बुधवार, 30 मई 2012

पेट का बच्चा बोल रहा है

पेट का बच्चा बोल रहा है,
इधर-उधर वह डोल रहा है।
रस रसायन घोल रहा है,
अंदर से ही तौल रहा है।
लोथड़ा मांस का टटोल रहा है,
भेद राज का खोल रहा है।
पेट का बच्चा बोल रहा है,
इधर-उधर वह डोल रहा है।।

नस-नाड़ी से है अलंकृत,
मातृ स्वास से होता है झंकृत।
रक्त रस से होता है सिंचित,
मॉं के मिजाज से होता है पुलकित।
मॉं के हिय से बोल रहा है,
उछल-कूदकर डोल रहा है।।

नाभि से दोनों का रिश्ता,
मॉं का प्यार मिलता है सस्ता।
पेट में करता है जब क्रीडा,
मॉं को होती है सुखद एक पीड़ा।
अंतर्मन से दोनों बतियाते,
एक-दूजे को खूब धकियाते।
लात से देता अंतर चोट,
बाहर मॉं हंसती लोटपोट।
प्यार से देती है एक थपकी,
शांत होते ही लेती एक झपकी।
ज्ञान चक्षु वह खोल रहा है,
उदक-फुदककर डोल रहा है।।

मॉं के मन को लेता है भांप,
खुश मिजाज या हो संताप।
या कोई पाप करे फिर बाप,
ठंड मौसम हो या फिर ताप।
अभी था अर्द्धवृत्त, अभी गोल हुआ है,
गोलाकार वह डोल रहा है।।

पेट में रह जाती जब जोई,
सुध नहीं लेता उसकी कोई।
नहीं होती फिर मासिक जांच,
उदर में पड़ती रहती आंच।
समग्र समाज की सोच है संकुचित,
बाप ही करा रहा भ्रूण को विकृत।
अप्रसून तन का मोल हुआ है,
गंदे नाले का घोल हुआ है।
चीख-चीख वह बोल रहा है,
छपर-छपर कर डोल रहा है।।

यदि पेट में रहता है ललना,
पहले ही घर में आ जाता पलना।
ऑंगन में बजती शहनाई,
देखभाल करते देवर-भौजाई।
पास-ससुर भी करते ठिठोली,
सबकी निकलती तब ऊंची बोली।
जमीन पर नहीं पड़ता फिर पांव,
भोज में जिमते गांव पर गांव।
धन-दौलत अभी नहीं है प्यारा,
घर में आ गया राज दुलारा।
वह देह की चमड़ी छोल रहा है,
इधर-उधर वह डोल रहा है।।

उछल-उछल कर डोल रहा है,
पेट का बच्चा बोल रहा है।
नहीं चाहिए हमें चॉंद सितारे,
बहना लाकर दे दो प्यारे।
लाकर दे दो मेरी जननी,
और करा दो मेरी मंगनी।
तूने पूरी सृष्टि को है उजाड़ा,
प्यारी बहना को तूने मारा।
तुमने किया है जघन्य पाप,
मैं नहीं दूंगा तुम्हें कोई श्राप।
बस यही एक सत्कर्म करूंगा,
तेरी देह पर न हाथ धरूंगा।
जीवन में जहर तू घोल चुका है,
यह पेट का बच्चा बोल रहा है।।

तेरे मन में थी अभिलाषा,
पहले से थी बेटे की आशा।
तेरा वारिस नहीं बनूंगा,
उल्टे सारे काम करूंगा।
खुद खोज लेना संसार,
नहीं चाहिए मुझे तेरा प्यार।
नहीं चाहिए अर्श और कल्प,
अब लेता हूं एक संकल्प।
तुझ पर नहीं दृष्टि रखूंगा,
तुझसे अच्छा एक सृष्टि रचूंगा।
मानव पुत्र यह बोल रहा है,
पोल खोलकर डोल रहा है।।

