गुरुवार, 8 फ़रवरी 2018

संसद में शूर्पणखा, तो फिर लक्ष्मण कौन? (विरासत के झरोखे से...भाग-चार)

विश्वत सेन

बुधवार यानी आठ फरवरी, 2018 को संसद बजट सत्र के पहले दिन दिए गए अभिभाषण पर चर्चा हो रही थी। लोकसभा में जो चर्चा हुई, उसे सुन देख नहीं पाया। राज्यसभा में हो रही चर्चा के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की बात सुनने को मौका मिला। मौका क्या मिला, दफ्तर में था। दफ्तर में एक साथी हैं, जो खुद को राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ, भारतीय जनता पार्टी और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के अनन्य अनुयायी मानते हैं। अपनी भावना प्रदर्शित करने के लिए वे भाजपा भक्त अथवा सरकार भक्त समाचार चैनल ही देखते हैं। पदेन वरिष्ठ हैं, तो उनके कामों में हस्तक्षेप करना मैं उचित नहीं समझता। बुधवार आठ फरवरी, 2018 को जब मैं दफ्तर पहुंचा, तो दूरदर्शन का समाचार चैनल ट्यून कर दिया गया। इस नाते मैं भी राज्यसभा में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ओर से पढ़ा जा चुटीला टाइप भाषण देखने सुनने लगा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपने कार्यकाल के करीब चार साल की अवधि के दौरान खुद की सरकार द्वारा किये गये कार्यों की शुरुआत करने का श्रेय पूर्ववर्ती संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन की सरकार और खासकर कांग्रेस को लेकर उन कार्यों को अमलीजामा पहनाने का श्रेय खुद पर या अपनी सरकार पर दे रहे थे। बीच-बीच में वे सुसभ्य भाषा और मजाकिया लहजे में कटाक्ष भी कर रहे थे। किसी-किसी बात पर विपक्ष और कांग्रेस के सदस्यों की ओर से कटाक्ष पर विरोध भी जताया जा रहा था। इसी बीच, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कोई बात कही, मुझे ध्यान नहीं है, उस पर एक अट्टहास टाइप की हंसी सुनाई दी। इस हंसी पर सत्ता पक्ष के लोगों ने ऐतराज जाहिर किया। इस ऐतराज पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने टिप्पणी की, "उन्हें हंस लेने दीजिए, रामायण के बाद पहली बार तो ऐसी हंसी सुनने को मिल रही है।"
प्रधानमंत्री की इस टिप्पणी पर सभी ने गौर किया और आपस में चर्चा की कि रेणुका चौधरी को पीएम ने "शूर्पणखा" कहा है। शूर्पणखा मतलब राक्षसी? यानी रेणुका चौधरी की हंसी राक्षसी है या फिर रेणुका राक्षसी है? तमाम तरह की बातें होने लगीं। इसी बीच, देर शाम तक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की इस टिप्पणी पर राजनीति में उबाल आ गया।
अब में सोचने लगा कि यदि प्रधानमंत्री ने कांग्रेस की एक सदस्या को शूर्पणखा यानी राक्षसी कहा है और वह भी भरी संसद में, तब तो उसी संसद में कोई न कोई "राम" और "लक्ष्मण" भी होंगे। अब राम कौन और लक्ष्मण कौन? यह बहुत बड़ा सवाल है। वह इसलिए कि संसद की सदस्यता ने पीएम के भाषण पर कटाक्षपूर्ण अट्टहास किया, यह निंदनीय, अशोभनीय, अमर्यादित और असंसदीय है, मगर प्रधानमंत्री के एक गरिमामय पद पर आसीन होने के नाते सभ्य भाषा में किसी को राक्षस या राक्षसी नहीं कहना चाहिए।
शूर्पणखा की चर्चा जब संसद और संसद से बाहर होने लगी, तब मैंने सोचा कि क्यों शूर्पणखा और राक्षस-राक्षसी को लेकर ज्ञानवर्धन कर लिया जाए। आचार्य चतुर सेन की पुस्तक "वयं रक्षाम:" पढ़ी थी, तो उन्होंने राक्षसों को वंश या कुल रक्षक के रूप में प्रस्तुत किया है। संस्कृत के 'रक्ष' शब्द का अर्थ रक्षा करना होता है, जिसमें 'रक्ष, रक्षति, रक्षति...' करके धातुरूप और शब्द रूप भी है। इसके अलावा रक्षा संस्कृति भी है, जिसका वर्णन सनातनी ग्रंथों, पुरानों और शास्त्रों में भी है। मेरा मतलब यहीं पर आकर रुक जाने से नहीं था, मेरा मतलब गूढ़ता को जरा और धारण करने और फिर उसका सरलीकरण करने से था।
मेरा अभियान शुरू हुआ। पहले मैंने सोशल मीडिया के विद्वानों से सवाल दागा। शूर्पणखा के कितने नाम थे? इस सवाल का कारण यह था कि "रावण की बहन थी शूर्पणखा। शूर्पणखा दंडकारण्य निवासिनी थी। पंचवटी में उसने मर्यादा पुरुषोत्तम राम को देखा और वह उन पर मोहित हो गयी।" यहां इस कहानी को रोक रहा हूं और वह इसलिए कि रावण की बहन शूर्पणखा, सूर्पनखा, सुपनेखा या फिर स्वर्णनखा को शास्त्रकारों, कहानीकारों, उपन्यासकारों और देशज-विदेशज तमाम रचनाधर्मियों ने "राक्षसी" या "राक्षसनी" कहकर खलनायिका के रूप में पेश किया है, तो पहले हमें यह जान लेना जरूरी है कि "राक्षसी" या "राक्षसनी" कहते किसको हैं।
मेरे पास चौखंभा सुभारती प्रकाशन द्वारा प्रकाशित डा ब्रह्मानंद तिवारी द्वारा व्याख्यायित और अमर सिंह द्वारा रचित अमरकोश है। मैंने "राक्षसी" की परिभाषा वहां खोजना शुरू किया। इस पुस्तक के दूसरे कांड के चौथे वर्ग में 128वां श्लोक मिला। आप भी उस श्लोक से रूबरू होंगे, तो बेहतर होगा। यथासंभव इसका अन्वय के साथ अर्थ समझाने का प्रयास करूंगा। हो सकता है, मेरे अन्वय और भावार्थ में त्रुटि हो, क्योंकि अभी मैंने ढंग से हिंदी तो सीखी ही नहीं है, तो संस्कृत क्या खाक बांचूंगा। फिर भी...।
श्लोक:-
"कुणि: कच्छ: कांतलको नन्दिवृक्षोsथ राक्षसी।
चंबा धनहरी क्षेम-दुष्पत्र-गणहासका:।।"

