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सोमवार, 8 सितंबर 2014

नेताओं का कैंपस सलेक्शन

विश्वत सेन
‘कादिर मियां! यह भारत है. इक्कीसवीं सदी का भारत. दुनिया की नजरों में आज का भारत सिर्फ एक मंडी भर है. यहां पूरे संसाद के कारोबारी सूई से लेकर हवाई जहाज तक बेचने आते हैं. इसीलिए आप देखते हैं कि किसी वस्तु का अनुसंधान अमेरिका में होता है, निर्माण यूरोपीय देश करते हैं और बिक्री के लिए सबसे पहले उसकी लॉन्चिंग भारत में की जाती है. उदारवादी अर्थव्यवस्था में हमारा देश सिर्फ और सिर्फ एक बड़ा बाजार है, क्योंकि यहां के दिखावापसंद लोगों के पास क्रयशक्ति अधिक है. गरीब से गरीब आदमी भूखा मरता रहेगा, फिर भी दो आने का जुगाड़ होते ही वह सीधा बाजार की ओर भागता है. यह हम ही नहीं, अंगरेज भी कहा करते थे.’ भूपाल बाबू पार्टी के दफ्तर में कार्यकताओं की मीटिंग में प्रदेश प्रमुख को ‘क्रांति के डॉ डैंग’ की तरह संबोधित कर रहे थे. वे रुके नहीं, अपने ही रौ में बोल रहे थे-‘आज जब हम इक्कीसवीं सदी के भारत की बात करते हैं, तो हमारे पास आउटसोर्सिग और कैंपस सलेक्शन के अलावा बचा ही क्या है? हम वैज्ञानिक, आइआइटियन, इंजीनियर, डॉक्टर, डाटा एंट्री ऑपरेटर, कंप्यूटर ऑपरेटर, छात्र, शिक्षक, नेता, अभिनेता, चोरद्व डाकू, पत्रकार, पैंतराकार, झाड़-पोंछा लगाने वाली दाई, नर्स, अंडरवर्ल्ड डॉन, पंडित, मुल्ला, मुख्तार सबकी आउटसोर्सिग ही तो करते हैं. इन्हें भारत में पाल-पोस कर, पढ़ा-लिखा कर व्यावसायिक कोर्स कराते हैं और मल्टीनेशनल कंपनियों के माध्यम से मोटे सालाना पैकेज पर कैंपस सलेक्शन करके झट बाहर भेज देते हैं. हर क्षेत्र में ट्रेनिंग देने के स्कूल और कॉलेज खुले हुए हैं. हमारी राजनीति का भी ट्रेनिंग स्कूल और इंस्टीट्यूट है.’ भूपाल बाबू अब भी टेप रिकॉर्डर की तरह बोले जा रहे थे. बोल रहे थे-‘पहले हमारा विद्यार्थी कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में संचालित छात्र राजनीति संगठनों में दाखिला लेकर ट्रेनिंग लेता था, लेकिन बदले जमाने के अनुसार अब हम भी मल्टीनेशनल कंपनियों की तरह डाइरेक्ट कैंपस सलेक्शन करना शुरू कर दिये हैं. जो लड़का चोर है, झूठा है, फरेबी और धोखेबाज है, चाकू व गोली-बारूद चलाता हो या चलवाता हो, दंगा करता हो या करवाता हो ऐसे लड़कों को हम मोटे दैनिक पैकेज पर कैंपस सलेक्शन करते हैं. वहीं, जो लड़की या महिलाएं पति, सास, मां-बाप, भाई-बंधु, समाज विरोधी हो, बेवजह सीधे-सादे या फिर मनचलों को अपनी जाल में फांसती हो और फिर उस पर कानून का सहारा लेते हुए यौन शोषण का आरोप लगवाती हो, जेल भिजवाती हो, नश्तर चलाती है, नैन मटकाती हो, वह हमारी परीक्षा में फस्र्ट डिविजनर है. उसे भी हम दैनिक मोटे पैकेज पर सलेक्ट करते हैं. हम जानते हैं कि इस तरह के बालक-बालिकाएं, पुरुष महिलाएं अव्वल दज्रे का नेता हो सकते हैं. कादिर मियां, ऐसे लोगों को हम पार्टी में ऊंचे ओहदे पर बिठाने के साथ राजसी ठाट-बाट भी उपलब्ध कराते हैं.’
भूपाल बाबू ने प्रदेश प्रमुख कादिर मियां को आदेशी लहजे में कहा-‘हमने मंगरू की बेटी के बारे में चर्चाएं खूब सुनी है. जाइए उसका कैंपस सलेक्शन करके ले आइए. उसे पार्टी में ऊंचा ओहदा देने के साथ ही राजसी ठाट-बाट भी उपलब्ध करायेंगे. वोट में जीत हासिल करनी है, तो मंगरू की बेटी को युवाओं को लुभाने के लिए सलेक्ट करना जरूरी है.’
आधे घंटे के लेक्चर के बाद भूपाल बाबू के इस आदेश पर कादिर मियां ने ऐतराज जाहिर किया. कहा-‘लेकिन साहब, यदि हम मंगरू की बेटी को सलेक्ट कर लेते हैं, तो नीचे और ऊपर के नेताओं में हड़कंप मच जायेगा. पहले उन दोनों से विचार तो कर लेते. फिर साह-पुरैनी भी नाराज हो जायेंगे.’
कादिर मियां की यह बात मानों भूपाल बाबू को बचकानी लगी. उन्होंने कहा-‘निरा मूर्ख हो. यदि मैंने उसे सलेक्ट करने के लिए कहा, तो समझो सभी शक्तियां मेरे आदेश में ही छिपी हैं. जाओ, मौका मत गंवाओ और मंगरू को सूचना दे दो कि उसकी बेटी का राजनीति में कैंपस सलेक्शन हो गया है. उसे मोटी रकम के साथ पूरे शानो-शौकत से रहने-सहने की व्यवस्था कर दी जायेगी.’
इसी बीच कादिर मियां कार्यकताओं की ओर देख कर बोले-‘क्यों भाइयों, आपलोगों को यह प्रस्ताव मंजूर है?’ उनके यह बात कहते ही मानों रटंतू तोतों ने एक साथ कहा-‘हां जी, हमें पसंद है. हमें हमारा नया नेता मिल जायेगा, इससे अच्छी बात और क्या हो सकती है.’
सितंबर, 08, 2014