विश्वत सेन
मई 31, 2012

सोमवार, 28 मई 2012

शिव पंचाक्षर स्तोत्रं

नागेन्द्रहाराय त्रिलोचनाय भास्मांगारागाय महेश्वराय|
नित्याय शुद्धाय दिगम्बराय तस्मै नकाराय नमः शिवाय||

मंदाकिनी सलिल चन्दन चर्चिताय नन्दीश्वरप्रमथनाथ महेश्वराय|
मंदार पुष्प बहुपुष्प पूजिताय तस्मै मकाराय नमः शिवाय||

शिवाय गौरीवदनाब्जवृन्दसूर्याय दक्षाध्वर नाशकाय|
श्रीनील कंठाय वृष ध्वजाय तस्मै शिकाराय नमः शिवाय||

वशिष्ठ कुम्भाद्भव गौतमार्य मुनीन्द्र देवार्चित शेखराय|
चंद्रार्क वैश्वानर लोचनाय तस्मै वकाराय नमः शिवाय||

यक्ष स्वरूपाय जटाधराय पिनाकहस्ताय सनातनाय|
दिव्याय देवाय दिगम्बराय तस्मै यकाराय नमः शिवाय||

पंचाक्षरमिदं पुण्यं यह पठेच्छिवसंनिधौ|
शिव्लोकम वाप्नोति शिवेन सह मोदते||

-रुद्राष्टाध्यायी 

रविवार, 20 मई 2012

किसान

अभी हुआ है पूरब में सबेरा,
माथा पकड़ बैठ गया किसान।
मंडी में सड़ रहा है अनाज,
भूखों मर रहा है किसान।
हाड़ तोड़ करता वह खेती,
उपजता है खेतों से मोती।
सड़ते अनाज को देखकर,
फट जाती है उसकी धोती।
नीलाम होती है उसकी इज्जत,
घर बैठे बिकता है ईमान।
सडक़ों पर बिखरा है मोती,
जान दे रहा घर में किसान।।

रोते-बिलखते बच्चे उसके,
सिसकती-सुबकती है बीवी।
सटक-चटक जाती है हड्डी,
सुध नहीं लेते भैया और दीदी।
बूढ़े बाप के कन्धों पर,
पड़ जाता है उल्टा भार।
खोती संतति को देखकर,
माता रोती है जार-बेजार।
सूखी है धरती, भूखा पेट,
बंजर भूमि, ऊसरा है खेत।
टूटती-उखड़ती उन सांसों पर,
लोग रहे हैं कई रोटी सेंक।
चमक रहा है उनका कुर्ता,
दमक रही है उनकी शान।
राजनीति की इस बिसात पर,
जान दे रहा खांटी किसान।।

सड़-गलकर बनती थी खाद,
रसायन बन गया ऊर्वरक आज।
खेती पर छाया है बाजारवाद,
अनाज खो रहा है अपना स्वाद।
उत्तम थी खेती, मध्यम बान,
नीच थी चाकरी, भीख निदान।
अब बन गई है चाकरी उत्तम,
सिर पर चढ़ा है मध्यम बान।
नीच हो गई है उत्तम खेती,
जान दे रहा है वही किसान।।

महँगा है बीज, ब्लैक में खाद,
किसी ने कर लिया एकाधिकार प्राप्त।
अब नहीं होता वस्तु से विनिमय,
बढ़ गया है नकदी का मान इस समय।
रुपया भी हो गया है कमजोर,
 निर्यात से अधिक आयात पर जोर।
अर्थव्यवस्था ने मारी है लंगड़ी,
किसानों की टूट गई है टंगरी।
टूटी टंगरी में लगा लगान,
घबराकर जान दे रहा किसान।।