अन्वय: 1
कुणि: कच्छ:= कुणिणक: अच्छ: स: कुणिकच्छ:। कुणिक:=सूर्यपुत्र भगवान शनि और अच्छ:=आंख।
अर्थात, सूर्यपुत्र भगवान शनि की आंख के समान आंख हो जिसकी।
सूर्यपुत्र शनि देव को कणिकाक्षी भी कहा जाता है।

अन्वय:2

कांतलको=कांत: कथयसि चंद्रमाश्च अलक: केशवारूणि। अर्थात चंद्रमा की तरफ बाल उठे हों जिसके।

अन्वय:3
नंदिवृक्षोथ=भगवान शंकर वाहन: नंदी अर्थात वृषभ: समान वृक्ष: अर्थात वक्ष: तथा ओष्ठ:
यानी बैल के समान वक्ष और ओंठ हों जिसके।
चंडा=विकराल
धनहरी=मेघ के समान काली
क्षेमदुष्पत्र=उत्पात मचाने वाला
गणहासका:= समूह में खड़े लोगों की हंसी के समान अकेला हंसने वाला या अट्टहास करने वाला।

भावार्थ

जिसकी आंखों से अंगारे बरसते हों, जिसके बाल आकाश की ओर उठे हों, चेहरा कुरूप एवं छाती बैलों जैसी हो, बदन विकराल हो, जो हमेशा उत्पात मचाने वाली हो; वह "राक्षसी" या "राक्षसनी" कहलाती है।

अब "राक्षसी शूर्पणखा ने मर्यादा पुरुषोत्तम राम के रूप-गुण पर मोहित होकर प्रणय निवेदन किया, तो उन्होंने कहा-"मेरे पास मेरी भार्या सीता तो है, मगर लक्ष्मण अविवाहित है; तुम उसके पास जाओ। कामांध "राक्षसी" शूर्पणखा लक्ष्मण के पास गती और प्रणय निवेदन किया। लक्ष्मण ने फिर उसे रामजी के पास भेज दिया पुनश्च राम ने लक्ष्मण के पास। अंत में उसने लक्ष्मण से विवाह करने की जिद ठान ली, जिसपर लक्ष्मण ने उसका नाक काट दिया। इस घटना के बाद वह लंका गती और रावण से व्यथा बताती। रावण ने खर-दूषण को भेजा। आदि-आदि।"
~सोशल मीडिया विद्वान और महाज्ञानी गूगल महाराज के अनुसार।
अब सवाल यह पैदा होना स्वाभाविक है कि यदि कांग्रेस की सदस्या ने संसद में प्रधानमंत्री के भाषण के दौरान अट्टहासी उपहास उड़ाने की वजह से "राक्षसी" हो सकती है, तो उन्हीं सत्तपक्षी या विपक्षी सदस्यों में से कोई न कोई तो राम और लक्ष्मण भी होगा?

नोट: यह लेख किसी राजनीतिक दुर्भावना, कटाक्ष या किसी आम या खास व्यक्ति की आलोचना के लिए नहीं लिखा गया है। यह महज मन में उपजे सवालों का जवाब ढूंढने का प्रयास भर है।

जारी.....