रविवार, 31 अगस्त 2014

...तो क्या क्षीण हो रही है ‘वसुधैव कुटुंबकम्’ की आभा?

विश्वत सेन
हमारा देश भारत प्राचीन काल से ही पूरी सृष्टि और प्रकृति का सहचर रहा है। यही कारण है कि हमारे पुराणों और धार्मिक ग्रंथों में कथा-कहानियों और दंतकथाओं के माध्यम से प्रकृति की महत्ता को बनाये रखने की कोशिश की गयी है। वेदों और धार्मिक ग्रंथों में एक मौलिक लेकिन सार्वग्राही सिद्धांत ‘वसुधैव कुटुंबकम्’ का प्रतिपादन किया गया। इस सिद्धांत का अर्थ यह हुआ कि भारत में रहने वाले मनुष्य ही नहीं, बल्कि इस पृथ्वी के चराचर वाशिंदे हमारे कुटुंब यानी रिश्तेदार हैं। यही कारण है कि हमारे धार्मिक ग्रंथों में जानवरों, वृक्षों, पौधों, पर्वतों, नदियों और सरोवरों को पवित्र मानकर पूजनीय कहा गया है। अगर हम इसके धार्मिक पहलू को छोड़ भी दें, तो इसका एक बहुत बड़ा वैज्ञानिक पहलू भी है। एक साधारण सा उदाहरण है कि यदि हम इस देश का वासी या फिर तथाकथित हिूंद होने के नाते गाय या फिर तुलसी, पीपल, वटवृक्ष आदि की पूजा करते हैं, तो इसके पीछे धार्मिक आस्था तो जुड़ी हुई तो है ही, मगर इसके पीछे एक बहुत बड़ा वैज्ञानिक तथ्य भी छुपा हुआ है। यदि हम तुलसी के पौधे को अपने घरों के आंगन, छत, कॉरिडोर आदि में गमले में सजाकर पूजा करते हैं, तो तुलसी का यह पौधा हमें कई रोगों से मुक्ति दिलाता है। यदि किसी को खांसी हो गयी हो, तो तुलसी के पत्ताें के साथ कालीमिर्च मिलाकर काढ़ा बनाकर पीने से नजला-जुकाम समाप्त हो जाता है। दूसरा कोई किसान या परिवार अपने घर में गाय का पालन करता है, तो उससे भी उसे कई फायदे मिलते हैं। पहला तो यह कि इसका दूध अमृत के समान होता है, दूसरा यह कि उसका मूत्र और गोबर भी मनुष्य के शरीर और पर्यावरण के लिए अधिक उपयोगी होता है। गाय के गोबर से घर लीपने के बाद उसके आसपास के वातावरण में व्याप्त सारे कीटाणु समाप्त हो जाते हैं, तो ईंधन के रूप में कंडे (गोइठा) के इस्तेमाल से मच्छरों का प्रकोप कम हो जाता है। तीसरा, पीपल का पेड़ भी हमारे लिए अधिक उपयोगी है। इसका धार्मिक पहलू तो है ही, साथ ही इसका वैज्ञानिक पहलू यह भी है कि इसके पत्ताें में ऑक्सीजन के उत्सजर्न और कार्बनडाइऑक्साइड के अवग्रहण की क्षमता अधिक होती है। इसीलिए पीपल का पेड़ हमारे लिए अधिक महत्वपूर्ण है। आंवला को तो सभी जानते हैं। अक्षय तृतीया के दिन हम आंवले का भी पूजन करते हैं। आंवला एक ऐसा वनस्पति है, जो शरीर के पाचनतंत्र और आंखों की दृष्टि को मजबूत करने के साथ ही शक्तिवर्धक भी है। यह तो रही वनस्पतियों की बात। इससे इतर यदि हम विषैले जंतुओं के वैज्ञानिक पहलुओं की बात करें, तो ब्लैक कोबरा और बिच्छू के जहर से कई तरह की जीवनरक्षक दवाओं का निर्माण किया जाता है। इसीलिए वैदिककालीन मनीषियों ने ‘वसुधैव कुटुंबकम्’ के सनातनी सिद्धांत का प्रतिपादन किया।
