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मंगलवार, 31 जनवरी 2012

फोन रखो, मैं घंटियाता हूं


घंटमणि का बज गया फोन,
डाला गया था उसमें, नया रिंगटोन।
गाना सुनकर हो गया वह मंत्रमुग्ध,
गुनगुनाने लगा, खो गया सुधबुध।
इतने में खत्म हो गया रिंगटोन,
होश आया उसे, किसने किया था फोन।
मिस्डकॉल पर उसने नंबर मिलाया,
पता नहीं किसने घंटी था बजाया।
स्पीकर ने उसे आवाज सुनाई,
अभी आता हूं, थोड़ा बीजी हूं भाई।
थोड़ी देर रुको, अभी आकर बतियाता हूं,
या फिर फोन रखो, मैं घंटियाता हूं। 
यह सुन घंटमणि हो गया चिंतामग्न,
इस आदमी ने कर दिया मुझे नग्न।
घंटमणि रखा गया है मेरा नाम,
इस आदमी ने किया, घंटियाने का काम।
उसने सोचा, फिर फोन मिलाऊंगा,
खरी-खोटी खूब उसे सुनाऊंगा।
अभी हाल मैं उसे बताता हूं,
वह मुझे क्या, मैं उसे घंटियाता हूं।
यही सोचकर उसने, फिर फोन घुमाया,
निज कान से मोबाइल सटाया। 
स्पीकर से दूसरी आवाज आई,
अभी बोला, तो तुम्हें नहीं दी सुनाई।
सुन लो ठीक से, जो कोई हो, ओ मिस्टर,
मैं बोल रहा हूं पुलिस कमिश्नर।
क्या तुम्हें शामत है आई,
जो बार-बार फोन घुमा रहा है भाई।
मैंने कह दिया, अभी मैं बीजी हूं,
न मैं तुम्हारी भौजाई, न बीवी हूं।
फिर मुझे तुम क्यों फोन घुमाता है,
क्षण-क्षण में मुझे ही घंटियाता है।
थोड़ी देर रुको, अभी आकर बतियाता हूं,
या फिर फोन रखो, मैं ही घंटियाता हूं।
घंटमणि को अब आया गुस्सा,
हवा में उसने मारा मुक्का।
गुस्से से उसका गला भर्राया,
दांत भीचकर वह गुर्राया।
घंटमणि रखा गया है मेरा नाम,
घंटियाने का किया तूने कैसे काम।
बार-बार तू ऐसे घंटियाएगा,
मेरे नाम पर तू बतियाएगा।
तुम रुको, मैं ही वहां आता हूं,
कान ऐंठकर अभी घंटियाता हूं।
इतने में उठ गया रिसीवर,
पता नहीं कहां गया कमिश्नर।
उधर से एक मधुर आवाज आई,
हैलो, कौन बोल रहा है भाई।
माफ करना, यह डायलर टोन है लगाई,
इसने तुम्हें दुख पहुंचाया होगा, घंटमणि भाई।
अब तू नहीं सुनेगा कभी,
थोड़ी देर रुको, अभी आकर बतियाता हूं,
या फिर फोन रखो, मैं घंटियाता हूं। 