मंगलवार, 6 फ़रवरी 2018

'....अब आप अनंत कुमार से प्रादेशिक समाचार सुनिए' (विरासत के झरोखे से भाग-तीन)

विश्वत सेन

1980 के दशक बिहार (तब झारखंड राज्य नहीं बना था) विकास कर रहा था. शाम 7.30 बजे तली में सटे किरासन तेल से ऊर्जा लेकर मद्धम लालिमा वाले लौ के साथ लालटेन प्रकाशमान अंधेरों को चीरने का काम करता रहता. सर्दी, गर्मी और बरसात के थपेड़ों से जूझने वाले चिरायु लालटेन के इर्द-गिर्द लोग बैठे रहते. वे दिनभर के कामों से थके रहते. उधर, गौ माताएं पागुर पारतीं, भैंसें अपनी पूछों से रक्त पिपासु मच्छरों को भगाने का उपक्रम करतीं, मकड़ियां अपने ही बुने जाल से आजाद होने का प्रयास करतीं, फतींगे लालटेन के मद्धम प्रकाश के इर्द-गिर्द मंडराते रहते और छिपकलियां उन फतींगों को चट करने की फिराक में लगी रहतीं.
इस बीच, हम जैसे अबोध बच्चे चिरायु लालटेन मद्धम लालिमा लिये देदीप्यमान लालटेन के प्रकाश में किसी वीर की भांति गोल घेरे में चक्रव्यूहाकार बैठे रहते. इस दौरान हमारी आंखें पुस्तकों के अक्षरों के साथ युद्ध कर रही हाेतीं. उधर, खाट या फिर चौकी पर बाबूजी अपने सहकर्मी के साथ बैठे होते. सामने वाली चौकी पर बाबा और एक स्पेशल खाट पर दुखहरण पंडित जी. तभी रेडियो पर सुस्पष्ट बुलंद आवाज "ये आकाशवाणी का पटना केंद्र है. अब आप अनंत कुमार से प्रादेशिक समाचार सुनिए" उभरती.
इस आवाज के सुनते ही चिरायु लालटेन के पास चक्रव्यूहाकार बैठे अबोध बालकों, खाट-चौकी पर बैठे बड़े-बुजुर्गों, गौशालाओं की गाय-भैंसों, मकड़ियों और छिपकलियों के कान खड़े हो जाते. लगता, 'सभी इस आवाज की प्रतीक्षा कर रहे हाें.' सबका तात्कालिक कार्य-व्यवहार बंद हो जाता. रेडियो पर प्रसारित वाक्य के दो शब्द 'आकाशवाणी' और 'अनंत' मानो हमारी चेतना को अनंत शून्य में लेकर चला जाता. 'आकाशवाणी' शब्द सुनते ही लगता, 'अब अनंत आकाश में देवी-देवता, यक्ष-गंधर्व, किन्नर-किरीट सभी उपस्थित होंगे और आकाशवाणी होने वाली है-'देवव्रत, आज से तुम भीष्म कहलाओगे.' उस समय हमारे बाल मन के लिए आकाशवाणी का मतलब यही था.
पटना रेडियो स्टेशन के समाचार वाचक अनंत कुमार की बुलंद आवाज सुनकर यही प्रतीत होता, मानो इस आवाज में सूर्य, चंद्रमा और पृथ्वी एक कतार में खड़े हों. समाचार वाचक अनंत कुमार हमारी आकांक्षाओं के अनुरूप कई तरीकों से विभिन्न समाचारों को पढ़ रहे होते. हम एकाग्रतापूर्वक उस दैवीय आवाज को सुनते. हमारी एकाग्रता तब भंग होती, जब 7.39 पर वे कहते, 'एक बार फिर से मुख्य समाचार सुनिए.' सबसे बड़ी बात यह होती, जिस दिन समाचार पढ़ने अनंत कुमार नहीं आते, लगता, 'आज हमने कुछ खो दिया है.' हालांकि, उनके स्थान पर श्री संजय बनर्जी को भेजा जाता, मगर मन में इस बात की कसक बनी रहती. संजय बनर्जी मुख्य रूप से क्रिकेट की कमेंट्री के लिए जाने जाते थे.
