मंगलवार, 6 फ़रवरी 2018

फुलौरी बिन चटनी कैसे बनी (विरासत के झरोखे से...भाग-दो)

विश्वत सेन

'कैसे बनी, कैसे बनी; फुलौरी बिना चटनी कैसे बनी...'
1980 के दशक में भोजपुरिया फिल्म इंडस्ट्री अथवा भोजपुरिया बेल्ट में यह गाना बहुत अधिक प्रचलित हुआ noथा। इस गाने का मूल भाव ' बिना चटनी के फुलौरी कैसे बनेगी' था, जिसका दूसरा भाव उस समय के युवाओं और गीतकारों ने अपने अंदाज में पेश किया और स्वीकारा। दरअसल, भोजपुरी भाषा का यह गीत भारत के भोजपुरिया फिल्म इंडस्ट्री अथवा भोजपुरिया बेल्ट में काफी बाद में आया, जब कंचन और बाबला ने इसे 1983 में रिमेक गीत को गाया। इसके पहले इसे त्रिनिदाद में सुंदर पोपो ने गाया था। 1983 में कंचन और डाबला के इस गीत को तत्कालीन समाज में भोंडा माना जाता था। किसी शादी-समारोह या सार्वजनिक स्थल पर इसे बजाया जाता था, तो मां-बहनें चेहरे पर साड़ी का पल्लू रखकर मुंह छुपा लेती और गीत बजने वाले स्थान से बुदबुदाती-गरियाती हुई चुपके से चमककर रुखसत हो जातीं।
1980 के ही दशक में बंबइया फिल्म इंडस्ट्री में एक गाना 'दोनों जवानी के मस्ती में चूर, तेरा कुसूर न मेरा कुसूर, एक्सीडेंट हो गया रब्बा-रब्बा...।' यह गाना किस फिल्म का है, इसके अभिनेता कौन हैं और इसे किस सिचुएशन में फिल्माया गया, कहने की जरूरत नहीं। यह गीत भी उस जमाने के नौजवानों के रंगों में बहने वाले लहू में उबाल भर देता और वे नारियों के प्रति आसक्त हो जाते। इस गाने के बारे में भी तत्कालीन सभ्य समाज के लोगों में वही धारणा थी, जो 'कंचन और बाबला' के गाए गीत के प्रति थी। इस गीत को भी सार्वजनिक स्थल अथवा शादी-समारोह में बजाने के बाद औरतों की वहीं प्रतिक्रिया होती, जो 'फुलौरी बिना चटनी' को लेकर होती।
इन दोनों गीतों के प्रति सभ्य समाज के लोगों की इस तरह की अवधारणा इसलिए थी, क्योंकि हमारे समाज में उस समय इस तरह का भोंडापन या खुलापन नहीं था, जो उसे आसानी हजम कर सके। बाद के बरसों में फिल्मकारों ने अपनी-अपनी फिल्मों में ऐसा-ऐसा व्यंजन परोसा कि भाई लोग 1990 का दशक आते-आते रशियन टीवी के आदी हो गए। 21 सदी में तो पूछिए ही मत, कुकुरमुत्तों की तरह पोर्नोसाइट्स की बाढ़ ही आ गई। 21वीं सदी की शुरुआत से 2016 के सितंबर तक तो फिर भी यह साइबर कैफे, लैपटॉप और डेस्कटॉप तक ही सिमटा था, मगर दूरसंचार के क्षेत्र में तथाकथित तौर पर क्रांति लाने के लिए पेश किये गये 'जिओ' इसे हर घर के हर बिस्तर के नीचे, गली-कूचों, राह-बाट, स्कूल-कॉलेज, जहां हम आप सोच भी नहीं सकेंगे; वहां उतार कर रख दिया। दूरसंचार क्षेत्र की तथाकथित इस क्रांति ने भले ही कुछ नहीं दिया हो, मगर भारत के नौजवानों की किस्मत और हाथों में क्लीवता की डोर थमाने का काम जरूर किया। 1980 के दशक के जिस भारत देश में यहां की औरतें होंगे गानों के बोल सुनकर शर्म और नफ़रत से लाल हो जाया करती थीं, आज 21वीं सदी के दूसरे दशक के आते-आते उसी भारत में कैसा माहौल बदला है, यह भी कहने की जरूरत नहीं है।
1980 के ही दशक के दौरान भारतीय राजनीति में भी कई परिवर्तन देखे गए। आपातकाल और जेपी के आंदोलन से देश उबरा था। भारत में इंदिरा गांधी की सरकार थी। जनसंघ भारतीय जनता पार्टी बन चुका था। राजनीतिक स्वच्छता कायम करने को लेकर बहस और प्रयास जारी थे। राजनीतिक गलियारों में एक-दूसरे दल के लोगों द्वारा आरोप-प्रत्यारोप लगाते जाते, मगर भाषायी शुचिता और मर्यादा का भी ख्याल रखा जाता। 1990 के दशक में जब पूर्व प्रधानमंत्री मंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह की ओर से मंडल कमीशन की सिफारिशों को लागू किया गया और जनमोर्चा से टूटकर नये राजनीतिक दलों का अभ्युदय होने लगा, तो राजनीतिक गलियारे से भाषायी मर्यादा पर भी आघात होने लगा। लालू प्रसाद यादव के राजनीतिक पटल पर अभ्युदय के बाद यह मर्यादा तार-तार हो गई। आज जब 21वीं सदी का दूसरा दशक आने को है, तो देश के राजनीतिक गलियारों में किस तरह की भाषा का प्रयोग किया जा रहा है, वह कहने की जरूरत नहीं है। जैसे फिल्मकारों ने अपने प्रोडक्ट को बेचने के लिए सामाजिक सोच को बदला, वैसे ही आज के राजनेताओं ने वोट की राजनीति करने के लिए देश की आबोहवा को बदल कर रख दिया। अब इसमें देश के नागरिकों को यह तय करना होगा कि इस बदले परिवेश में उन्हें क्या ग्रहण करना है और किसे त्यागना है। देश में हर जगह उत्पादों की भरमार है।