विश्वत सेन/ फ़रवरी 01, 2012

आज की लड़की, कल की मां है



आज की लड़की, कल की मां है,
न्योछावर करती सब पर जां है।
उमड़ पड़े तो उसकी ममता प्यारी,
अपने पे आए तो चंडी से भारी।
माता है धरणी की देवी,
भर देती है बेटे की जेबी।
वही बेटा फिर चिल्लाता है,
जब मां खाती है बुढ़ापे में जलेबी।
नाभि का रिश्ता होता दोनों का,
मां के रोते बेटा है समझ जाता है।
मां भी समझ जाती है झट से,
जब वह पेट में कुलबुलाता है।
वह जब गर्भ में पलता रहता,
मां की हर भाषा जाता है समझ।
अब वह मां की बात-बात पर,
उसे ही कहता रहता नासमझ।
बड़ा होते ही बन गया धुरंधर,
मां की चुटिया पकड़ लेता छुछुंदर।
गर्लफेंड लेकर वह झटपट,
घुस जाता है रेस्टोरेंट के अंदर।
चरित्रहीन स्वार्थी हो जाता वह,
फिर भी माता नहीं बोलती है।
सारे राज दफन कर सीने में,
चुपचाप हलाहल पीती है।
सीने से चिपका के रखती वह,
पर बेटा दुत्कारता है।
दुसह, विपत भारी पडऩे पर,
हे मां, ही वह चिल्लाता है।
जब बेटा बन जाता है बाप,
भ्रूण हत्या वह करवाता है।
मां बनी उस लड़की से,
जघन्य पाप करवाता है।
मर्दानगी का वह दिखाता है जोश,
बिन बीवी के उड़ जाता है होश।
उसकी बीवी भी लड़की थी,
उसे भी लड़की ही जनी थी।
मद में चूर, स्वभाव में क्रूर,
मातृ ऋण को जाता है भूल।
वंश चलाने की खातिर,
सृष्टि पर चलवाता है शूल।
लड़की की संख्या हो रही है कम,
लड़की के लिए हो रहा है बेदम।
अब निठल्ला बन बैठा है कुंआरा,
लड़की को नहीं लगा वह प्यारा।
किस्मत पर अब वह पछताता रहा है,
बेचारी भाभी को पटा रहा है। 
कर रहा है वह मिन्नतें भारी,
शादी करा दो, मेरी भाभी प्यारी।
वह भाभी भी तो एक लड़की है,
जोर से दी उसने एक घुड़की।
नासिका छिद्र को दबाकर,
लजाकर उसने नेटा सुड़की।
जा रे सत्यानाशी, जा रे नाशपीटे, 
तू ही हमारी प्रजाति को उजाड़ा।
तेरी शादी कभी नहीं कराऊं,
तूने ही तो सारा खेल बिगाड़ा।


विश्वत सेन/जनवरी 31, 2012


शनिवार, 21 जनवरी 2012

खोजेगा इंडिया, पढ़ेगा इंडिया/विश्वत सेन


गांव-गांव, बस्ती-बस्ती, 
कदम से दम बढ़ाएगा।
दिलों से जीतर दिलों में, 
ज्ञान दीप जलाएगा।
आखरों की मोतियों से, 
दीपमाल बनाएगा।
निरक्षरों को अक्षरों से, 
रोज मेल राएगा।
मेल-मिलाप से जोड़र, 
पढ़ायेगा इंडिया।
खोजेगा इंडिया, पढ़ेगा इंडिया।
पहाडिय़ों की कंदराओं में,
छिपा है इतिहास अपना।
देश के जर्रे-जर्रे में,
बसे हैं गांधी-सुभाष अपना।
देश- काल से उठर,
सुनाएगा इतिहास इंडिया।
खोजेगा इंडिया, पढ़ेगा इंडिया।
गुजरात के सौराष्ट्र से,
पश्चिम के महाराष्ट्र से,
हिमालय की पहाड़ी से,
बंगाल की खाड़ी से,
श्मीर की बहार से,
दक्षिण के पठार से,
उत्तर में पंजाब से,
गंगा के दोआब से,
मिलजुलर आपस में,
 आवाज उठाएगा।
खोजेगा इंडिया, पढ़ेगा इंडिया।
बुद्ध की नगरी से,
सागर की गगरी से,
सांची के स्तूप से,
रेगिस्तान के धूल से,
खजुराहो के मंदिर से,
झाडिय़ों के अंदर से,
सुर से सुर मिलाएगा,
मधुर संगीत सुनाएगा।
गाएगा इंडिया, पढ़ाएगा इंडिया,
खोजेगा इंडिया, पढ़ेगा इंडिया।
अनुसंधानों पर जोर है,
प्रतिभाओं में होड़ है,
प्रतिभा खोजी जाती है,
मुनिया बरी चराती है,
मंगरु बैल चराता है,
स्कूल खुला रह जाता है,
मास्टर बच्चे बन जाते हैं,
भोजन रोज पकाते हैं,
रजिस्टर चट र जाता है,
शिवा भूखा रह जाता है,
भूखे पर भी डंडा,
नहीं बरसाएगा इंडिया।
खोजेगा इंडिया, पढ़ेगा इंडिया।