किसानों की नहीं किस्मत फूटी,
राजनीति की सिंक रही है रोटी।
वोट बैंक पर मिलता है पैकेज,
चुनावी बिसात पर बाकी सब डैमेज।
सरकारें सुना रही हैं लोरी,
अनाजों के लिए नहीं है बोरी।
बोरी नहीं है सडऩे का कारण,
समुचित नहीं हो रहा भंडारण।
उचित मूल्य का नहीं है समर्थन,
चीनी कड़वी, फूटे हैं बर्तन।
दरबारियों ने छेड़ा मधुर तान,
जान दे रहा परेशान किसान।।

सुनकर दुनिया है भौंचक,
अधिकारी कर रहे निरीक्षण औचक।
पटवारी वसूली में है मशगूल,
सपोर्ट में हो गई है बत्ती गुल।
खाली खड़ा है खेत में खंभा,
बहरा दरबार, अधिकारी अंधा।
सुविधाओं से खेतीहर है वंचित,
बाबुओं का घर धन से है सिंचित।
बुंदेलखंड में पड़ी है पपड़ी,
विदर्भ में उधड़ रही है चमड़ी।
सिर पर बैठा साहूकार है,
भामाशाहों का चलता व्यापार है।
महाजन बना है चतुर सुजान,
जान दे रहा बेचारा किसान।।

दुनियाभर का है पेट पालता,
नहीं कभी खेती को टालता।
अतिवृष्टि हो या पड़े फिर सूखा,
रोटी मिले या रहे फिर भूखा।
बच्चे-बूढ़े सभी रटते हैं,
दिनरात मिट्टी में खटते हैं।
फसल में लग जाता जब कीड़ा,
नहीं देखता कोई उनकी पीड़ा।
पड़ जाता जब खेतों में पाला,
बैंको में भी लग जाता ताला।
घात लगाए बैठा है लाला,
वही छीनता मुंह का निवाला।
तोंद बड़ा तो बड़ा ब्याज है,
हरे जख्म पर रगड़ता प्याज है।
ब्याज वसूलना उसकी है शान,
बड़े ब्याज पर मिट रहा किसान।।

बंजर पर ही बनती है लीक,
नहीं मांगेगा अब वह भीख।
दरबारियों ने ही दिया है सीख,
म्यान से खंजर लिया है खींच।
अब खेतीहर जाग चुका है,
शहर छोडक़र भाग चुका है।
खूब चलेगी तरकश से तीर,
औंधेमुंह गिरेंगे बातों के वीर।
खेती ही है भारत की शान,
जान न देगा अब कोई किसान।।
-विश्वत सेन
मई 21, 2012

बुधवार, 16 मई 2012

रात खटमली

रात खटमली टूटी खाट है,
टूटी खाट की अलग बात है।

स्याह रात में घुप्प अन्धेरा,
खटमलों ने बांधा है घेरा,
टूटी खाट में डाला है डेरा,
बेसब्री से इन्जार है मेरा,
लंबा नहीं कोई उनका बाट है,
उनके जीवन में खूब ठाट है।
रात खटमली टूटी खाट है,
टूटी खाट की अलग बात है।।

खटमल मच्छर में है बड़ा भेद,
खटमल करता है निःशब्द आखेट,
मच्छर करता है पहले वंदन,
पैर पकड़ करता अभिनन्दन,
मधुर-मधुर है गीत सुनाता,
सोते मानुष को पहले जगाता,
सूचना देकर करता है वार,
संभल जाओ करता हूँ प्रहार,
मसहरी लगाकर ढंक लो खाट,
नहीं तो लेंगे हम तुम्हें काट,
रात मच्छरीली टूटी खाट है,
टूटी खाट की अलग बात है।।

दोनों को है रक्त पिपासा,
तनिक नहीं जीवन की आशा,
रुधिर ही है उनका आहार,
मजबूरी में वह करते प्रहार,
जन जानवर हैं दोनों एक,
कभी न करते हैं वह भेद,
जिनका नहीं है लहू से नाता,
चलाते हैं वह भाला-गंडासा,
झट से सिर को काट देते हैं,
नहीं किसी का बाट जाहते हैं,
लहू लसित वह टूटी खाट है,
टूटी खाट की अलग बात है।।