आवाज की सुपष्टता और बुलंदी अमीन चाचा यानी श्री अमीन सयानी और श्री अमिताभ बच्चन की आवाजों में भी देखने को मिलती है, मगर अनंत कुमार के आगे सारी आवाज आज भी फीकी लगती है. अनंत कुमार की उसी आवाज को सुनने की लालसा पिछले साल भी तब जगी, जब मैं पटना में स्थानांतरित कर दिया गया था. जिज्ञासा को शांत करने रेडियो स्टेशन पहुंचा, तो पता चला कि आकाशवाणी के पटना केंद्र के समाचार वाचक अनंत कुमार अनंत लोकवासी हो गये और जिस युग में वे समाचार वांचा करते थे; उस युग में रिकाॅर्डिंग की व्यवस्था नहीं थी. समाचार डाइरेक्ट टेलीकास्ट किया जाता था.
खैर, 1980 के ही दशक में दूरदर्शन के क्षेत्र में महान क्रांतिकारी हुई. इस दौरान रामानंद सागर की रामायण और बीआर चोपड़ा का महाभारत धार्मिक धारावाहिक आया. रामानंद सागर के रामायण ने टेलीविजन को लोकख्याति प्रदान की और बीआर चोपड़ा के महाभारत ने उसे घर-घर, झोपड़ी-मोहल्ले का वासी बना दिया. हिंदी समाचार जगत के क्षेत्र में अखबार और रेडियो के अलावा दूरदर्शन ने भी जगह बना ली थी, मगर उस पर सरकारी होने का ठप्पा लगा हुआ था.
दूरदर्शन समाचार के दर्शकों को सरकारी ठप्पे से आजाद कराने के ध्येय से श्री एसपी सिंह 'जनता के द्वारा, जनता के लिए' के सिद्धांत पर चौबीस घंटे का समाचार चौबीस मिनट के कार्यक्रम 'आजतक' के रूप में लेकर आए. इस कार्यक्रम का अलग तेवर-कलेवर था. दिल्ली के कनॉट प्लेस स्थित एफ-19 इनर सर्किल में इसका दफ्तर और स्टुडियो दोनों था. दर्शकों से मिल रहे रिजल्ट के बाद इसे दूरदर्शन से हटाकर पूरे 24 घंटे का खांटी निजी समाचार चैनल बना दिया गया.
हालांकि, इस दौर में हिंदी-अंग्रेजी के अन्य समाचार कार्यक्रम थे, मगर 24 मिनट से 24 घंटे का यह पहला प्रयोग था. इस प्रयोग के बाद जब पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने मीडिया में 27 फीसदी विदेशी निवेश की छूट दी, तो 24 घंटे वाले निजी समाचार चैनलों की बाढ़ आ गयी. आज  1980 के दशक से लेकर 21वीं सदी के दूसरे दशक के उत्तरार्द्ध तक आलम यह हो गया है कि निजी चैनलों पर ही युद्ध लड़ा जाता है और इसी पर फैसले भी सुना दिए जाते हैं. आभासी और दूरदर्शन वाले इस मीडिया के दौर में मानो अनंत कुमार की वह देदीप्यमान आवाज कहीं गुम सी हो गयी है.