बदलते समय के अनुसार इस सनातनी सिद्धांत पर रूढ़िवादियों का दबदबा कायम होता गया और वैज्ञानिक पहलुओं को धर्म, आस्था और भावनाओं के साथ जोड़ दिया गया। ज्यादा अतीत के झारोखे में ताकने की दरकरार नहीं है। आजादी के पहले अमेरिका में भारत की ओर से प्रतिनिधित्व करते हुए जब विवेकानंद ने हिंदी में भाषण दिया था, तब भी वसुधैव कुटुंबकम् के सिद्धांत को ध्यान में रखा गया था। आजादी के बाद जब पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने संयुक्त राष्ट्र संघ में हिंदी में भाषण दिया, तब भी उसकी अहमियत को कुछ हद तक बरकरार रखने के लायक समझा गया। तब तक यह माना जाता रहा कि भारत में अब भी लोग इस सनातनी सिद्धांत को अक्षुण्ण और अखंड बनाये रखने के लिए तत्पर हैं, लेकिन वर्ष 2014 में लोकसभा चुनाव हुए तो अतिवादियों और कट्टरवादियों का एक अलग रंग दिखना शुरू हो गया। देश में हिंदू और अन्य समुदायों के लोगों के बीच एक स्पष्ट खाई दिखाई देने लगी है। सांप्रदायिक ताकतें हावी हो गयी हैं और जगह-जगह उत्पाती गतिविधियों को अंजाम दिया जाने लगा है। अतिवादियों, कट्टरपंथियों और सांप्रदायिक ताकतों को यह लगने लगा कि मोदी के प्रधानमंत्री बनने के साथ ही देश में हिंदुत्व की आंधी आ जायेगी और आधा देश अल्पसंख्यकों से खाली हो जायेगा। यह सोच उस देश में उभरकर सामने आयी, जिसकी लोकतांत्रिक प्रक्रिया दुनिया में सबसे बड़ी है। यहां पर सभी धर्म, संप्रदाय और जाति के लोगों के रहने, खाने, जीने और अभिव्यक्ति का समान अधिकार है।
सबसे बड़ी बात यह है कि ऐसा एकदम अचानक कुछ नहीं हुआ। ऐसा इसलिए भी हुआ, क्योंकि ऐसा करने के लिए किसी खास संगठन की ओर से एक मुहिम चलायी जा रही है। इसके लिए जगह-जगह टुकड़ियां नियुक्त की गयी हैं और लोगों को एक विशेष धारा की ओर मोड़ने का प्रयास किया जा रहा है। ऐसा सिर्फ यह साबित करने के लिए किया जा रहा है कि भारत सर्वधर्म-संप्रदाय का देश न होकर सिर्फ तथाकथित हिंदुओं का हिंदू राष्ट्र है। इस बीच देखा यह भी जा रहा है कि तीन-चार दशकों से देश की राजनीति लोगों के मन-मस्तिष्क पर पूरी तरह हावी हो गयी है। राजनेता अपनी सहूलियत के हिसाब से धर्मो, संप्रदायों और जातियों की व्याख्या कर रहे हैं और लोग उनके बहकावे में आकर आपा खो रहे हैं। इस बीच हमारा ‘वसुधैव कुटुंबकम्’ का सनातनी सिद्धांत पता नहीं कहीं खोया सा दिखायी दे रहा है। ऐसा महसूस हो रहा है, जैसे इन अतिवादियों, कट्टरपंथियों और सांप्रदायिक आततायियों के बीच इसकी आभा कहीं क्षीण होती जा रही है, जबकि उस समय भी जब हमारे देश में विदेशी आक्रमणकारियों ने हमला किया, यहां के लोगों पर अपना आधिपत्य जमाया या जमाने की कोशिश की, तभी यहां के निवासियों ने वसुधैव कुटुंबकम् के सिद्धांत का साथ नहीं छोड़ा। इसी का नतीजा रहा कि विदेशियों ने भी इस सनातनी सिद्धांत को माना और या तो वे यहीं के होकर रह गये या फिर इसकी असलियत को जानने के बाद यहां से कूच कर गये। मगर आजादी के 67 साल बाद आज जो कुछ देखने को मिल रहा है, वह न केवल इस लोकतांत्रिक देश के लिए हास्यास्पद है, बल्कि इस सनातनी सिद्धांत के लिए भी नुकसानदायक है।