जारी....

लाजो न लागौ सजनवा तोरा

विश्वत सेन

लाजो न लागौ सजनवा तोरा, सब जनवा मोराबे हो।
जनवा मोराबे तू काहे सजन, मनवा भरमावै हो।
लाजो न लागौ सजनवा तोरा.....

चाह बेच चहबच्चा बनैलों, बचन बेच कै बागी;
आह बेच अलबत्ते कमैलों, बचे न कोई रागी;
अब्बो न जो तू संभरबे सजनवा, सब जनवा मोराबे हो;
लाजो न लागौ सजनवा तोरा....

गाय-माय नहिं हाय लेबै हे, आह भरै नहीं नानी;
धांय-धाय तुहि प्राण लेबै जो, स्याह भई है जवानी;
अब्बो न जो तू संभरबे सजनवा, सब जवना मोराबे हो;
लाजो न लागौ सजनवा तोरा...

भोट मिलौ नहिं चोट करे तू, घोंट-घोट मन खोट करै तू;
नोच-खसोट कै नोट भरै तू, लोटपोट तन सोंट करै तू;
अब्बो न जो तू संभरबे सजनवा, सनतवा मोराबे हो;
लाजो न लागौ सजनवा तोरा, सब जनवा मोराबे हो।


~घड़ियाल बाबू

सोमवार, 29 जनवरी 2018

विरासत के झरोखे से-(भाग-एक)