जारी....

फुलौरी बिन चटनी कैसे बनी (विरासत के झरोखे से...भाग-दो)

विश्वत सेन

'कैसे बनी, कैसे बनी; फुलौरी बिना चटनी कैसे बनी...'
1980 के दशक में भोजपुरिया फिल्म इंडस्ट्री अथवा भोजपुरिया बेल्ट में यह गाना बहुत अधिक प्रचलित हुआ noथा। इस गाने का मूल भाव ' बिना चटनी के फुलौरी कैसे बनेगी' था, जिसका दूसरा भाव उस समय के युवाओं और गीतकारों ने अपने अंदाज में पेश किया और स्वीकारा। दरअसल, भोजपुरी भाषा का यह गीत भारत के भोजपुरिया फिल्म इंडस्ट्री अथवा भोजपुरिया बेल्ट में काफी बाद में आया, जब कंचन और बाबला ने इसे 1983 में रिमेक गीत को गाया। इसके पहले इसे त्रिनिदाद में सुंदर पोपो ने गाया था। 1983 में कंचन और डाबला के इस गीत को तत्कालीन समाज में भोंडा माना जाता था। किसी शादी-समारोह या सार्वजनिक स्थल पर इसे बजाया जाता था, तो मां-बहनें चेहरे पर साड़ी का पल्लू रखकर मुंह छुपा लेती और गीत बजने वाले स्थान से बुदबुदाती-गरियाती हुई चुपके से चमककर रुखसत हो जातीं।
1980 के ही दशक में बंबइया फिल्म इंडस्ट्री में एक गाना 'दोनों जवानी के मस्ती में चूर, तेरा कुसूर न मेरा कुसूर, एक्सीडेंट हो गया रब्बा-रब्बा...।' यह गाना किस फिल्म का है, इसके अभिनेता कौन हैं और इसे किस सिचुएशन में फिल्माया गया, कहने की जरूरत नहीं। यह गीत भी उस जमाने के नौजवानों के रंगों में बहने वाले लहू में उबाल भर देता और वे नारियों के प्रति आसक्त हो जाते। इस गाने के बारे में भी तत्कालीन सभ्य समाज के लोगों में वही धारणा थी, जो 'कंचन और बाबला' के गाए गीत के प्रति थी। इस गीत को भी सार्वजनिक स्थल अथवा शादी-समारोह में बजाने के बाद औरतों की वहीं प्रतिक्रिया होती, जो 'फुलौरी बिना चटनी' को लेकर होती।
इन दोनों गीतों के प्रति सभ्य समाज के लोगों की इस तरह की अवधारणा इसलिए थी, क्योंकि हमारे समाज में उस समय इस तरह का भोंडापन या खुलापन नहीं था, जो उसे आसानी हजम कर सके। बाद के बरसों में फिल्मकारों ने अपनी-अपनी फिल्मों में ऐसा-ऐसा व्यंजन परोसा कि भाई लोग 1990 का दशक आते-आते रशियन टीवी के आदी हो गए। 21 सदी में तो पूछिए ही मत, कुकुरमुत्तों की तरह पोर्नोसाइट्स की बाढ़ ही आ गई। 21वीं सदी की शुरुआत से 2016 के सितंबर तक तो फिर भी यह साइबर कैफे, लैपटॉप और डेस्कटॉप तक ही सिमटा था, मगर दूरसंचार के क्षेत्र में तथाकथित तौर पर क्रांति लाने के लिए पेश किये गये 'जिओ' इसे हर घर के हर बिस्तर के नीचे, गली-कूचों, राह-बाट, स्कूल-कॉलेज, जहां हम आप सोच भी नहीं सकेंगे; वहां उतार कर रख दिया। दूरसंचार क्षेत्र की तथाकथित इस क्रांति ने भले ही कुछ नहीं दिया हो, मगर भारत के नौजवानों की किस्मत और हाथों में क्लीवता की डोर थमाने का काम जरूर किया। 1980 के दशक के जिस भारत देश में यहां की औरतें होंगे गानों के बोल सुनकर शर्म और नफ़रत से लाल हो जाया करती थीं, आज 21वीं सदी के दूसरे दशक के आते-आते उसी भारत में कैसा माहौल बदला है, यह भी कहने की जरूरत नहीं है।
1980 के ही दशक के दौरान भारतीय राजनीति में भी कई परिवर्तन देखे गए। आपातकाल और जेपी के आंदोलन से देश उबरा था। भारत में इंदिरा गांधी की सरकार थी। जनसंघ भारतीय जनता पार्टी बन चुका था। राजनीतिक स्वच्छता कायम करने को लेकर बहस और प्रयास जारी थे। राजनीतिक गलियारों में एक-दूसरे दल के लोगों द्वारा आरोप-प्रत्यारोप लगाते जाते, मगर भाषायी शुचिता और मर्यादा का भी ख्याल रखा जाता। 1990 के दशक में जब पूर्व प्रधानमंत्री मंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह की ओर से मंडल कमीशन की सिफारिशों को लागू किया गया और जनमोर्चा से टूटकर नये राजनीतिक दलों का अभ्युदय होने लगा, तो राजनीतिक गलियारे से भाषायी मर्यादा पर भी आघात होने लगा। लालू प्रसाद यादव के राजनीतिक पटल पर अभ्युदय के बाद यह मर्यादा तार-तार हो गई। आज जब 21वीं सदी का दूसरा दशक आने को है, तो देश के राजनीतिक गलियारों में किस तरह की भाषा का प्रयोग किया जा रहा है, वह कहने की जरूरत नहीं है। जैसे फिल्मकारों ने अपने प्रोडक्ट को बेचने के लिए सामाजिक सोच को बदला, वैसे ही आज के राजनेताओं ने वोट की राजनीति करने के लिए देश की आबोहवा को बदल कर रख दिया। अब इसमें देश के नागरिकों को यह तय करना होगा कि इस बदले परिवेश में उन्हें क्या ग्रहण करना है और किसे त्यागना है। देश में हर जगह उत्पादों की भरमार है।

जारी....

लाजो न लागौ सजनवा तोरा

विश्वत सेन

लाजो न लागौ सजनवा तोरा, सब जनवा मोराबे हो।
जनवा मोराबे तू काहे सजन, मनवा भरमावै हो।
लाजो न लागौ सजनवा तोरा.....

चाह बेच चहबच्चा बनैलों, बचन बेच कै बागी;
आह बेच अलबत्ते कमैलों, बचे न कोई रागी;
अब्बो न जो तू संभरबे सजनवा, सब जनवा मोराबे हो;
लाजो न लागौ सजनवा तोरा....

गाय-माय नहिं हाय लेबै हे, आह भरै नहीं नानी;
धांय-धाय तुहि प्राण लेबै जो, स्याह भई है जवानी;
अब्बो न जो तू संभरबे सजनवा, सब जवना मोराबे हो;
लाजो न लागौ सजनवा तोरा...