बुधवार, 27 अगस्त 2014

अब नहीं रहेगी भाजपा में नेताओं की पहली पंक्ति

विश्वत सेन
भारत में जनसंघ से लेकर भारतीय जनता पार्टी के उत्थान तक देश के ये तीन कद्दावर नेता अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी पहली पंक्ति के नेता कहे जाते रहे। छह अप्रैल, 1980 को अस्तित्व में आने के बाद से पार्टी के उत्थान में इनकी भूमिका अहम रही है। समय की मांग और संघ के जोर के बाद आखिरश: इन्हें पार्टी की मुख्यधारा से हटाकर हाशिये पर ला दिया गया। मूलत: यह अमित शाह की अध्यक्षता में जो काम अभी हो रहा है, इसका बीजारोपण वर्ष 1999 के बाद से ही शुरू हो चुका था। उस समय भी कहा यह जा रहा था कि पार्टी में पहली पंक्ति के नेता दूसरी और तीसरी पंक्ति के नेताओं को पनपने नहीं दे रहे हैं और इसी का परिणाम है कि पार्टी के कार्यकर्ताओं में रोष है। पार्टी में वह काम नहीं हो रहा है, जो नये कार्यकर्ताओं के जोश के माध्यम से होना चाहिए। पार्टी के मुख्य पदों पर पहली पंक्ति के ही नेताओं से रसूख रखनेवालों को तवज्जो दी जा रही थी। अब जबकि पार्टी अध्यक्ष पद पर अमित शाह पदासीन हैं, तो उन्होंने संघ के फरमानों को सिर माथे पर बिठाते हुए पहली पंक्ति के नेताओं पूर्व प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी वाजपेयी, पूर्व उप प्रधानमंत्री लाल कृष्ण आडवाणी और पूर्व केंद्रीय मंत्री मुरली मनोहर जोशी को हाशिये पर लाकर पटक दिया।
दरअसल, वर्ष 1951 में डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के द्वारा जनसंघ से लेकर भारतीय जनता पार्टी के उदय तक इसकी पहली पंक्ति के नेताओं में डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी, दीनदयाल उपाध्याय, अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी और मुरली मनोहर जोशी सर्वमान्य रहे हैं। जनसंघ की स्थापना राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की राष्ट्रवादी विचारधारों को सत्ता के गलियारों तक पहुंचाने के लिए ही किया गया था। इसका मुख्य उद्देश्य राजनीतिक दल के रूप में देश की राजनीति में अपनी पैठ बनाना था। इसकी स्थापना के कुछ वर्ष डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी का आकस्मिक निधन के बाद इसे आगे बढ़ाने की जिम्मेदारी दीनदयाल उपाध्याय के कंधों पर आ गयी थी। जनसंघ के समय में भी मुखर्जी और उपाध्याय के बाद वाजपेयी, आडवाणी और जोशी का भी महत्वपूर्ण स्थान था। 1968 में जब पंडित दीनदयाल उपाध्याय की हत्या कर दी गयी, तो जनसंघ की बागडोर अटलजी को सौंप दी गयी और तब से लेकर भारतीय जनता पार्टी के गठन तक उसकी जिम्मेदारी उन्होंने बखूबी निभायी।
वर्ष 1980 के बाद से लेकर करीब डेढ़ दशकों के लंबे संघर्ष के बाद वर्ष 1996 में सत्ता में दखल देने के लायक भारतीय जनता पार्टी को सफलता मिली, तो इसकी पहली, दूसरी और तीसरी पंक्ति के नेताओं की खुशी का ठिकाना नहीं था। वर्ष 1996 में जब 13 दिन के लिए अटल जी की सरकार बनी, तो सभी सहमत थे, लेकिन वर्ष 1998 में दोबारा चुनाव होने के बाद पार्टी को सफलता मिलने और मजबूती के साथ सत्तासीन होने के बाद पार्टी की अंदरुनी स्थिति बिगड़ने लगी। यही वह समय था, जब दूसरी और तीसरी पंक्ति के नेताओं ने पहली पंक्ति के दो नेता अटल बिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी को हाशिये पर लाने की मुहिम छेड़ दी। इन्हीं नेताओं की भितरघाती रवैये का नतीजा रहा कि वर्ष 2004 के चुनाव में पार्टी को कई दलों के साथ गठबंधन के बावजूद हार का सामना करना पड़ा। हालांकि इस हार में पार्टी और राजग सरकार की नीतियां भी जिम्मेदार रही हैं, लेकिन मुख्य भूमिका भितरघातों की रही है। वर्ष 1998 से लेकर 20014 तक के अथक प्रयासों के बाद आखिरश: दूसरी और तीसरी पंक्ति के नेताओं को सफलता मिल ही गयी और उन्होंने संघ के साथ जुगलबंदी तथा भितरघातियों के साथ गोलबंदी करके इन तीनों नेताओं को पार्टी की मुख्यधारा से दरकिनार कर ही दिया।

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विश्वत सेन
ग्राम-पोस्ट : हंटरगंज
जिला : चतरा
झारखंड
पिन: 825420
संपर्क:- 09771168671, 09199527273

रविवार, 15 जून 2014

एक अलग अर्थव्यवस्था का मालिक बन जायेगा तालिबान

-अवैध कारोबार की नकदी से तालिबानी नेता खुश
-दुनिया के देशों को संयुक्त राष्ट्र संघ ने दी चेतावनी