विश्वत सेन
जनवरी 22, 2012

शुक्रवार, 20 जनवरी 2012

बखेती लाल


बखेती लाल/विश्वत सेन

एक रहिन बखेती लाल,
रते रहिन खुरपेच।
बात-बात में चाल चलें,
भेद खुले, तो जाएं झेंप।
गांव-घर में लड़ाई करावें, 
खेती पर डालें वह डोरा।
जो चाल में खलल पड़ जाए,
तब  करा दें चोरी-चोरा।
उनकी इस हरत से भैया,
गांव-जवार था पूरा परेशान।
उनके बिना मगर रहती थी,
फीकी किसी महफिल की शान।
नाम बखेती, बखत देखर,
चलते थे अपनी वो चाल।
हाथ मलते रह जाते सारे,
माल उड़ाते बखेती लाल।
सवा सेर पर अढ़इया भारी,
पड़ गया मुसद्दी लाल से पाला।
बखेती लाल के हडिय़ा में,
पडऩे लगा मकड़ी का जाला।
चूल्हे में पड़ गया था पानी, 
नही मिलता था कोई एक दाना।
पनबट्टा भी बिकने लगा,
जिसको दिया था उनका नाना।
चिंतामग्न रहने लगे बखेती,
खूब चलते थे चाल पर चाल।
मुसद्दीलाल के एक चाल पे,
मात खा जाते बखेती लाल।
जोर लगाया, जुगत भिड़ाया,
फिर भी नहीं बनी कोई  बात।
बात-बात पर झुंझला जाते,
बुढ़ापे में चलाते घूस्सा-लात।
घर की माली हालत देखकर,
बखेती ने किया ऐलान।
मैं न रहूं घर में यदि, तो
पेड़ से रस्सी देना कोई तान।
सांझ ढले तो फिर उसमें,
बांध देना कोई एक कनस्तर।
कुछ दिनों के लिए जाऊंगा,
 यहीं पास में है एक बस्तर।
नहीं आएंगे चोर-उचकके,
और न घुसेगा कोई कुत्ता-बंदर।
वैसे भी, अब नहीं बचा कुछ 
मेरे इस घर के अंदर।
इतना कहकर चले बखेती,
थानेदार की देहरी पर।
धू-धू कर जलने लगा उनका घर,
आधी रात के बीतने पर।
अंधेरी रात में घोर सन्नाटा,
लपट-झपट रही थीं लपटें।
टोपी पहने, रूल बगल में,
दरोगाजी लिख रहे थे रपटें।
आधीरात को आगजनी देख,
गांव में मच गया हाहाकार।
उधर, मुसद्दीलाल की पीठ पर,
पड़ रही थी हण्टर की मार।
समझ गया था पूरा गांव,
चल दिया है इसने तगड़ी चाल।
पेड़ की ओट में छिपकर,
मुस्कुरा रहे थे बखेती लाल।

जनवरी 19, 20012

रविवार, 15 जनवरी 2012

लाज बचाई खिचड़ी ने


लाज बचाई खिचड़ी ने

दही-चूड़े ने धोखा दिया,
लाज बचाई खिचड़ी ने।

अखबारों ने खेल बिगाड़ा,
साख बचाई खिचड़ी ने।
दूध-मक्खन ने मुंह फुलाया,
खिचड़ी की अब खैर नहीं।
साग-भाजी ने खूब रुलाया, 
मिर्ची से अब बैर नहीं।
लाल टमाटर, गरम बटाटा,
फूलगोभी की हालत पतली।
दाल-चावल में पड़ गया पानी,
खाली रह गई मेरी तसली।
दो नावों पर पैर धरा था,
घप से गिर गए पानी में।
पूरे चौबीस घंटे लग गए,
इस कहानी को बनाने में।
बनते-बनते गिड़ रही थी,
लाज बचाई खिचड़ी ने,
लपक कर बीच में आ गई,
साख बचाई खिचड़ी ने।