विश्वत सेन
हमारे बाबूजी बचपन में बताते थे, "मकदुनिया का शासक सिकंदर (जिसे सिकंदर महान भी कहा जाता है।) जब दुनिया को जीतने के अभियान के दौरान भारत पर आक्रमण करने की तैयारी में था, तब उसने अपने राजनीतिक गुरु अरस्तू (384 ईपू-322 ईपू) से पूछा था-"गुरुजी मैं भारत जा रहा हूं, वहां से आपके लिए क्या लाऊंगा।" इस पर अरस्तू ने जवाब दिया था-"भारत जा रहे हो, तो हमारे लिए क्या लाओगे?"
सिकंदर-"जो आप कहेंगे।"
पहले तो अरस्तू अपनी इच्छा जताने में दिलचस्पी नहीं दिखाए, मगर सिकंदर ने जिद किया, तो उन्होंने कहा-" अव्वल यह कि तुम भारत विजय की मंशा त्याग दो। दूसरा यह कि अगर तुम भारत जा ही रहे हो और जिंदा वापस आ जाओ, तो वहां के संत पुरुषों (गेरुआ धारण करने मात्र से कोई संत नहीं हो जाता।) से मुलाकात करते आना और अगर हो सके, तो कौटिल्य (375 ईपू-283 ईपू) से मिलते आना।"
सिकंदर भारत आया, आक्रमण किया; मगर न तो उसकी मुलाकात संतों से हो सकी और न कौटिल्य से। वजह ये थी कि वह मगध तक आधिपत्य जमाने के पहले पंजाब में ही युद्ध के दौरान गंभीर रूप से घायल हो गया। घायलावस्था में ही वह वापस लौटने लगा, लेकिन उसकी रास्ते में ही मौत हो गयी।"
बाबूजी यह बात हम लोगों को आज से कम से कम तीन दशक पहले बताते थे। आज जब बाबूजी की यह बात जेहन में आयी कि ईसा पूर्व चौथी शताब्दी में आज की तरह संचार और सूचना के इतने सारे तीव्रगामी साधन नहीं थे और कौटिल्य या फिर अरस्तू अपने देश से बाहर नहीं निकले, क्योंकि तब आज के बड़े और बुद्धजीवी लोगों की तरह घुटनों में उड़न खटोले का पंख भी बंधा नहीं होता था; बावजूद इसके सात समद पार का एक बुद्धजीवी सात समद पार के दूसरे बुद्धजीवी को इतने करीब से जानता था? 
दूसरा आवागमन के आज की तरह द्रुतगामी साधन न होने के बावजूद करोबार और उन्नत कारोबार होता था। भारत के लोगों ने कभी भी अपने यहां निवेश के लिए किसी दूसरे राष्ट्र को आमंत्रित करने नहीं जाते थे, फिर भी भारत सोने की चिड़िया था।
आज आवागमन के द्रुतगामी साधन हैं, संचार और सूचना के मुफ्त तीव्रगामी साधन उपलब्ध हैं और बुद्धजीवी लोगों का भंडार है, बावजूद इसके देश में अमन नहीं है, विकास की बात की जाती है, मगर पेट पर आफत है। देश का मुखिया निवेश के लिए दुनिया भर के देश से गिड़गिड़ा रहा है, विदेश जाता है, पर मारीशस ही साथ देता है।

जारी.....

मंगलवार, 19 सितंबर 2017

क्या यही रामराज है?