विश्वत सेन
नशीले पदार्थो की ब्रिकी, अपहरण और फिरौती वसूली आदि गैर-कानूनी धंधे से कोष एकत्र कर दुनिया में आतंक की पौध उगानेवाला आतंकी संगठन आर्थिक स्तर पर मजबूत होता जा रहा है. अफगानिस्तान में खुद के कोष को मजबूती प्रदान करनेवाले आतंकी संगठन तालिबान की कार्यप्रणाली और उसकी आर्थिक मजबूती को लेकर संयुक्त राष्ट्र संघ की पेशानी पर भी चिंता की लकीरें दिखाई दे रही हैं. संयुक्त राष्ट्र संघ ने दुनिया के देशों को चेतावनी देते हुए कहा है कि जिस तरह से तालिबान वित्तीय मामले में विकास करता जा रहा है, उससे तो यही लगता है कि आनेवाले दिनों में वह  एक अलग अर्थव्यवस्था का मालिक बन जायेगा. स्थानीय सरकार के साथ सौदेबाजी करने की स्थिति में होगा.
मीडिया में आ रही खबरों के अनुसार, संयुक्त राष्ट्र संघ की प्रतिबंधों पर निगरानी रखनेवाली टीम ने अपने अध्ययन में यह पाया है कि अफगानिस्तान के हेलमंड में की जा रही अफीम की खेती उसके राजस्व जुटाने का सबसे बड़ा साधन है. इस साल अफगानिस्तान के हेलमंड में अफगानिस्तान की खेती बढ़ने के साथ ही ड्रग स्मगलरों द्वारा किये जा रहे इसके अवैध कारोबार में भी इजाफा हुआ है. संयुक्त राष्ट्र की निगरानी टीम ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि वहां के ड्रग स्मगलर अफगानिस्तान में अफीम की खेती करनेवाले किसानों को बकायदा कर्ज भी मुहैया कराते हैं. इसके बदले में किसानों को कर्ज की ब्याज समेत अदायगी करने के साथ ही तालिबान के खाते में 10 फीसदी टैक्स भी जमा करना पड़ता है.
संयुक्त राष्ट्र संघ की प्रतिबंधों पर निगरानी रखनेवाली टीम के अधिकारियों ने बताया कि इस साल अफगानिस्तान में अफीम की खेती और इसके कारोबार से कम से कम 50 मिलियन डॉलर (दो अरब 98 करोड़ रुपये से अधिक) की आमदनी हुई है.  नशीले पदार्थो के कारोबार के अलावा तालिबान आतंकवादी संगठन हेलमंड में अवैध तरीके से गोमेद पत्थरों का अवैध खनन से सालाना करीब 10 मिलियन डॉलर (59 करोड़ 68 लाख रुपये से अधिक) की कमाई करता है.  इसके अतिरिक्त इन काले कारोबारों को सुरक्षित व संरक्षित करने के लिए बाकायदा परिवहन और विनिर्माण का भी कारोबार भी करता है. रिपोर्ट में यह बात कही गयी है कि आमदनी का 80 फीसदी हिस्सा पाकिस्तान में बैठे संगठन के नेताओं के पास भेजा जाता है. तालिबान के सेंट्रल फाइनेंशियल कमीशन को मुल्ला अल आगा इशाक्जई संचालित करता है. वही अफगानिस्तान के फील्ड यूनिट और पाकिस्तान में फैले ग्रुप के दूसरे सदस्यों के बीच फंड भेजने का काम करता है. 

बुधवार, 7 मई 2014

सुख के दिन न आये रे भैया, विपद के दिन आयो रे

विश्वत सेन

भारत की आधुनिक पत्रकारिता की एक बड़ी विडंबना है। देश में उदारवादी आर्थिक नीतियों के कारण अखबारों और मीडिया घरों की आमदनी बढ़ने के साथ ही संपादकों और प्रबंधन के लोगों की आय में बढ़ोतरी तो हुई, लेकिन निचले स्तर के पत्रकार और अन्य कर्मचारियों को अब भी औने-पौने वेतन पर ही काम करना पड़ रहा है। देश की सरकार ही नहीं, बल्कि मीडिया घराना भी अब बिना अदालती डंडा बरसाये अपने कर्मचारियों को आर्थिक लाभ देना नहीं चाहते। नौबत यहां तक पहुंच गयी है कि श्रमिक पत्रकारों की वेतन बढ़ोतरी के अदालती आदेश आने के बाद भी अखबारों के मालिक और मीडिया घराना अवमानना करने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे हैं। 

देश के लाखों पत्रकारों की माली हालत सुधारने के लिए जीएस मजीठिया की अध्यक्षता में गठित आयोग ने वर्ष 2011 में सरकार से सिफारिश की। मजीठिया आयोग की सिफारिश के आधार पर सरकार ने अधिसूचना जारी कर दी। इस अधिसूचना के विरोध में देश के बड़े मीडिया घरानों ने सुप्रीम कोर्ट की शरण गही. सुप्रीम कोर्ट ने इन मीडिया घरानों को फटकारते हुए अप्रैल के अंत तक मजीठिया आयोग की सिफारिशों के आधार पर अखबारों में वेजबोर्ड गठित कर वेतन बढ़ोतरी और 2011 से एरियर का लाभ देने की हिदायत दी। 

अदालत की ओर से कहा यह गया था कि सात मई, 2014 तक देश के अखबारों की ओर से पत्रकारों के खातों में बढ़े हुए वेतन के साथ एरियर की पहली भेज देनी चाहिए। आज सात मई समाप्त होने को है, मगर देश के अखबारों में टाइम्स ऑफ इंडिया, नवभारत टाइम्स, अमर उजाला, द हिंदू, आनंद बाजार पत्रिका आदि को छोड़ कर बाकी हिंदुस्तान, दैनिक जागरण, दैनिक भास्कर, राष्ट्रीय सहारा, रांची एक्सप्रेस, प्रभात खबर, राजस्थान पत्रिका, आज, देश बंधु, चौथी दुनिया, महानगर टाइटम्स, नवभारत, दबंग दुनिया सहित कई छोटे-बड़े अखबारों ने न तो वेजबोर्ड का गठन किया और न ही पत्रकारों और अपने कर्मचारियों को बढ़ा हुआ वेतन ही दिया। स्थिति यह है कि कई अखबारों ने तो अपने कर्मचारियों को अप्रैल महीने में मिलने वाला इन्क्रीमेंट भी नहीं दिया है। 