खिचड़ी रानी बड़ी सयानी,
बीरबल से पक जाती है।
धुरंधरों को छक्के छुड़ाती,
महीनों-साल पकाती है।
राजनीति में मेल कराती,
कूटनीति सिखलाती है।
सही से पक जाए तो मजा है,
वरना घुटने के आंसू रुलाती है।
समता-ममता टूट जाती है,
दादी-अम्मा रूठ जाती हैं।
जब लगती है जोर की प्यास,
हाथ में रह जाती है आस।
अंगुली भीचकर मुट्ठी बिना,
अकड़कर रह जाता है हाथ।
सूर्ख, लाल, अकड़ी हुई-सी,
मिर्च निभाती है तब साथ।
बनते-बिगड़ते इन रिश्तों की,
लाज बचाई खिचड़ी ने।
बीच भंवर में डूबती नैया की,
पतवार बचाई खिचड़ी ने।

इस खिचड़ी में बड़ा मजा है,
खाकर कोई पछताता है।
जो न खाए, हाथ मलता है,
बिन खाए पछताता है। 
पाकर खोने वालों की,
लाज बचाई यही खिचड़ी ने।
सोकर जागने वालों की,
साख बचाई यही खिचड़ी ने।

विश्वत सेन/ जनवरी 15, 2012

मकर संक्रांति की हार्दिक शुभकामनाएं
धन्यवाद!

सोमवार, 2 जनवरी 2012

...और कितने ‘स्लट वॉक’