रक्त पिपासु हैं दोनों जीव,
मानुष मन से व्यथित अतीव,
मानव बंधू को काट रहा है,
निज बंधू लहू को चाट रहा है,
उनसे कहीं हम ही अच्छे हैं,
बंधू तो बंधू बच्चे भी सच्चे हैं,
करना होता है यदि हमें आखेट,
पहले करते मनुजों को सचेत,
तब कहीं जाकर खाते हैं काट,
घर बनाते हैं वही टूटी खाट,
पर मनुज मांगता है ठाट-बाट,
न रात खटमली, न टूटी खाट,
रात खटमली टूटी खाट है,
टूटी खाट की अलग बात है।।

खटमलों की है अजब प्रवृत्ति,
नहीं होती कभी चित्त की वृत्ति,
चित औ' चित्त पर करते घात,
प्रतिघात की नहीं सोचते बात,
कोमल तन को बहुत सताते,
डंक मार झट से छुप जाते,
नहीं देखते बूढ़े और बच्चे,
रक्त पीते हैं गर्म और कच्चे,
फिर भी नहीं भरता है पेट,
देह को बना देते वह खेत,
पस्त हो जाते पड़ते हाथ,
नहीं देता कोई उनका साथ,
अंगुली मलमली, टूटी खाट है,
टूटी खाट की अलग बात है।।

परजीवी, पर शोषक होते,
पूरे दिन साँधी में सोते,
सम भाव है उनमें समाया,
नहीं कभी जीवन में कमाया,
सबको एक समान सताया,
बेटा बहू या हो फिर जाया,
हरपल वंशावली बढ़ाया,
चमड़ी का है खेल रचाया,
लकड़ी चमड़ी का है खेल,
कच्ची चमड़ी से होता मेल,
छिद्राछिद्र पर करते वार,
डंक मारते हैं बारम्बार,
अंक डंक पर पडा हाथ है,
अस्त वस्त्र और खुला माथ है,
रात ढल चली, टूटी खाट है,
टूटी खाट की अलग बात है।।

हे मानव, तू मसक से सीख,
खटमल से तू मांग ले भीख,
कभी बांधव नहीं करते हलाल,
आखेट से पहले ठोंकते ताल,
नहीं तोड़ते प्रकृति का नियम,
मन पर रखते हैं वह संयम,
रात का वह करते इंतज़ार,
दिन में कदाचित करते प्रहार,
क्यों लगाईं फिर दिन में हाट
जहां बेच रहे हो टूटी खाट,
मची खलबली, टूटी खाट है,
टूटी खाट की अलग बात है।।

-विश्वत सेन
मई पांच, 2012

मंगलवार, 24 अप्रैल 2012

अक्षय पर्व

जय हो. जय हो अक्षय पर्व की
जय हो, जय हो विजय पर्व की
जय हो, जय हो भारतवर्ष की
जय हो, जय हो आर्यावर्त की|

अतुल शक्ति हो, अखिल भक्ति हो
अमूल निधि हो समूल विधि हो
विश्व विजय हो, देश निर्भय हो
शत्रु सभय हो, निधि अभय हो
जय हो, जय हो नित्य उत्कर्ष की
जय हो, जय हो भारतवर्ष की||

अक्षय दिवस है, विजय दिवस है
सुभग सुयश है, भागता अपयश है
पराभव क्षय हो, निखिल विजय हो
प्रीति अभय हो, नीति अजेय हो
क्षय हो, क्षय हो, अपकर्ष की
जय हो, जय हो भारतवर्ष की||

बढ़कर के तुम हुंकार भरो
चढ़कर के तुम प्रहार करो
मैत्री को स्वीकार करो
इस सृष्टि का उद्धार करो
पहले पहल मानवता तय हो
भारतवर्ष का सर्वत्र विजय हो
जय हो, जय हो उल्लास हर्ष की
जय हो, जय हो भारतवर्ष की||