वहीं दूसरी ओर, जिन अखबारों ने तथाकथित तौर पर मजीठिया आयोग की सिफारिशों के आधार पर लाभ देने का ऐलान किया है, उनमें से ज्यादातर लोगों ने अप्रैल माह के इन्क्रीमेंट को ही मजीठिया का लाभ बता दिया है। नवभारत टाइम्स में तो कॉन्ट्रैक्चुअल पत्रकारों को मजीठिया की श्रेणी में भी शामिल नहीं किया गया है। 

यह पहला मौका नहीं है, जब देश के पत्रकारों के वेतन तय करने के लिए सरकार की ओर से आयोग का गठन किया गया है। मजीठिया आयोग के पहले देश की सरकारों ने पत्रकारों के वेतन तय करने के लिए पालेकर आयोग, बछावत आयोग, मणिसाणा आयोग का भी गठन किया था। इसके पहले वर्किग जर्नलिस्ट एक्ट-1955 बनाया गया और इससे भी पहले औद्योगिक विकस अधिनियम संसद से पास किया गया। 

गौर करने वाली बात यह भी है कि जब-जब सरकार की ओर से पत्रकारों का वेतन तय करने के लिए आयोग का गठन किया गया, देश के अखबारों के मालिकों और उसके नीति-निर्धारक तत्वों ने ऐतराज जाहिर किया।यहां तक कि ज्यादातर अखबारों के मालिकों ने सरकारी और अदालती आदेशों की नाफरमानी ही की। हां, यह बात दीगर है कि अखबारों के मालिकों को अपने संपादकों और प्रबंधकों को लाखों रुपये वेतन देने में ऐतराज नहीं है। वहीं, जब निचले स्तर के कर्मचारियों के वेतन में वृद्धि की बात आती है, तो उनकी मरी हुई नानी दोबारा मर जाती है। 

यह जानकर हैरानी होती है कि देश के कई अखबारों के संपादकों की तनख्वाह हजारों में नहीं, बल्कि लाखों में है। उनके सुख-सुविधा पर कंपनी की ओर से भारी-भरकम रकम खर्च की जाती है, वो अलग से। जितनी तख्वाह एक संपादक को दी जाती है, उतने में कम से कम 50 से भी ज्यादा निचले स्तर के कर्मचारी 25-50 हजार मासिक वेतन के आधार पर रखे जा सकते हैं।

दूसरी बात यह भी है कि अखबारों के मालिकों को निचले स्तर के पत्रकारों और कर्मचारियों को वेतन बढ़ाने में तब दिक्कत हो रही है, जबकि उन्हें कागज कोटे में रियायती दरों पर मिलता है। छपाई के लिए स्याही से लेकर प्रिंटर तक कोटा ही कोटा है। यहां तक कि सरकार की ओर से विज्ञापन भी कोर्ट में भरपूर दिया जाता है। फिर भी अखबारों के मालिकों को उसका लाभांश अपने कर्मचारियों में वितरित करने में हिचक हो रही है। 

इससे बड़ी बात और क्या हो सकती है कि अपनी ही बिरादरी का आदमी, जो कभी रिपोर्टर, उप संपादक और समाचार संपादक था, आज संपादक बनने के बाद अपने ही लोगों का खून चूसने के लिए तरह-तरह का तिलिस्म रचता है। इसे संपादकों और मालिकों की सामंती सोच नहीं कहेंगे, तो और कया कहेंगे। 

विडंबना यह भी है कि जब देश में महिलाएं दलित, अल्पसंख्यक और अन्य दूसरे समुदाय के लोग समस्याग्रस्त होते हैं, तब यहां की राजनेता अपनी राजनीति चमकाने लगते हैं। आज देश का चौथा स्तंभ और देश-समाज के लोगों की समस्याओं को सरकारों के सामने उजागर करने वाले ही वर्षो से समस्याग्रस्त हैं। फिर देश का कोई राजनेता अथवा संस्था, यहां तक कि खुद पत्रकारों की हितैषिणी संस्थाएं उनका साथ देने को तैयार नहीं है। इससे बड़ी बात और क्या हो सकती है कि पत्रकारों की सबसे बड़ी संस्था प्रेस क्लब ऑफ इंडिया भी देश के श्रमिक पत्रकारों को मजीठिया का लाभ दिलाने की दिशा में कोई ठोस कदम नहीं उठा रहा है। 