भोट मिलौ नहिं चोट करे तू, घोंट-घोट मन खोट करै तू;
नोच-खसोट कै नोट भरै तू, लोटपोट तन सोंट करै तू;
अब्बो न जो तू संभरबे सजनवा, सनतवा मोराबे हो;
लाजो न लागौ सजनवा तोरा, सब जनवा मोराबे हो।


~घड़ियाल बाबू

सोमवार, 29 जनवरी 2018

विरासत के झरोखे से-(भाग-एक)

विश्वत सेन
हमारे बाबूजी बचपन में बताते थे, "मकदुनिया का शासक सिकंदर (जिसे सिकंदर महान भी कहा जाता है।) जब दुनिया को जीतने के अभियान के दौरान भारत पर आक्रमण करने की तैयारी में था, तब उसने अपने राजनीतिक गुरु अरस्तू (384 ईपू-322 ईपू) से पूछा था-"गुरुजी मैं भारत जा रहा हूं, वहां से आपके लिए क्या लाऊंगा।" इस पर अरस्तू ने जवाब दिया था-"भारत जा रहे हो, तो हमारे लिए क्या लाओगे?"
सिकंदर-"जो आप कहेंगे।"
पहले तो अरस्तू अपनी इच्छा जताने में दिलचस्पी नहीं दिखाए, मगर सिकंदर ने जिद किया, तो उन्होंने कहा-" अव्वल यह कि तुम भारत विजय की मंशा त्याग दो। दूसरा यह कि अगर तुम भारत जा ही रहे हो और जिंदा वापस आ जाओ, तो वहां के संत पुरुषों (गेरुआ धारण करने मात्र से कोई संत नहीं हो जाता।) से मुलाकात करते आना और अगर हो सके, तो कौटिल्य (375 ईपू-283 ईपू) से मिलते आना।"
सिकंदर भारत आया, आक्रमण किया; मगर न तो उसकी मुलाकात संतों से हो सकी और न कौटिल्य से। वजह ये थी कि वह मगध तक आधिपत्य जमाने के पहले पंजाब में ही युद्ध के दौरान गंभीर रूप से घायल हो गया। घायलावस्था में ही वह वापस लौटने लगा, लेकिन उसकी रास्ते में ही मौत हो गयी।"
बाबूजी यह बात हम लोगों को आज से कम से कम तीन दशक पहले बताते थे। आज जब बाबूजी की यह बात जेहन में आयी कि ईसा पूर्व चौथी शताब्दी में आज की तरह संचार और सूचना के इतने सारे तीव्रगामी साधन नहीं थे और कौटिल्य या फिर अरस्तू अपने देश से बाहर नहीं निकले, क्योंकि तब आज के बड़े और बुद्धजीवी लोगों की तरह घुटनों में उड़न खटोले का पंख भी बंधा नहीं होता था; बावजूद इसके सात समद पार का एक बुद्धजीवी सात समद पार के दूसरे बुद्धजीवी को इतने करीब से जानता था? 
दूसरा आवागमन के आज की तरह द्रुतगामी साधन न होने के बावजूद करोबार और उन्नत कारोबार होता था। भारत के लोगों ने कभी भी अपने यहां निवेश के लिए किसी दूसरे राष्ट्र को आमंत्रित करने नहीं जाते थे, फिर भी भारत सोने की चिड़िया था।
आज आवागमन के द्रुतगामी साधन हैं, संचार और सूचना के मुफ्त तीव्रगामी साधन उपलब्ध हैं और बुद्धजीवी लोगों का भंडार है, बावजूद इसके देश में अमन नहीं है, विकास की बात की जाती है, मगर पेट पर आफत है। देश का मुखिया निवेश के लिए दुनिया भर के देश से गिड़गिड़ा रहा है, विदेश जाता है, पर मारीशस ही साथ देता है।

जारी.....

मंगलवार, 19 सितंबर 2017

क्या यही रामराज है?