दुर्जनों को हमने बहुत सहा
अनुज समझ आलिंगन गहा
अनीतियों को भी है खूब सहा
पर तत हाथ शत्रु से जा मिला
जय हो, उदय हो, परशुराम की
जय हो, जय हो बलिराम की
जय हो, विजय हो, अमोघ अस्त्र की
जय हो, जय हो भारतवर्ष की||

अनुपम अतीत को जरा झांको
अफीम का मत फांका फांको
सारे दिग दिगंत को तुम बांधो
शब्दभेदी बाणों को भी साधो
सबल सकल यन्त्र की जय हो
विश्व गुरु के मंत्र की जय हो
जय हो, जय हो, विमल विमर्श की
जय हो, जय हो भारतवर्ष की||

निज सभ्यता है कितना प्राचीन
पूर्वोत्तर में चढ़ा जा रहा है चीन
पश्चिम में पाक भी हुआ मलीन
हमारी भूमि हमसे रहा है छीन
जय हो, जय हो, धनुर्धर वीर की
विनम्र विजय हो केशव रघुवर की
जय हो, जय हो सुदर्शन चक्र की
जय हो, जय हो भारतवर्ष की||

युवकों को लगा है प्रेम रोग
तीव्र हो रहा है विलास भोग
चौसर पर बैठी है तरुणाई
पांचाली की है याद दिलाई
सदय अजय हो, पञ्च परमेश्वर
जय- विजय, जय हो जगदीश्वर
शीघ्र विजय हो असह्य संघर्ष की
जय हो, जय हो भारतवर्ष की||

दीन-दुखियों के हैं परमेश्वर
पालनकर्ता है अखिलेश्वर
फिर घात लगा क्यों बैठा नश्वर
सुभग सौभाग्य कर रहा है क्षर
जय हो, जय हो अखिलेश्वर की
अखिल विजय हो भारतवर्ष की
जय हो, जय हो, परमेश्वर की
जय हो, जय हो भारतवर्ष की||

विश्वत सेन
अप्रैल 24 , 2012

रविवार, 22 अप्रैल 2012

मिट्टी की रोटी

मिट्टी की रोटी


मिट्टी की एक  रोटी बनाओ
अब पत्थर की सब्जी बनाओ
तोड़-घोलकर उसे खा जाओ
पेट की ज्वाला शांत  कराओ
मिट्टी की एक रोटी बनाओ।।

मन मिट्टी का मिट्टी ही होगा

मिट्टी खाकर मिट्टी में मिलेगा
तब मिट्टी भी नहीं मिलेगी
जब मिट्टी का आटा बनेगा
जोर से पीसो, दम से गूथो
बातों को बातों से बूझो
मिलजुल खाओ, स्वाद चखाओ
मिट्टी की एक रोटी बनाओ।।

गैस का इंधन नहीं मिलेगा

हवा से अब इंजन चलेगा
लकड़ी-काठी हाथ बनेगा
मिट्टी ही अब साथ रहेगा
सब मिल गाओ, धूम मचाओ
मिट्टी की एक रोटी बनाओ।।

कंकड़-पत्थर चुनकर लाओ

प्यारी-सी अब दाल बनाओ
पात-पतइया बीनकर लाओ
उससे उसमें तडक़ा लगाओ
ताडक़ा रानी जाग चुकी है
पंघत में उसे भी बिठाओ
मिलजुलकर सब कोई खाओ
मिट्टी की एक रोटी बनाओ।।

पेट की ज्वाला धधक रही है

रह-रहकर वह बहक रही है
अंदर से आत्मा दहक रही है
देख-देख वह सिसक रही है
सिसक-सिसक दो बूंद गिराओ
मिट्टी की एक रोटी बनाओ।।

