रविवार, 31 अगस्त 2014

...तो क्या क्षीण हो रही है ‘वसुधैव कुटुंबकम्’ की आभा?

विश्वत सेन
हमारा देश भारत प्राचीन काल से ही पूरी सृष्टि और प्रकृति का सहचर रहा है। यही कारण है कि हमारे पुराणों और धार्मिक ग्रंथों में कथा-कहानियों और दंतकथाओं के माध्यम से प्रकृति की महत्ता को बनाये रखने की कोशिश की गयी है। वेदों और धार्मिक ग्रंथों में एक मौलिक लेकिन सार्वग्राही सिद्धांत ‘वसुधैव कुटुंबकम्’ का प्रतिपादन किया गया। इस सिद्धांत का अर्थ यह हुआ कि भारत में रहने वाले मनुष्य ही नहीं, बल्कि इस पृथ्वी के चराचर वाशिंदे हमारे कुटुंब यानी रिश्तेदार हैं। यही कारण है कि हमारे धार्मिक ग्रंथों में जानवरों, वृक्षों, पौधों, पर्वतों, नदियों और सरोवरों को पवित्र मानकर पूजनीय कहा गया है। अगर हम इसके धार्मिक पहलू को छोड़ भी दें, तो इसका एक बहुत बड़ा वैज्ञानिक पहलू भी है। एक साधारण सा उदाहरण है कि यदि हम इस देश का वासी या फिर तथाकथित हिूंद होने के नाते गाय या फिर तुलसी, पीपल, वटवृक्ष आदि की पूजा करते हैं, तो इसके पीछे धार्मिक आस्था तो जुड़ी हुई तो है ही, मगर इसके पीछे एक बहुत बड़ा वैज्ञानिक तथ्य भी छुपा हुआ है। यदि हम तुलसी के पौधे को अपने घरों के आंगन, छत, कॉरिडोर आदि में गमले में सजाकर पूजा करते हैं, तो तुलसी का यह पौधा हमें कई रोगों से मुक्ति दिलाता है। यदि किसी को खांसी हो गयी हो, तो तुलसी के पत्ताें के साथ कालीमिर्च मिलाकर काढ़ा बनाकर पीने से नजला-जुकाम समाप्त हो जाता है। दूसरा कोई किसान या परिवार अपने घर में गाय का पालन करता है, तो उससे भी उसे कई फायदे मिलते हैं। पहला तो यह कि इसका दूध अमृत के समान होता है, दूसरा यह कि उसका मूत्र और गोबर भी मनुष्य के शरीर और पर्यावरण के लिए अधिक उपयोगी होता है। गाय के गोबर से घर लीपने के बाद उसके आसपास के वातावरण में व्याप्त सारे कीटाणु समाप्त हो जाते हैं, तो ईंधन के रूप में कंडे (गोइठा) के इस्तेमाल से मच्छरों का प्रकोप कम हो जाता है। तीसरा, पीपल का पेड़ भी हमारे लिए अधिक उपयोगी है। इसका धार्मिक पहलू तो है ही, साथ ही इसका वैज्ञानिक पहलू यह भी है कि इसके पत्ताें में ऑक्सीजन के उत्सजर्न और कार्बनडाइऑक्साइड के अवग्रहण की क्षमता अधिक होती है। इसीलिए पीपल का पेड़ हमारे लिए अधिक महत्वपूर्ण है। आंवला को तो सभी जानते हैं। अक्षय तृतीया के दिन हम आंवले का भी पूजन करते हैं। आंवला एक ऐसा वनस्पति है, जो शरीर के पाचनतंत्र और आंखों की दृष्टि को मजबूत करने के साथ ही शक्तिवर्धक भी है। यह तो रही वनस्पतियों की बात। इससे इतर यदि हम विषैले जंतुओं के वैज्ञानिक पहलुओं की बात करें, तो ब्लैक कोबरा और बिच्छू के जहर से कई तरह की जीवनरक्षक दवाओं का निर्माण किया जाता है। इसीलिए वैदिककालीन मनीषियों ने ‘वसुधैव कुटुंबकम्’ के सनातनी सिद्धांत का प्रतिपादन किया।