मंगलवार, 29 अप्रैल 2014

यह तप की या तपिश की है लाली

विश्वत सेन

हमरे बदरू मियां एक फूल की टहाटह लाली को देखकर काफी बेचैन हैं। उनका पेट गुड़गुड़ा रहा है, अपच हो रहा है और वाक्यबमन तक की स्थिति बन गयी है. लेकिन वह इस टहाटह लाली की बात कहें, तो किससे? यह एक बहुत बड़ा सवाल था। अली भाई विदेश गमन पर थे, हरिया, होरी और कमली अपने-अपने कामों में व्यस्त थे और नरहरी कहीं दिखाई नहीं दे रहे थे। स्वभाव से बदरू मियां पुरातन युग के देवताओं के संवदरिया नारद मुनि के अनुयायी, सृष्टि के पहले टंकक और सभी देवताओं में सबसे आगे पूजे जाने वाले भगवान श्री गणोश और विद्या की अधिष्ठात्री देवी मां शारदे के साधक रहे हैं। नारद मुनि के अनुयायी होने के नाते उनके पटे में औरतों की तरह बात पचती नहीं है और यही गुणावगुण उन्हें परेशान किये हुए है।

कई दिनों के इंतजार के बाद अली भाई की स्वदेश वापसी हुई। जैसे ही उन पर बदरू मियां की नजर पड़ी, भूखे भेड़िये की तरह बदरू मियां उन पर झपट पड़े। अली भाई को देखते ही चिल्लाने लगे-‘अरे, भइवा हो, भइवा। एतना दिन कहां रहे। न कोई संदेश, न कोई खोज खबर।’

अली भाई चूंकि बदरू मियां के पैजामी यार थे, इसलिए वे फटाक से समझ गये कि वे क्यों हाल-चाल पूछ रहे हैं। उन्होंने कहा-‘पेट गुड़गुड़ा रहा है क्या?’ बदरू-‘अरे भई, तुम भी पक्के लाल बुझक्कड़ ही हो।’ उन्होंने आगे कहा-‘भाई का बतायें। इस गर्मी में हमने टहाटह लाल आठ पंखुड़ियों वाले खिले हुए एक फूल को देखा है।’
अली भाई-‘तो! इसमें आश्चर्य की कौन सी बात हो गयी? हमरे यहां तो किसिम-किसिम के फूल हर मौसम में खिलते ही रहते हैं।’

बदरू-‘अरे भाई, तुम निरा निठल्ले के निठल्ले ही रहोगे। हम जिस फूल की बात कर रहे हैं, वह गर्मी के मौसम में खिला है। जबकि आम तौर पर गर्मी के मौसम में धूप की तपिश से पृथ्वी की हरियाली झुलस जाती है। फिर यह टहाटह लाल फूल कहां से आया?’ उन्होंने आगे कहा-‘भाई, सोचने वाली बात यह नहीं है कि वह गर्मी के दिन में खिला है। सवाल यह है कि उसकी यह लाली किसी तप की लाली है, धूप से निकली तपिश की लाली है या फिर प्राकृतिक लाली है?’
बदरू मियां की यह बात सुनकर अली भाई का दिमाग चकराया। उन्होंने झल्लाते हुए कहा-‘मियां, तुम हिंदी की छायावादी विधा में वास्तविक बात को छिपाकर व्यंजना में बात करना बंद करो। जो भी कहना है साफ-साफ कहो।’

बात की गाड़ी पटरी से उतरते देख बदरू मियां ने पाला बदला। बॉलीवुड के अभिनेता जीवन के कुटिल अदा वाले अंदाज में उन्होंने समझाते हुए कहा-‘देखो भाई, इस समय चुनाव के साथ ही गर्मी का भी मौसम है। इस मौसम में पूरे देश में एक ही फूल टहाटह लाल है। इस लाली में उसकी तप की, प्रकृति की, धूपिया तपिश या फिर किसी तीसरी शक्ति की लाली समायी हुई है।’

अली भाई उनके कथनों के निहितार्थ को समझ गये। उन्होंने समझाते हुए लहजे में कहा-‘बदरू मियां, वस्तुत: इसमें आपने जितने प्रकार की लाली की बात कही, उन सभी का इसमें सम्मिश्रण है।’ उन्होंने कहा-‘इस प्रतीकात्मक फूल की लाली को बरकरार रखने, राजयोगी कुंडली बनाने और राजपद प्रदान कराने के लिए कई सालों से तप कोई और कर रहा है। तप करने वालों की मंडली में लाखों लोग शामिल हैं और उनके तप का यशबल इसे लगातार प्राप्त हो रहा है। इसलिए यह खुद के नहीं, दूसरे के तप बल से लाल है।’

अली भाई अपनी बात जारी रखते हुए बोले-‘इसे हम दूसरे शब्दों में उधारी तप की लाली भी कह सकते हैं। मान लीजिए कि पुराने जमाने में हमारे यहां ऋषि-मुनि अपने शिष्यों के साथ वनों में आश्रम बनाकर तप करते और करवाते थे। इसके साथ ही, अपने शिष्यों को गार्हस्थ जीवन से लेकर सृष्टि के तमाम नियम-कानूनों का अध्ययन भी कराते थे। वैसे ही कलियुग में एक संस्था है, जो ऋषि-मुनियों सरीखा ब्रह्मज्ञान रखने वाला तप कर रहा है और उसके शिष्य अविवाहित रहते हुए राजमार्ग पर आगे बढ़ जाते हैं।’

बीच में टोकते हुए बदरू मियां ने कहा-‘यह बात तो ठीक है और हम समझ भी गये। लेकिन और दूसरी लाली?’