विश्वत सेन
रामराज। समभावी एवं समग्राही अथवा सर्वग्राही शासन की परिकल्पना। शायद लोकतंत्र के सूत्रधारों ने यही सोचकर इस रामराज के शासकीय सिद्धांत को प्रतिपादित किया था कि इस समभावी सिद्धांत पर जनता की जरूरत के अनुरूप सुविधा उपलब्ध कराने के लिए माहौल तैयार किया जाए और शासन में समरूपता हो, ताकि जनता खुशहाल रहे। शायद यही लोकतंत्र की मर्यादा भी है।
यह शास्त्रोक्त और किंवदंती भी है कि दशरथ पुत्र मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम चंद्र जी के राज्य में जनता खुशहाल थी। वह त्रेता युग था और तब राजतंत्र था। आम तौर पर यह माना जाता रहा है कि शासन के राजतंत्रात्मक प्रणाली में राजा चाहे कितना ही उदार क्यों न हो, मगर उसमें वर्चस्विता और एकात्मवादी भाव होता ही है। वर्चस्विता का भाव न केवल अपने पड़ोसी राज्यों के साथ होता है, बल्कि उसका असर जनजीवन पर भी पड़ता रहा है।
राजतंत्रात्मक शासकीय प्रणाली में राजा के द्वारा शासन चलाने के लिए कथित तौर पर मंत्रियों की नियुक्ति की तो जाती थी, मगर वे सभी राजेच्छा के विपरीत शायद ही कोई कदम उठाते। मंत्रीगण अपने पद को बचाते रखने की खातिर  ठकुरसुहाती और चारण प्रथा का सहारा लेते। अधिकतर राजा चूंकि अपने राज़ प्रासादिक भोग-विलास में लिप्त रहते, इसलिए उन्हें राज्य वास्तविक वस्तुस्थिति का भान कम ही रहता। जनता की दशा-दिशा को लेकर जो माहौल ठकुरसुहाती करने वाले मंत्रियों द्वारा पेश किया जाता, राजा उसे अंतिम सत्य मानकर लेते। न मानने का कोई कारण न बनता, क्योंकि राज्य में सर्वत्र खुशहाली की ऐसी तस्वीर और उसके समर्थन में ऐसे साक्ष्य पेश किये जाते कि यकीन न करने का कोई कारण न बनता। बिरले राजा ऐसे होते, जो राज्य की वास्तविक वस्तुस्थिति को जानने के लिए जासूसी का सहारा लेते या फिर खुद यदा-कदा वेश बदलकर राज्य भ्रमण पर अज्ञातवास के नाम पर निकल जाते। इन राजाओं को वास्तविक वस्तुस्थिति का भान तो तब होता, जब दूर या पड़ोस का दुश्मन राज उन पर हमला करता या फिर राजविद्रोह के परिणामस्वरूप वे जबरिया अपदस्थ कर दिये जाते। कुछ राजा जो अतिमहत्वाकांक्षी होते, तो वे चक्रवर्ती बनने के लिए अपने द्वीप समूह के राजा-रजवाड़ों पर अपना वर्चस्व स्थापित कर एकच्छत्र राज्य स्थापित करते। प्रत्येक राजा अपने हिसाब से खुद का चारणान करवाता या फिर आत्मकथा लिखवाता और अपनी ही मर्जी से जनता पर शासन करता।
न्याय और शासन व्यवस्था पूरी तरह से एक ही व्यक्ति के हाथों में होती। शासन के इस प्रणाली में राजा, उसके सगे-संबंधी, मंत्री और उसके सगे-संबंधी, व्यापारी और उसके सगे-संबंधी, विद्वान और उसके सगे-संबंधी, राज पुरोहित और उसके सगे-संबंधी तथा शासन के नजदीक रहने वाले और उसके सगे-संबंधियों में खुशहाली नजर तो आती, मगर आम जनता तब भी निरीह ही रहती।
राजतंत्रात्मक प्रणाली की यह गाथा अकेले भारतीय उपमहाद्वीप की नहीं है, बल्कि दुनिया के सात महाद्वीपों के देशों में थी। चाहे वह फ्रांस हो, रूस हो, ग्रेट ब्रिटेन हो या फिर कोई और देश; व्यक्तिवादी और वंशवादी निरंकुशता की वजह से कई देशों में राजद्रोह भी हुए और राजाओं को अपदस्थ कर नये राजा को गद्दी भी मिली, मगर राजकीय प्रमाद अक्सर निरंकुशता को जन्म दे ही देती।
यही वजह रही कि पूरी दुनिया में राजतंत्रात्मक प्रणाली विफल रही और फिर शासन की लोकतंत्रात्मक प्रणाली की परिकल्पना को मूर्त रूप दिया गया, जिसे दूसरे शब्दों में रामराज भी कह सकते हैं।
भारत दुनिया के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देशों में एक है। वजह यह है कि इस देश पर करीब दो सौ सालों तक अंग्रेजी हुकूमत रहने के बाद आजादी देने की बात आई, तब इसे एक गणतांत्रिक देश बनाने के लिए दुनिया के कई देशों के कानून और संविधान को मिलाकर एक संविधान तैयार किया गया, ताकि यहां पर रामराज स्थापित किया जा सके। आजादी के आज सत्तर साल से अधिक हो गये, मगर रामराज का प्रतिबिंब अभी तक नजर नहीं आया है। हालांकि, राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के समय से लेकर आज तक राजनीतिक तौर पर इसकी चर्चा की तो जाती है, मगर यह जमीनी स्तर पर शासन से अभी कोसों दूर है।
क्रमशः जारी...