विश्वत सेन
रामराज। समभावी एवं समग्राही अथवा सर्वग्राही शासन की परिकल्पना। शायद लोकतंत्र के सूत्रधारों ने यही सोचकर इस रामराज के शासकीय सिद्धांत को प्रतिपादित किया था कि इस समभावी सिद्धांत पर जनता की जरूरत के अनुरूप सुविधा उपलब्ध कराने के लिए माहौल तैयार किया जाए और शासन में समरूपता हो, ताकि जनता खुशहाल रहे। शायद यही लोकतंत्र की मर्यादा भी है।
यह शास्त्रोक्त और किंवदंती भी है कि दशरथ पुत्र मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम चंद्र जी के राज्य में जनता खुशहाल थी। वह त्रेता युग था और तब राजतंत्र था। आम तौर पर यह माना जाता रहा है कि शासन के राजतंत्रात्मक प्रणाली में राजा चाहे कितना ही उदार क्यों न हो, मगर उसमें वर्चस्विता और एकात्मवादी भाव होता ही है। वर्चस्विता का भाव न केवल अपने पड़ोसी राज्यों के साथ होता है, बल्कि उसका असर जनजीवन पर भी पड़ता रहा है।
राजतंत्रात्मक शासकीय प्रणाली में राजा के द्वारा शासन चलाने के लिए कथित तौर पर मंत्रियों की नियुक्ति की तो जाती थी, मगर वे सभी राजेच्छा के विपरीत शायद ही कोई कदम उठाते। मंत्रीगण अपने पद को बचाते रखने की खातिर  ठकुरसुहाती और चारण प्रथा का सहारा लेते। अधिकतर राजा चूंकि अपने राज़ प्रासादिक भोग-विलास में लिप्त रहते, इसलिए उन्हें राज्य वास्तविक वस्तुस्थिति का भान कम ही रहता। जनता की दशा-दिशा को लेकर जो माहौल ठकुरसुहाती करने वाले मंत्रियों द्वारा पेश किया जाता, राजा उसे अंतिम सत्य मानकर लेते। न मानने का कोई कारण न बनता, क्योंकि राज्य में सर्वत्र खुशहाली की ऐसी तस्वीर और उसके समर्थन में ऐसे साक्ष्य पेश किये जाते कि यकीन न करने का कोई कारण न बनता। बिरले राजा ऐसे होते, जो राज्य की वास्तविक वस्तुस्थिति को जानने के लिए जासूसी का सहारा लेते या फिर खुद यदा-कदा वेश बदलकर राज्य भ्रमण पर अज्ञातवास के नाम पर निकल जाते। इन राजाओं को वास्तविक वस्तुस्थिति का भान तो तब होता, जब दूर या पड़ोस का दुश्मन राज उन पर हमला करता या फिर राजविद्रोह के परिणामस्वरूप वे जबरिया अपदस्थ कर दिये जाते। कुछ राजा जो अतिमहत्वाकांक्षी होते, तो वे चक्रवर्ती बनने के लिए अपने द्वीप समूह के राजा-रजवाड़ों पर अपना वर्चस्व स्थापित कर एकच्छत्र राज्य स्थापित करते। प्रत्येक राजा अपने हिसाब से खुद का चारणान करवाता या फिर आत्मकथा लिखवाता और अपनी ही मर्जी से जनता पर शासन करता।
न्याय और शासन व्यवस्था पूरी तरह से एक ही व्यक्ति के हाथों में होती। शासन के इस प्रणाली में राजा, उसके सगे-संबंधी, मंत्री और उसके सगे-संबंधी, व्यापारी और उसके सगे-संबंधी, विद्वान और उसके सगे-संबंधी, राज पुरोहित और उसके सगे-संबंधी तथा शासन के नजदीक रहने वाले और उसके सगे-संबंधियों में खुशहाली नजर तो आती, मगर आम जनता तब भी निरीह ही रहती।
राजतंत्रात्मक प्रणाली की यह गाथा अकेले भारतीय उपमहाद्वीप की नहीं है, बल्कि दुनिया के सात महाद्वीपों के देशों में थी। चाहे वह फ्रांस हो, रूस हो, ग्रेट ब्रिटेन हो या फिर कोई और देश; व्यक्तिवादी और वंशवादी निरंकुशता की वजह से कई देशों में राजद्रोह भी हुए और राजाओं को अपदस्थ कर नये राजा को गद्दी भी मिली, मगर राजकीय प्रमाद अक्सर निरंकुशता को जन्म दे ही देती।
यही वजह रही कि पूरी दुनिया में राजतंत्रात्मक प्रणाली विफल रही और फिर शासन की लोकतंत्रात्मक प्रणाली की परिकल्पना को मूर्त रूप दिया गया, जिसे दूसरे शब्दों में रामराज भी कह सकते हैं।
भारत दुनिया के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देशों में एक है। वजह यह है कि इस देश पर करीब दो सौ सालों तक अंग्रेजी हुकूमत रहने के बाद आजादी देने की बात आई, तब इसे एक गणतांत्रिक देश बनाने के लिए दुनिया के कई देशों के कानून और संविधान को मिलाकर एक संविधान तैयार किया गया, ताकि यहां पर रामराज स्थापित किया जा सके। आजादी के आज सत्तर साल से अधिक हो गये, मगर रामराज का प्रतिबिंब अभी तक नजर नहीं आया है। हालांकि, राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के समय से लेकर आज तक राजनीतिक तौर पर इसकी चर्चा की तो जाती है, मगर यह जमीनी स्तर पर शासन से अभी कोसों दूर है।
क्रमशः जारी...