गगन का आंगन कितना बड़ा है

चारों ओर पहाड़ खड़ा है
क्षितिजों का मंडप घिरा है
तृणों का यह सेज सजा है
घुलट-पुलटकर सबको सुलाओ
मिट्टी की एक रोटी बनाओ।।

नभ में काला मेघ जमा है

पवन का आवेग थमा है
मेघ में वारिद घना है
बेल-विटप सीधे तना है
प्रकृति को सहचरी बनाओ
मिट्टी की एक रोटी बनाओ।।

मनुज की सहचरी है अजा

काटी जा रही है अजा-प्रजा
अजात शिशु पर ऋण है चढ़ा
लंपटी-कपटी का घर है सजा
स्वार्थ-कपट को सूली चढ़ाओ
मिट्टी की एक रोटी बनाओ।।

महंगासुर दानव बलवान

खड़े हो गये सूरसा के कान
राजा सो गया चादर तान
वनिक बन गये चतुर सुजान
चतुराई की चटनी चटाओ
मिट्टी की एक रोटी बनाओ।।

चारण कर रहे गुणगान

राजा प्रजा से है अनजान
प्रजा ले रही आपस में जान
गगनचुंबी बना है कान
कनपट्टी पर भोंपू बजाओ
मिट्टी की एक रोटी बनाओ।।

गरीब का बन रहा है निवाला

गरीबी का है पैमाना ढाला
चासनी बना के उसमें डाला
पड़ गया कपटी से पाला
गरीबी नहीं, अब गरीब मिटाओ
मिट्टी की एक रोटी बनाओ।।

लोकतंत्र का बज रहा है ढोल

धीरे-धीरे खुल रही है पोल
हेराफेरी है सब गोल-मटोल
बना रहा है अनुपम घोल
मनुज रक्त उनको पिलाओ
मिट्टी की एक रोटी बनाओ।।

बढ़ती जा रही है प्यास

नहीं मिटती है मन की त्रास
और बढ़ रहा है अमिट संताप
खत्म हो रहा है मानव प्रताप
दानव प्रताप संगठित कराओ
मिट्टी की एक रोटी बनाओ।।

खत्म हो रहा है अनाज

मार-काट मची है आज
मनुज बना है साग-पात
दनुजों का है राज-पाट
दनुजों को सिंहासन बिठाओ
मिट्टी की एक रोटी बनाओ।।

निकलती है तो निकले आह

राजा को है नहीं परवाह
दरबार की तो प्रशस्त है राह
निरीहों पर है टिकी निगाह
निर्दोषों को बलि चढ़ाओ
मिट्टी की एक रोटी बनाओ।।

बदल रहा है सबका वेश

शायद ही बचा कोई देश
जन-जन में फैलाओ संदेश
अब वह हो जाए खुद सचेत
संचेतन कुण्डलिनी जगाओ
मिट्टी की एक रोटी बनाओ।।

मिटती जा रही है प्रकृति

हो ही चुकी है अति पर अति
क्यों बनकर बैठे हो यति
आप ही लगाओ कोई युक्ति
युक्ति को हथियार बनाओ
बढक़र आगे प्रकृति को बचाओ
अंधकारमय भविष्य सजाओ
तब मिट्टी की एक रोटी बनाओ।।

विश्वत सेन

अप्रैल 22, 2012
 

बुधवार, 18 अप्रैल 2012

अम्बुधि नज़र आता है

अम्बुधि नज़र आता है 

मन करता है उड़-उड़ जाऊं 
मन सूबे में एक 'पर' लगाऊं 
फिर परों के संग होड़ मचाऊँ 
आसमान में करतब दिखाऊँ 
नील पतंगों को ललचाऊँ 
पर मन मोर ठिठक जाता है
जब अम्बुधि नज़र आता है!

मन में मैंने आस जगाई 
हरियाली की घास उगाई
प्यासों की सब प्यास बुझाई 
अंधियारों में भी दीपक जलाई
पर सब व्यर्थ चला जाता है
जब अम्बुधि नज़र आता है!