बदलते समय के अनुसार इस सनातनी सिद्धांत पर रूढ़िवादियों का दबदबा कायम होता गया और वैज्ञानिक पहलुओं को धर्म, आस्था और भावनाओं के साथ जोड़ दिया गया। ज्यादा अतीत के झारोखे में ताकने की दरकरार नहीं है। आजादी के पहले अमेरिका में भारत की ओर से प्रतिनिधित्व करते हुए जब विवेकानंद ने हिंदी में भाषण दिया था, तब भी वसुधैव कुटुंबकम् के सिद्धांत को ध्यान में रखा गया था। आजादी के बाद जब पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने संयुक्त राष्ट्र संघ में हिंदी में भाषण दिया, तब भी उसकी अहमियत को कुछ हद तक बरकरार रखने के लायक समझा गया। तब तक यह माना जाता रहा कि भारत में अब भी लोग इस सनातनी सिद्धांत को अक्षुण्ण और अखंड बनाये रखने के लिए तत्पर हैं, लेकिन वर्ष 2014 में लोकसभा चुनाव हुए तो अतिवादियों और कट्टरवादियों का एक अलग रंग दिखना शुरू हो गया। देश में हिंदू और अन्य समुदायों के लोगों के बीच एक स्पष्ट खाई दिखाई देने लगी है। सांप्रदायिक ताकतें हावी हो गयी हैं और जगह-जगह उत्पाती गतिविधियों को अंजाम दिया जाने लगा है। अतिवादियों, कट्टरपंथियों और सांप्रदायिक ताकतों को यह लगने लगा कि मोदी के प्रधानमंत्री बनने के साथ ही देश में हिंदुत्व की आंधी आ जायेगी और आधा देश अल्पसंख्यकों से खाली हो जायेगा। यह सोच उस देश में उभरकर सामने आयी, जिसकी लोकतांत्रिक प्रक्रिया दुनिया में सबसे बड़ी है। यहां पर सभी धर्म, संप्रदाय और जाति के लोगों के रहने, खाने, जीने और अभिव्यक्ति का समान अधिकार है।
सबसे बड़ी बात यह है कि ऐसा एकदम अचानक कुछ नहीं हुआ। ऐसा इसलिए भी हुआ, क्योंकि ऐसा करने के लिए किसी खास संगठन की ओर से एक मुहिम चलायी जा रही है। इसके लिए जगह-जगह टुकड़ियां नियुक्त की गयी हैं और लोगों को एक विशेष धारा की ओर मोड़ने का प्रयास किया जा रहा है। ऐसा सिर्फ यह साबित करने के लिए किया जा रहा है कि भारत सर्वधर्म-संप्रदाय का देश न होकर सिर्फ तथाकथित हिंदुओं का हिंदू राष्ट्र है। इस बीच देखा यह भी जा रहा है कि तीन-चार दशकों से देश की राजनीति लोगों के मन-मस्तिष्क पर पूरी तरह हावी हो गयी है। राजनेता अपनी सहूलियत के हिसाब से धर्मो, संप्रदायों और जातियों की व्याख्या कर रहे हैं और लोग उनके बहकावे में आकर आपा खो रहे हैं। इस बीच हमारा ‘वसुधैव कुटुंबकम्’ का सनातनी सिद्धांत पता नहीं कहीं खोया सा दिखायी दे रहा है। ऐसा महसूस हो रहा है, जैसे इन अतिवादियों, कट्टरपंथियों और सांप्रदायिक आततायियों के बीच इसकी आभा कहीं क्षीण होती जा रही है, जबकि उस समय भी जब हमारे देश में विदेशी आक्रमणकारियों ने हमला किया, यहां के लोगों पर अपना आधिपत्य जमाया या जमाने की कोशिश की, तभी यहां के निवासियों ने वसुधैव कुटुंबकम् के सिद्धांत का साथ नहीं छोड़ा। इसी का नतीजा रहा कि विदेशियों ने भी इस सनातनी सिद्धांत को माना और या तो वे यहीं के होकर रह गये या फिर इसकी असलियत को जानने के बाद यहां से कूच कर गये। मगर आजादी के 67 साल बाद आज जो कुछ देखने को मिल रहा है, वह न केवल इस लोकतांत्रिक देश के लिए हास्यास्पद है, बल्कि इस सनातनी सिद्धांत के लिए भी नुकसानदायक है।