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गुरुवार, 21 अप्रैल 2016

...और जब अंगूरी तड़ीपार हो गयी

विश्वत सेन
बिहार के मुख्यमंत्री सुशासन बाबू कहते हैं कि नासपीटी, अंगूर की इस बेटी ने उनके सूबे के लोगों को नशे में सराबोर करके जिंदगियों को बरबाद करके रख दिया है। वह गरीबों की जिंदगी को लील रही है। लोग दारू पीकर अपनी घरैतिन को पीटते हैं। बच्चों को दाने-दाने के बिना तरसाते हैं। अपनी कमाई का ज्यादातर हिस्सा अंगूर की बेटी को भेंट कर आते हैं। वे इतना ही नहीं कहते, बल्कि ये भी कहते हैं कि इसी अंगूर की बेटी ने बिहार के लोगों को बिगाड़कर अपराधी बना दिया। इसी नासपीटी की वजह से उनके शासन में अपराध के ग्राफ बढ़ रहे हैं। अचंभा तो तब होता है, जब वे यह कहते हैं कि पटना के श्रीकृष्ण हॉल में एक चुनावी कार्यक्रम के तहत एक महिला ने उनसे सूबे में बढ़ते शराब के चलन और उससे होने वाले नुकसान को देखते हुए उसे पूरी तरह बंद करने की गुजारिश की। इस कपोलकल्पित कहानी को सुशासन बाबृ ने हकीकत में बदल दिया और राजस्व के नुकसान की परवाह किये बिना एक अप्रैल, 2016 से बिहार में पूर्ण शराब बंदी का ऐलान कर दिया।
शराब दिल, लीवर और फेफड़ों को जलती है। इसके साथ ही लोगों के घरों को भी फूंक देती है। इसे पीने वाला सेवन करने के पहले तक लोगों को इससे दूर रहने की नसीहत देता है, लेकिन शाम ढलते ही रगों में कीड़े कुलबुलाने शुरू हो जाते हैं और दिन में नसीहत देने वाला देर रात तक मधुशाला में नजर आता है। मतलब साथ है कि जैसे शराब में घमंड नहीं है, वैसे ही शराब के सेवन करने वाले भी घमंडी नहीं होते। कसम खाते हैं, मगर अहम में उस पर अड़े भी नहीं रहते। मौका पाते ही कसम तोड़कर पहले वह काम करते हैं, जिसकी जरूरत होती है। दूसरा, जैसे शराब अमीर-गरीब और गंदगी और सफाई में फर्क नहीं करती, वैसे ही शराब के पुजारी अमीर-गरीब में फर्क नहीं समझते। समाजवाद का असली नजारा देर रात तक मयखाने में ही देखने को मिलता है। तीसरा, जैसे शराब कभी भी अपनी नशा चढ़ाने के लक्ष्य को नहीं भूलती, वैसे ही शराबी कभी अपने लक्ष्य को कभी नहीं भूलते। अंगूर की बेटी को हलक से उतारने के बाद चाहे नशा कितना भी चढ़ा हो, पहला लक्ष्य घर पहुंचने का होता है। इसका मतलब साफ है कि शराब और शराबी कभी अपने लक्ष्य से भटकते नहीं हैं। यह शराब का सामाजिक सरोकार है। सामाजिक सरोकार के इनते अधिक फायदे रखने के बाद भी बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार इसे अछूत मानकर अपने राज्य से तड़ीपार कर दिया।
आज अंगूर की बेटी अंगूरी को तड़ीपार हुए करीब 20 दिन हो गए हैं। इन 20 दिनों में पूरी दुनिया देख रही है कि बिहार में अपराध का ग्राफ पहले की ही तरह बरकरार है। लोगों के घर शराबी पतियों की वजह से नहीं, गरमी की आग से झुलसकर खाक हो रहे हैं। अब अंगूरी उत्पात नहीं मचा रही, बल्कि वे लोग तांडव कर रहे हैं, जिन्होने शराब बंदी के बाद सुशासन बाबू की तारीफ के पुल बांधे थे। अब बिहार और बिहारियों की नजर में अपराध नहीं हो रहा है। पूर्णत: शराब बंदी के बाद अपराध भी पूरी तरह समाप्त हो गया। अब बिहार में अपराध नहीं, राजनेताओं औ सियासतदानों का तांडव हो रहा है और सूबे में तांडव कर रहे हैं पालित-पोषित घाघ अपराधी। पीने वाले अब भी बाहर से मंगाकर पी रहे हैं। शराब और शराबी अमीर-गरीब में फर्क नहीं करता, लेकिन सरकार और सुशासन बाबू अमीर-गरीब फर्क कर रहे हैं। पैसे वाले पहले भी शराब की बहती गंगा में गरीबों को बदनाम करके शराब छलकाते थे। अब जबकि बिहार में शराब का सूखा पड़ा है, तब भी पैसे की गंगा बहाकर जाम छलका रहे हैं। सही मायने में महरूम तो वह बेचारा गरीब हो गया, जो दिनभर हाड़तोड़ मेहनत करने के बाद शाम को बदन का दर्द मिटाने के लिए अंगूरी की आगोश में चला जाता था। अब यदि दिनभर हाड़तोड़ मेहनत करने के बाद जब घरैतिन अपने आगोश में लेने के बजाय शाम को खरी-खोटी सुनाएगी, तो भला कौन इंसान ऐसा नहीं होगा, जो आगोश में जाने के लिए विकल्प की तलाश नहीं करेगा। सो, उसने किया, मगर उसकी घरैतिन और नासपीटी सुशासन बाबू की सरकार को वह भी नहीं सुहाया। 
सुशासन बाबू चाहे जितनी अपनी पीठ थपथपा लें, चाहे वह सूबे की घरैतिनों की चाहे जितनी वाहवाही ले लें, लेकिन इतना तय है कि बिहार के लाखों बेवड़ों की हाय उन्हें जरूर लगेगी। इन साफदिल और संगदिल बेवड़ों की हाय जब लगेगी, तो कहीं ऐसा न हो कि पांच साल बाद घरैतिनों का वोट मिलने के पहले ही उनकी सरकार भी तड़ीपार न हो जाए।