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गुरुवार, 21 अप्रैल 2016

...और जब अंगूरी तड़ीपार हो गयी

विश्वत सेन
बिहार के मुख्यमंत्री सुशासन बाबू कहते हैं कि नासपीटी, अंगूर की इस बेटी ने उनके सूबे के लोगों को नशे में सराबोर करके जिंदगियों को बरबाद करके रख दिया है। वह गरीबों की जिंदगी को लील रही है। लोग दारू पीकर अपनी घरैतिन को पीटते हैं। बच्चों को दाने-दाने के बिना तरसाते हैं। अपनी कमाई का ज्यादातर हिस्सा अंगूर की बेटी को भेंट कर आते हैं। वे इतना ही नहीं कहते, बल्कि ये भी कहते हैं कि इसी अंगूर की बेटी ने बिहार के लोगों को बिगाड़कर अपराधी बना दिया। इसी नासपीटी की वजह से उनके शासन में अपराध के ग्राफ बढ़ रहे हैं। अचंभा तो तब होता है, जब वे यह कहते हैं कि पटना के श्रीकृष्ण हॉल में एक चुनावी कार्यक्रम के तहत एक महिला ने उनसे सूबे में बढ़ते शराब के चलन और उससे होने वाले नुकसान को देखते हुए उसे पूरी तरह बंद करने की गुजारिश की। इस कपोलकल्पित कहानी को सुशासन बाबृ ने हकीकत में बदल दिया और राजस्व के नुकसान की परवाह किये बिना एक अप्रैल, 2016 से बिहार में पूर्ण शराब बंदी का ऐलान कर दिया।
शराब दिल, लीवर और फेफड़ों को जलती है। इसके साथ ही लोगों के घरों को भी फूंक देती है। इसे पीने वाला सेवन करने के पहले तक लोगों को इससे दूर रहने की नसीहत देता है, लेकिन शाम ढलते ही रगों में कीड़े कुलबुलाने शुरू हो जाते हैं और दिन में नसीहत देने वाला देर रात तक मधुशाला में नजर आता है। मतलब साथ है कि जैसे शराब में घमंड नहीं है, वैसे ही शराब के सेवन करने वाले भी घमंडी नहीं होते। कसम खाते हैं, मगर अहम में उस पर अड़े भी नहीं रहते। मौका पाते ही कसम तोड़कर पहले वह काम करते हैं, जिसकी जरूरत होती है। दूसरा, जैसे शराब अमीर-गरीब और गंदगी और सफाई में फर्क नहीं करती, वैसे ही शराब के पुजारी अमीर-गरीब में फर्क नहीं समझते। समाजवाद का असली नजारा देर रात तक मयखाने में ही देखने को मिलता है। तीसरा, जैसे शराब कभी भी अपनी नशा चढ़ाने के लक्ष्य को नहीं भूलती, वैसे ही शराबी कभी अपने लक्ष्य को कभी नहीं भूलते। अंगूर की बेटी को हलक से उतारने के बाद चाहे नशा कितना भी चढ़ा हो, पहला लक्ष्य घर पहुंचने का होता है। इसका मतलब साफ है कि शराब और शराबी कभी अपने लक्ष्य से भटकते नहीं हैं। यह शराब का सामाजिक सरोकार है। सामाजिक सरोकार के इनते अधिक फायदे रखने के बाद भी बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार इसे अछूत मानकर अपने राज्य से तड़ीपार कर दिया।
आज अंगूर की बेटी अंगूरी को तड़ीपार हुए करीब 20 दिन हो गए हैं। इन 20 दिनों में पूरी दुनिया देख रही है कि बिहार में अपराध का ग्राफ पहले की ही तरह बरकरार है। लोगों के घर शराबी पतियों की वजह से नहीं, गरमी की आग से झुलसकर खाक हो रहे हैं। अब अंगूरी उत्पात नहीं मचा रही, बल्कि वे लोग तांडव कर रहे हैं, जिन्होने शराब बंदी के बाद सुशासन बाबू की तारीफ के पुल बांधे थे। अब बिहार और बिहारियों की नजर में अपराध नहीं हो रहा है। पूर्णत: शराब बंदी के बाद अपराध भी पूरी तरह समाप्त हो गया। अब बिहार में अपराध नहीं, राजनेताओं औ सियासतदानों का तांडव हो रहा है और सूबे में तांडव कर रहे हैं पालित-पोषित घाघ अपराधी। पीने वाले अब भी बाहर से मंगाकर पी रहे हैं। शराब और शराबी अमीर-गरीब में फर्क नहीं करता, लेकिन सरकार और सुशासन बाबू अमीर-गरीब फर्क कर रहे हैं। पैसे वाले पहले भी शराब की बहती गंगा में गरीबों को बदनाम करके शराब छलकाते थे। अब जबकि बिहार में शराब का सूखा पड़ा है, तब भी पैसे की गंगा बहाकर जाम छलका रहे हैं। सही मायने में महरूम तो वह बेचारा गरीब हो गया, जो दिनभर हाड़तोड़ मेहनत करने के बाद शाम को बदन का दर्द मिटाने के लिए अंगूरी की आगोश में चला जाता था। अब यदि दिनभर हाड़तोड़ मेहनत करने के बाद जब घरैतिन अपने आगोश में लेने के बजाय शाम को खरी-खोटी सुनाएगी, तो भला कौन इंसान ऐसा नहीं होगा, जो आगोश में जाने के लिए विकल्प की तलाश नहीं करेगा। सो, उसने किया, मगर उसकी घरैतिन और नासपीटी सुशासन बाबू की सरकार को वह भी नहीं सुहाया। 
सुशासन बाबू चाहे जितनी अपनी पीठ थपथपा लें, चाहे वह सूबे की घरैतिनों की चाहे जितनी वाहवाही ले लें, लेकिन इतना तय है कि बिहार के लाखों बेवड़ों की हाय उन्हें जरूर लगेगी। इन साफदिल और संगदिल बेवड़ों की हाय जब लगेगी, तो कहीं ऐसा न हो कि पांच साल बाद घरैतिनों का वोट मिलने के पहले ही उनकी सरकार भी तड़ीपार न हो जाए।