतीं और स्कूल से ही मिलती नहीं थीं। अच्छा, हमारे समय में हर दूसरे-तीसरे महीने सिलेबस भी नहीं बदलता, इसलिए स्कूल में किताब आने के पहले वार्षिक परीक्षा के समय से ही अपने वरिष्ठ छात्रों से पुरानी क़िताबें लेने का छोड़-छोड़ शुरू हो जाता। मजे की बात देखिए, पहली कक्षा से पांचवीं कक्षा तक की किताबें आसानी से मिल जातीं, मगर छठी से 10वीं तक में झोल था। पांचवीं तक हद से हद पांच किताबें होतीं और दो BPMA की अभ्यास पुस्तिका। इनमें पहाड़ा, गिनती और गणित के लिए सादे पन्ने वाली एक और हिंदी समेत अन्य विषयों के लिए दूसरी रूलदार। छठी में जाने के बाद एक अंग्रेजी की चार लाइन वाली काफी बढ़ जाती। अच्छा, पांचवीं तक हम अभ्यास पुस्तिका का इस्तेमाल कम और स्लेट-पेंसिल का इस्तेमाल ज्यादा करते, ताकि एक तो अक्सर गोल-गोल बने और दूसरा कोटे से मिलने वाली अभ्यास पुस्तिका के पन्ने कम खर्च हों। तीसरा यह कि फाउंटेन पेन, स्याही और नींबू के पैसों की भी बचत हो। हिंदी अंग्रेजी में लिखना लिखने के अलावा केवल हिसाब बनानें में ही उसका इस्तेमाल होता।
खैर, इसी तरह घिसते-घसीटते हम पहुंच गये नौंवीं कक्षा में। नौंवीं कक्षा मतलब एक सम्मानजनक क्लास। इसके बाद अब 10वीं और फिर सीधा मैट्रिक बोर्ड। मैट्रिक बोर्ड उत्तीर्ण करने का अर्थ यह कि आयरन गेट पार। इसके बाद शिक्षा के लिए खुला आसमान। मगर, नौंवीं कक्षा तक पहुंचने के पहले शर्त यह थी कि आपने पहले की कक्षाओं में जो पढ़ा है, उसका भली-भांति ज्ञान होना आवश्यक है। चाहे वह कोई भी विषय क्यों न हो। जिस विषय में कोई छात्र कमजोर दिखा नहीं कि उसे उसी क्लास में रोक दो, जिसमें वह पढ़ रहा है। अब एक ही क्लास में साल जाया करने के भर से प्राय: सभी बच्चे पूरे साल जी-तोड़ मेहनत करने में लगे रहते। नौंवीं कक्षा के पहले तीसरी-चौथी से ही हमें संस्कृत की सुक्तियां, कबीरदास के दोहे, सुरदास की कुंडलियां, रहीम के दोहे-सवैया, हरिवंश राय बच्चन की बाल कविताएं, सुमित्रानंदन पंत की कविताएं आदि कंठस्थ करा दी गयी थीं या हमने कर लिया था। इन्हीं संस्कृत की सुक्तियों में एक सुक्ति है या उसे श्लोक भी कह सकते हैं, जिसे आज अक्सर बात-बात में राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर आधे-अधूरे तरीके से अपनी राजनीतिक, आर्थिक, धार्मिक सांस्कृतिक सहूलियत के हिसाब से पेश किया जाता है।
श्लोक है-यह
"अयं निज परोवेति गणना लघुचेतसां।
उदार चरितानाम तू वसुधैव कुटुंबकम्।।"

इसका अर्थ यह हुआ कि
"अपना-पराया, तेरा मेरा आदि की गणना करने के बजाय उदार चरित वालों के लिए पूरी पृथ्वी ही कुटुंब के समान है।"