रविवार, 13 मार्च 2016

व्यापक होता रहा है ट्रिपल एस

विश्वत सेन
ट्रिपल एस (सेक्स, स्कैंडल एंड सिक्योर या सेक्स, सेंसेशन एंड सिक्वल) के फॉर्मूले को जिस किसी ने भी गढ़ा है, बड़ा ही नेक काम किया है. पहले इस फॉर्मूले को एक खास वर्ग द्वारा उपयोग किया जाता था, मगर आज यह सार्वभौमिक हो गया है. किसी भी क्षेत्र में नजर उठाकर देख लीजिए ट्रिपल एस का फॉर्मूला व्यापक तरीके से नजर आता है. ताज्जुब तो तब होता है, जब धार्मिक कार्यों में भी इसका उपयोग किया जाने लगा है. हालांकि, पहले भी इसका उपयोग होता रहा है, लेकिन किसी कार्यक्रम को खास बनाने के लिए तो यह खास तौर पर उपयोग किया जाता है. भाई, उपयोग आखिर क्यों न किया जाए. जमाना ही इसका है. युवाओं को आकर्षित करना है, तो इसका तड़का लगाना ही होगा, अन्यथा कोई भी कार्यक्रम नीरस हो जाएगा. सबसे बड़ी बात यह है कि इस ट्रिपल एस फॉर्मूले में एक एस का उपयोग प्राय: अपने फायदे के लिए किया जाता है. 