विश्वत सेन

दुनिया में होने वाली महिला यौन उत्पीड़न, छेड़छाड़ और दुष्कर्म की वारदात के पीछे महिलाओं के पहनावे को अहम वजह माना जा रहा है। समय-समय पर महिलाओं को परिधानों के चयन को लेकर सलाह भी दी जाती है, मगर महिला संगठनों और स्वच्छंद विचारों वाली महिलाओं को यह सलाह पसंद नहीं आती। उन्हें यह सलाह उनकी आजादी पर हमला लगता है और वे देश-दुनिया के समाज को पितृ सत्तात्मक बताकर स•य तरीके से गालियां देने लगती हैं। महिलाओं को बदन ढकाऊ कपड़े पहनने की सलाह देने पर पूरी दुनिया में ‘स्लट वॉक’ किया गया था। अब आंध्र प्रदेश में महिलाओं के पहनावे को लेकर चर्चा जारों पर है। यह चर्चा महिलाओं और खासकर युवतियों के पहनावे पर केंद्रित है। कहा यह जा रहा है कि महिलाओं के पहनावे और उनके परिधान ही पुरुषों को नैतिक पतन की ओर से धकेल रहे हैं। इसके पीछे तर्क यह दिया जा रहा है कि महिलाएं और युवतियां खुद को ‘बोल्ड’ साबित करने के फिराक में अंग प्रदर्शक पारदर्शी परिधानों का चयन करती हैं। यह कपड़े पुरुषों को उत्तेजक और नैतिक पतन की ओर धकेलते हैं। इसलिए महिलाओं को इस प्रकार के पहनावे से परहेज ही करना चाहिए। हालांकि इस नई बहस में यह  भी  कहा जा रहा है कि हमारे देश में विभिन्न सभ्यता और संस्कृति की महिलाएं निवास करती हैं। हर संस्कृतियों के परिधान भी अलग-अलग हैं। कहीं साड़ी पहनी जाती है, तो कहीं घाघरा-चोली पहनी जाती है, मगर परिधानों की यह पारंपरिक वि•िान्नता अंग प्रदर्शन में सहायक नहीं बनती। इसके विपरीत आधुनिक फैशन की लो वेस्ट जींस जैसे अंग प्रदर्शक और पारदर्शी परिधान नैतिकता को तार-तार करते हैं।
आंध्र प्रदेश के महिला एवं बाल कल्याण मंत्री सीसी पाटिल और राज्य के डीजीपी दिनेश रेड्डी ने मोरल पुलिसिंग के बहाने महिलाओं के पहनावे पर हमला करके एक नई बहस छेड़ दी है। इसके साथ ही उन्होंने अतिवादी महिला संगठनों और स्वच्छंद विचारों वाली लड़कियों और महिलाओं को उकसाने का काम किया है। आंध्र के इन दोनों जिम्मेदार लोगों के बयान के बाद एक बड़ा सवाल यह पैदा हो गया है कि क्या अब दिल्ली और देश की अतिवादी महिला संगठन और स्वच्छंद विचारों वाली महिलाएं उनके बयानों के विरोध में देसी ‘स्लट वॉक’ करेंगी?
हालांकि इससे पहले अपने पहनावे और यौन उत्पीड़न, दुष्कर्म आदि की घटनाओं के विरोध में प्रबुद्ध वर्ग की महिलाओं ने वर्ष 2011 की 31 जुलाई को दिल्ली के जंतर-मंतर पर ‘स्लट वॉक’ किया था। उस समय  भी पूरे देश में एक लंबी बहस छिड़ी थी। सही मायने में यह ‘स्लट वॉक’ कनाडा पुलिस के हेड कांस्टेबल ‘माइकल सैंग्यूनेटी’ के बयान के विरोधस्वरूप था, जिसमें उन्होंने जनवरी 2011 में ‘महिलाओं को शारीरिक शोषण से बचने के लिए स्लट्स (वेश्याओं) की भांति फूहड़ कपड़े नहीं पहनने’ की सलाह दी थी। 
अब आंध्र प्रदेश पुलिस और वहां की सरकार ने महिलाओं के परिधान पहनावे पर बयान देकर एक नई बहस छेड़ दिया है। पुलिस के जिम्मेदार अधिकारी प्रदेश के डीआईजी दिनेश रेड्डी ने महिलाओं द्वारा पहने जा रहे आधुनिक फैशनेबल और पारदर्शी परिधानों के पहनावे से दुष्कर्म, यौन उत्पीड़न और छेड़छाड़ जैसी वारदात के होने का कारण बताया है। उनके बाद राज्य के महिला एवं बाल कल्याण मंत्री ने  भी उनकी फिल्डिंग करते हुए मोर्चा सम्भाल लिया है। 
आंध्र के बाल कल्याण मंत्री पाटिल ने पहनावे को लेकर तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा है- ‘महिलाओं को यह पता होना चाहिए कि उन्हें अपने शरीर के किस अंग को छिपाकर रखना और किसे नहीं। उनका कहना है कि वह खुद निजी तौर पर उत्तेजक और पारदर्शी कपड़े पहनने की मुखालफत करती हैं। उन्होंने कहा है कि महिलाएं जो कुछ  भी पहनें, वह गरिमापूर्ण हो। 