बुधवार, 27 अगस्त 2014

अब नहीं रहेगी भाजपा में नेताओं की पहली पंक्ति

विश्वत सेन
भारत में जनसंघ से लेकर भारतीय जनता पार्टी के उत्थान तक देश के ये तीन कद्दावर नेता अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी पहली पंक्ति के नेता कहे जाते रहे। छह अप्रैल, 1980 को अस्तित्व में आने के बाद से पार्टी के उत्थान में इनकी भूमिका अहम रही है। समय की मांग और संघ के जोर के बाद आखिरश: इन्हें पार्टी की मुख्यधारा से हटाकर हाशिये पर ला दिया गया। मूलत: यह अमित शाह की अध्यक्षता में जो काम अभी हो रहा है, इसका बीजारोपण वर्ष 1999 के बाद से ही शुरू हो चुका था। उस समय भी कहा यह जा रहा था कि पार्टी में पहली पंक्ति के नेता दूसरी और तीसरी पंक्ति के नेताओं को पनपने नहीं दे रहे हैं और इसी का परिणाम है कि पार्टी के कार्यकर्ताओं में रोष है। पार्टी में वह काम नहीं हो रहा है, जो नये कार्यकर्ताओं के जोश के माध्यम से होना चाहिए। पार्टी के मुख्य पदों पर पहली पंक्ति के ही नेताओं से रसूख रखनेवालों को तवज्जो दी जा रही थी। अब जबकि पार्टी अध्यक्ष पद पर अमित शाह पदासीन हैं, तो उन्होंने संघ के फरमानों को सिर माथे पर बिठाते हुए पहली पंक्ति के नेताओं पूर्व प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी वाजपेयी, पूर्व उप प्रधानमंत्री लाल कृष्ण आडवाणी और पूर्व केंद्रीय मंत्री मुरली मनोहर जोशी को हाशिये पर लाकर पटक दिया।
दरअसल, वर्ष 1951 में डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के द्वारा जनसंघ से लेकर भारतीय जनता पार्टी के उदय तक इसकी पहली पंक्ति के नेताओं में डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी, दीनदयाल उपाध्याय, अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी और मुरली मनोहर जोशी सर्वमान्य रहे हैं। जनसंघ की स्थापना राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की राष्ट्रवादी विचारधारों को सत्ता के गलियारों तक पहुंचाने के लिए ही किया गया था। इसका मुख्य उद्देश्य राजनीतिक दल के रूप में देश की राजनीति में अपनी पैठ बनाना था। इसकी स्थापना के कुछ वर्ष डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी का आकस्मिक निधन के बाद इसे आगे बढ़ाने की जिम्मेदारी दीनदयाल उपाध्याय के कंधों पर आ गयी थी। जनसंघ के समय में भी मुखर्जी और उपाध्याय के बाद वाजपेयी, आडवाणी और जोशी का भी महत्वपूर्ण स्थान था। 1968 में जब पंडित दीनदयाल उपाध्याय की हत्या कर दी गयी, तो जनसंघ की बागडोर अटलजी को सौंप दी गयी और तब से लेकर भारतीय जनता पार्टी के गठन तक उसकी जिम्मेदारी उन्होंने बखूबी निभायी।
वर्ष 1980 के बाद से लेकर करीब डेढ़ दशकों के लंबे संघर्ष के बाद वर्ष 1996 में सत्ता में दखल देने के लायक भारतीय जनता पार्टी को सफलता मिली, तो इसकी पहली, दूसरी और तीसरी पंक्ति के नेताओं की खुशी का ठिकाना नहीं था। वर्ष 1996 में जब 13 दिन के लिए अटल जी की सरकार बनी, तो सभी सहमत थे, लेकिन वर्ष 1998 में दोबारा चुनाव होने के बाद पार्टी को सफलता मिलने और मजबूती के साथ सत्तासीन होने के बाद पार्टी की अंदरुनी स्थिति बिगड़ने लगी। यही वह समय था, जब दूसरी और तीसरी पंक्ति के नेताओं ने पहली पंक्ति के दो नेता अटल बिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी को हाशिये पर लाने की मुहिम छेड़ दी। इन्हीं नेताओं की भितरघाती रवैये का नतीजा रहा कि वर्ष 2004 के चुनाव में पार्टी को कई दलों के साथ गठबंधन के बावजूद हार का सामना करना पड़ा। हालांकि इस हार में पार्टी और राजग सरकार की नीतियां भी जिम्मेदार रही हैं, लेकिन मुख्य भूमिका भितरघातों की रही है। वर्ष 1998 से लेकर 20014 तक के अथक प्रयासों के बाद आखिरश: दूसरी और तीसरी पंक्ति के नेताओं को सफलता मिल ही गयी और उन्होंने संघ के साथ जुगलबंदी तथा भितरघातियों के साथ गोलबंदी करके इन तीनों नेताओं को पार्टी की मुख्यधारा से दरकिनार कर ही दिया।

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विश्वत सेन
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झारखंड
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