अर्थात
जो व्यक्ति उदार चरित के होते हैं, उनके लिए अपना परिवार, सगे-संबंधी और कुटुंब की बात कौन करे, पूरी पृथ्वी पर निवास करने वाले चराचर जीव-जंतु सभी परिवार या संबंधी हैं।"
इसीलिए हमारे शास्त्रों में पर्वतों, वृक्षों, जीव-जंतुओं को मनुष्यों की तरह व्यवहार करते हुए दर्शाया गया है। आज जिस तरीके से "वसुधैव कुटुंबकम्" के सिद्धांत को परोसा जा रहा है, उसे कहने की जरूरत नहीं है। किसी रटंतु तोते की तरह इसे वांचा तो जा रहा, मगर कर्म की धरातल से यह कोसों दूर है।
खैर, जब हम नौंवीं कक्षा में आए तो समझ और शिक्षा का दायरा बढ़ गया। यहां पर संस्कृत की सूक्तियों के बजाय यक्ष के प्रश्न और युधिष्ठिर के उत्तर आ गये। इन्हीं यक्ष-युधिष्ठिर की प्रश्नोत्तरी में यक्ष ने एक सवाल पूछा था-"क: महात्मनां?" अर्थात "महात्मा कौन है?"

धर्मराज युधिष्ठिर ने जवाब दिया है:
"विपदि धैर्यमथाभ्युदये क्षमा,
सदसि  वाक्पटुता  युधि  विक्रमः।
यशसि  चाभिरुचिर्व्यसनं  श्रुतौ,
प्रकृतिसिद्धमिदं   हि  महात्मनाम् ।।
अर्थात
जो व्यक्ति विपत्ति में धैर्य ,समृद्धि में क्षमाशीलता , सभा में वाक्पटुता , युद्ध में पराक्रम ,यशस्वी ,वेद शास्त्रों को जानता हो, वह इन छह गुण से परिपूर्ण व्यक्ति स्वाभाविक रूप से महात्मा या महापुरुष कहलाता है। 
आज आलम यह है कि हर गली में गेरूआ रूप धारण करके महात्मा जी पधारे जाते हैं। आसाराम और राम रहीम जैसे लोग भी महात्मा ही कहलाना चाहते हैं। यही नहीं बहुत सारे महात्मा तो टेलीविजन के समाचार चैनलों पर बैठकर डिबेट में अपनी महतमै झाड़ते रहते हैं। कोई गेरुआ में, तो कोई सच्चाई के प्रतीक लकदक सफेद कपड़ों में प्रवचन सुना रहे होते हैं। भारत को एक बार फिर विश्व गुरु होने का सपना देखते और दिखाते हैं। मौका पड़ने पर "मां की-धी की" करने से बाज नहीं आते।
खैर, नौंवीं के बाद 10वीं और बोर्ड के बाद इंटर में आया। यहां आने के बाद राष्ट्रपिता महात्मा गांधी, बापू या फिर मोहनदास करमचंद गांधी से रूबरू हुआ। हालांकि, बापू को बचपन से ही जानते थे, मगर व्यापक पैमाने पर समझने का सिलसिला यहीं से शुरू हुआ। हालांकि, बीते दो दशकों से बापू को समझने के प्रयास में लगा हूं, मगर आज तक उन्हें समझ नहीं पाया। हो सकता है, यह मेरी मंदअक्ली हो। फिर हमने यह देखा कि बापू का राजनीतिक इस्तेमाल कैसे होता है। आज के चार साल पहले तक बापू को कांग्रेस की थाती कहा जाता था और आरोप चार साल पहले वाली उदारवादी हिंदूवादी विचारधारा के लोग लगाते थे। आज अचानक बापू का स्वरूप बदल गया। जैसे द्वापर और कलियुग वाले महात्माओं का स्वरूप बदला, उसी तरह महात्मा गांधी या बापू का स्वरूप बदल गया। अब हम जैसे लोग यह सोचने पर मजबूर हैं कि महात्मा का उपयोग सहूलियत के हिसाब वसुधैव कुटुंबकम् की तरह कहां-कहां किया जाएगा? मैं समझता हूं कि बापू को बापू के स्वरूप में और महात्मा को महात्मा के स्वरूप में ही रहने दिया जाए, तो बेहतर हो।
जारी...