इससे पहले आंध्र के डीजीपी दिनेश रेड्डी ने  भी महिलाओं के पहनावों पर बयान दिए थे। उनके बयान पर अनेक सवाल खड़े किए गए। डीजीपी रेड्डी ने कहा था कि महिलाओं के फैशनेबल और पारदर्शी कपड़े पहनने से रेप की घटनाएं बढ़ती हैं। रेड्डी के बयान पर किए गए सवालों के बचाव में महिला एवं बाल कल्याण मंत्री पाटिल का कहना है कि दुष्कर्म और यौन उत्पीड़न तब होते हैं, जब पुरु षों की नैतिकता गिरती है। पुरु षों की नैतिकता उस समय गिरती है, जब महिलाएं भड़काऊ कपड़े पहनती हैं। 
मंत्री पाटिल कहती हैं कि आजकल का लाइफस्टाइल ऐसा हो गया है कि महिलाओं को पुरु षों की तरह काम करना ही होता है। इसलिए महिलाएं रात को आईटी कंपनियों और कॉल सेंटर्स में काम करती हैं। महिलाओं को यह पता होना चाहिए कि इन जगहों पर काम करने के लिए जब वे घर से निकलती हैं, तो उन्हें अपने शरीर को कितना ढंककर रखना है। इसलिए महिलाओं को ही कपड़ों के चयन और पहनावा तय करना होगा। 
पाटिल ने स्पष्ट रूप से महिलाओं के ड्रेस कोड की वकालत तो नहीं की, लेकिन इतना जरूर कहा कि उन्हें बाजार में धड़ल्ले से बिकने वाली लो वेस्ट जींस नहीं पहननी चाहिए। उन्होंने कहा कि देश में अलग-अलग सभ्यता और संस्कृति की महिलाएं निवास करती हैं। कहीं पर घाघरा-चुन्नी पहनी जाती है, तो कहीं पर साड़ी। वैसे बाजार में लो-वेस्ट जींस  भी आराम से मिल जाती हैं, मगर यह महिलाओं पर निर्भर करता है कि वह खुद को सुरक्षित रखने के लिए कौन-से कपड़े का चयन करती हैं। पारंपरिक वस्त्र महिलाओं के शरीर को ढंककर रखते हैं, तो फैशनेबल जींस उनके अंगों को प्रदर्शित करती है।
आंध्र प्रदेश के इन दो जिम्मेदार लोगों के बयानों के पहले  भी देश में महिलाओं के परिधान को लेकर कई सवाल खड़े किए जाते रहे हैं। कहा जाता है कि कथित तौर पर आर्थिक शक्ति बन चुके इस देश में महिलाओं का योगदान कितना अधिक है, लेकिन फिर  भी आज महिलाओं को सड़क पर बेखौफ चलने की आजादी नहीं है। वह किसी  भी वक्त गंदी फब्तियों, छींटाकशी और रेप की शिकार हो सकती है। कहने को तो महिलाएं आजाद हैं, लेकिन क्या वाकई आजाद हैं?
महिला आजादी और नए फैशनेबल परिधानों की पक्षधर पूजा प्रसाद कहती हैं कि स्लटवॉक के विरोधी स्त्री-पुरु ष कहते हैं सुरैया और मीना कुमारी जैसी सफल और खूबसूरत अदाकारा तन ढंक कर रखती थीं। जो लोग यह कहते हैं वह यह भूल जाते हैं कि इन आदाकाराओं को  भी तब के समाज का विरोध झेलना पड़ा था। कहा गया था कि कैमरे के सामने आएंगी, तो उनकी और उनके परिवार की इज्जत लुट जाएगी। तब के समय में किसी महिला का फिल्म इंडस्ट्री या फिल्म गायन के क्षेत्र में उतरना उतना ही बोल्ड कदम था, जितना कि आज के समय में किसी मिडिल क्लास लड़की का मॉडलिंग के क्षेत्र में आना और बिकीनी फोटोशूट करना।
दरअसल, कनाडा के हेड कांस्टेबल माइकल और आंध्र के डीजीपी दिनेश रेड्डी के बयानों में बहुत हद तक समानता  भी है। फर्क सिर्फ इतना है कि कनाडा के पुलिस अफसर माइकल के कहने का तरीका थोड़ा असहज था, मगर भावार्थ दोनों अफसरों का लगभग एक समान है। इसीलिए यह सवाल  भी पैदा हो रहा है कि कनाडा के एक पुलिस अफसर के बयान पर जब पूरी दुनिया में बवाल खड़ा किया जा सकता है और संसार के पितृ सत्तात्मक समाज को कोसा जा सकता है, तो फिर आंध्र प्रदेश के पुलिस अफसर के बयान पर  भी उफान आ सकता है। जुलाई 2011 की भारत की अतिवादी और स्वच्छंद विचारों वाली महिलाएं और युवतियां आज  भी इस देश में हैं। यदि वह कनाडा में दिए गए बयान पर दिल्ली में स्लट वॉक कर सकती हैं, तब आंध्र प्रदेश तो अपने देश का ही राज्य है। उन्हें यहां के पुलिस अफसर के बयान पर  भी अतिवादी होना चाहिए और यदि वह ऐसा नहीं करती हैं, तो इसमें कोई दो राय नहीं कि भारत की महिलाएं सचमुच पश्चिमी देशों की महिलाओं की सिर्फ नकलभर करती हैं। वह इसलिए कि यदि एक बयान से उनकी अस्मिता और आजादी पर हमला हो सकता है, तो दूसरे बयान  भी उनके दिलों में टीस पैदा कर सकते हैं।