सर पर है आकाश बड़ा
समद में है जहाज खड़ा 
पंछी उस पर कब से पड़ा 
उड़ने को है तैयार खड़ा 
पर नीरद देख अटक जाता है
जब अम्बुधि नज़र आता है!

हौसले में कोई कमी नहीं 
अभिलाषाएं अभी थमी नहीं 
तल तलातल कहीं जमीं नहीं
बातों में कहीं नमी नहीं
उड़-उड़ जाऊं, पंख फैलाऊँ 
फिर लौट के वहीँ आ जाऊं 
उदधि नीर बहा जाता है
जब अम्बुधि नज़र आता है!

भू-पति भी है बेसुध पड़ा 
आशीष वाणी है नहीं गढ़ा
उलटे पर कतराने पर अड़ा
मंसूबे पर दिया पानी गिरा 
सब कौशल धरा रह जाता है
जब अम्बुधि नज़र आता है!

बीच भंवर में फंसी ज़िन्दगी 
जहाज में है फंसा वो पंछी
नीला अम्बर न सुने बंदगी 
नीले पानी में सिर्फ दिखे बूँद ही
तब अश्रु अंश टपक जाता है
जब अम्बुधि नज़र आता है!

किनारे का कुछ पता नहीं
धरातल भी कहीं सटा नहीं 
सगे सम्बन्धी भी सगा नहीं 
जीवन से कभी दगा नहीं
सब बाट बिखर जाता है
जब अम्बुधि नज़र आता है!

पंडित आशीष देते सौ बार 
नृप नाग देता है एक बार
नृप,सृप, पावक, नीर बदमाश
करते रहते सौ-सौ वार 
रक्त धार निकल आता है
जब अम्बुधि नज़र आता है!

खग कुल कूल से नहीं बिछुड़ा
नाविक औंधे मुंह है गिरा
गृह नृप साजिश से है घिरा 
आँखों पर है चश्मा चढ़ा 
जब गिरगिट-सा बदल जाता है
तब अम्बुधि ही नज़र आता है!

लड़का राजा हो, जानी प्रधान
मामला बिगड़ जाए साँझ-विहान
नारी न देखे कुल की शान
तान देती है खुद तीर कमान
तरकश सरकश बन जाता है
तब अम्बुधि ही नज़र आता है!

नारी नागिन का एक स्वभाव 
निज स्वार्थवश करती है घाव 
या फिर कर देती विष का स्राव 
तभी डूबती है जीवन की नाव 
तब अमित विष बन जाता है 
जब अम्बुधि नज़र आता है!

नारी ममता की है मूरत
ताड़े ललना की भोली सूरत 
पति की बनती है वो पूरक
नाजुक नाडी की है संवाहक 
तब सब अर्थ नष्ट हो जाता है
जब स्वार्थ बहुत टकराता है
पतवार पतन कर जाता है 
तब अम्बुधि ही नज़र आता है!

कभी बेटी बनती है नारी
कोई बहना बनती है प्यारी 
प्रेम पुजारन तन मन बेचे 
सजती-स्नावार्ती है वह न्यारी
सब दुलार दुर्लभ हो जाता है
जब नारी रूप बदल जाता है
सर्वार्थ स्वार्थ बन जाता है
तब अम्बुधि ही नज़र आता है!

खग कुल है कुछ डरा हुआ 
नारी विद्रोह से है भरा हुआ 
अरि बन गई है एक नारी 
विद्रोही पर है वह भारी
नृप प्यार वार बन जाता है
तब अम्बुधि ही नज़र आता है!

पहले उसने किया गौर नहीं
अब कहीं उसको ठौर नहीं
नृप का है वह सिमौर नहीं
अगम जलधि का छोर नहीं
जब ओर-छोर मिट जाता है
तब अम्बुधि ही नज़र आता है!
-विश्वत सेन 
अप्रैल 18 , 2012