रविवार, 5 अप्रैल 2015

बनारसी घाट के बीच गंगा बेचारी


विश्वत सेन
गंगा. पतित पावनी गंगा. इलाहाबाद वाली नहीं. हरिद्वार और ऋषिकेश वाली भी नहीं, ठेठ बनारस वाली. एकदम सपाट. दक्खिन से उत्तर की ओर बहने वाली. इस सतत अविरल प्रवाहिनी गंगा की सफाई के लिए केंद्र सरकार ने अलग एक मंत्रालय का गठन किया है. नयी सरकार बनी, तो पतित पावनी गंगा की सफाई का अभियान चला. अभी मार्च के अंतिम सप्ताह में बनारसी गंगा में लावारिस या सावारिस शवों को न बहने देने के लिए वित्त मंत्री अरुण जेटली ने शववाहिनी नौका भी उदघाटन किया. दुखद और बेहद चिंताजनक बात है कि यह शववाहिनी नौका मणिकर्णिका घाट के सामने खड़ी रहती है और उसी के सामने से लावारिस शव गंगा में प्रवाहित होता हुआ दक्षिण से उत्तर की ओर बढ़ जाता है. यही तो है बनारसी ठाठ. ठाठदार भला किसी की चिंता करता है? बनारसी ठाठ की बात ही निराली है. यह ज्ञान का विश्वविख्यात केंद्र है. इस शहर में ज्ञानी पैदा होते हैं औरनिवास भी करते हैं. ज्ञान और आस्था का केंद्र है, तभी तो यहां के दशाश्वमेध, अस्सी और ललिता घाट पर नित्यप्रति सायंकाल को गंगा आरती होती है. आरती के समय साधु-संत, देसी-विदेशी पर्यटकों के अलावा गंगा की छाती पर सुरक्षा कवच बनाते हुए चौकड़ी मारने वाले नाविक अपने-अपने नावों पर लोगों को सवार करके विहंगम दृश्य तैयार करते हैं. अभियान पर आस्था भारी पड़ जाती है. ज्ञानियों की इस नगरी में लोग भूल जाते हैं कि अविरल प्रवाहिनी गंगा को स्वच्छ रखना भी है. गंगा जब संसार के पतितों के पाप को धो सकती है, तो भला खुद को स्वच्छ नहीं रख सकती? गंगा को लेकर ज्ञानगंगा शिथिल हो जाती है और शिथिल हो जाते हैं वे लोग, जिनके कंधों पर इसे निर्मल बनाने की जिम्मेदारी है. उदघाटन और शिलान्यास कर दिया जाता है. क्रियान्वयन की निगरानी का इंतजाम भी गंगा की धाराओं की तरह बह जाता है. अगर बनारस का अपना अलग अंदाज और ठाठ है, तो भला उनका नहीं है क्या, जो निर्मलता को बढ़ावा देने का दिखावा कर रहे हैं? पान की पचपचाती पीक की तरह शहर की गलियों से निकलने वाला अवजल भी गंगा में समाहित होकर पाक-साफ होने के लिए बेचैन नजर आता है. आपस में नालियां होड़ मचाती हैं कि पहले मेरा, तो पहले मेरा. यह अवजल थोड़े ही है? यह तो जल निगम द्वारा यहां के निवासियों को दिया जाने वाला गंगाजल ही है, जो नालियों के माध्यम से फिर गंगा में समाहित हो रहा है. यह तो प्रकृति का नियम है. वर्षा का पानी नदियों में और नदियों का पानी सागर में, फिर सागर का पानी संघनित होकर वर्षा की बूंद बन जाता है. उसी तरह गंगा पानी नदी से निकलकर घरों में जाता है और फिर वही पुन: गंगा में आता है, तो इसमें बुराई क्या है? यह उसी का निकला हुआ अंश ही तो है, जो कुछ घंटे के लिए उससे जुदा हुआ था. जब गंगाजल पवित्र है, तो भला यह अपवित्र कैसे हो सकता है? यह व्यापारियों, ज्ञानियों, औघड़ों, फक्कड़ों, फकीरों और फटेहालों की नगरी है. तभी तो यहां घाट घाट का पानी पीने वाले लोग आते हैं और बनारसी बाबू बन जाते हैं. तभी तो गंगा के घाटों के किनारे हर शाम मिलने वाला माता अन्नपूर्णा के प्रसाद को ग्रहण करनेवालों का तांता लगा रहता है. क्या अमीर और क्या गरीब. सभी समभाव से दान-दक्षिणा देते हुए प्रसाद ग्रहण करते हैं. यहीं दिखता है देश का असली समाजवाद. एक ही पांत में बैठ कर खानेवाले अमीर और गरीब, लेकिन जिस गंगा के घाट पर समाजवाद का यह चेहरा दिखाई देता है, गंगा की सफाई के समय इसमें विद्रुपता आ जाती है. लोग बिसर जाते हैं सफाई अभियान को. बिसरें भी क्यों नहीं. जब बड़े-बड़े समाजवादी सूरमा बिसर जाते हैं. कुछ भी हो भइया, बनारसी ठाठ के बीच गंगा की जो दयनीय स्थिति बनी है, वह चिंतन के लायक नहीं, बल्कि चिंतनीय है. बनारसी ठाठ के बीच गंगा लाचार और बेबस बनी है.
जय हो गंगा मइया की, जय हो बाबा विश्वनाथ की.
अप्रैल पांच, 2015