इस सवाल के जवाब में अली भाई ने कहा-‘देश-दुनिया में रहने के कारण प्राकृतिक रंग तो उसमें होगा ही और धूप की तपिश भी उसके ऊपर पड़ना तय है। इसलिए यह दोनों प्रकार की लाली भी संभव है। लेकिन एक बात और जान लो। तुम जिस लाली की बात कर रहे हो, वह बल का प्रतीक है और राजपद सिर्फ बल से ही प्राप्त नहीं होता। इसके लिए हरियाली, प्रगति, विकास, सच्चई, बल, कल और छल की भी दरकार होती है। इसीलिए बारंबार प्रयास करने के बाद भी इस फूल को लाली प्रदान करने वाले और उसके दूसरे धड़े को सालों से राजपद नहीं मिल पा रहा है। इसकी वजह यह है कि जो तप कर रहा है, उसने राजपद पाने के लिए एक दूसरा धड़ा भी तैयार किया है, जो उसका राजनीतिक मुखौटा है। तपी और मुखौटा दोनों राजनीति के बाकी अंगों को छोड़कर सिर्फ बलवती विधा को ही अपना रहे हैं। देश को अक्षुण्ण और अखंड बनाने के नाम पर देश को खंडित करने का काम कर रहे हैं। तपी जो दिशा-निर्देश जारी करता है, मुखौटा उसका अनुपालन नहीं करता है और सबसे अहम बात यह कि तपी भी वहमी और अहमी है। वह भी बल का पुजारी है। वह भी भारत के वसुधैव कुटुंबकम के सिद्धांत को तोड़कर किसी संप्रदाय और धर्म विशेष को लेकर ही चल रहा है। इसलिए उसे राजपद पाने में सफलता नहीं मिल रही है। हालांकि गलती से एक बार कुछ सालों के राज सिंहासन पर आरूढ़ हुआ था, लेकिन सत्ता पर आसीन होते ही तपी और मुखौटे में घमंड आ गया। इसलिए उसे लोगों ने पसंद करना ही छोड़ दिया।’

अली भाई का भाषण सुनने के बाद बदरू मियां ने एक अच्छे शिष्य की तरह सवाल किया। बोले-‘तो फूल को राजपद कैसे मिलेगा?’

अली भाई बोले-‘तपी और मुखौटा दोनों को सोच बदलनी होगी। काम करने का ढर्रा बदलना होगा और रूढ़िवादी सोच को त्यागकर सर्वजनहिताय, सर्वजन सुखाय की नीति का अनुसरण करने के साथ ही वसुधैव कुटुंबकम के सिद्धांत का अनुपालन करना होगा। तभी इस प्रजातांत्रिक देश में उसे राजपद मिलेगा। यदि उसने ऐसा नहीं किया, तो उसे जब तक इस देश में लोकतंत्र रहेगा, तब तक राजपद नहीं मिलेगा।’

रविवार, 27 अप्रैल 2014

यह विकास नहीं, विनाश लीला है

विश्वत सेन

हमरे बदरू मियां की कुंभकर्णी नींद टूटी तो वे बौखला गये. बौखलाहट में घरैतिन को भला-बुरा कहा, बच्चों को लपड़बताशा खिलाया और मेमनों पर डंडों की बारिश करायी. उनकी इस हरकत से सभी भौंचक थे. किसी को यह पता नहीं चल रहा था कि आखिर ये मेहरबानी किस बात की? हिम्मत करके घरैतिन ने मेहरबानी का सबब पूछा, तो वे बिफर पड़े. उन्होंने कहा-‘गर्मी से मेरी नींद खुल गयी. आनेवाले समय में लाखों-करोड़ों का नुकसान होने जा रहा है. आसमानी गर्मी, राजनैतिक गर्मी और बातूनी गर्मी से चुनावी सरगर्मी की तपिश बढ़ गयी है. इसका तो तुम लोगों को अंदाजा ही नहीं है.’
घरैतिन ने दोगुने गुस्से में कहा-‘सत्यानाश हो तुम्हारी नींद का. तुम्हें गर्मी सता रही है और तुम हमें. ऐसी कमाई को लुटेरे लूट ले जायें, तो अच्छा. मैं सत्ता की सीढ़ी पर चढ़कर सोनम्मा को मोदीचूर का लड्डू चढ़ाऊंगी.’
घरैतिन की कुटीली बात सुनकर बदरू मियां का गुस्सा सातवें आसमान पर चढ़ गया. उन्होंने बघिया चिग्घाड़ लेते हुए कहा-‘तुम्हें क्या पता है कि इस समर में गर्मी पैदा करने के लिए हजारों करोड़ रुपये दांव पर लगे हैं और तुम हो कि बस.’ घरैतिन ने उनसे भी दोगुने शेरनी दहाड़ में जवाब देते हुए कहा-‘इन हजारों करोड़ रुपये से मेरा क्या? मेरे लिए तो सोनम्मा ही बेहतर है. तुम्हारे लिए यह चुनावी सरगर्मी की तपिश मजेदार होगी. लोग जितना ज्यादा तड़पेंगे, तुम्हें उतना ही मजा आयेगा. मगर घर का चुल्हा-चौका गर्मी या फिर ख्याली पुलावों से नहीं चलता. चुल्हा-चौका खाद्यान्नों, घर की आमदनी और आपसी प्रेम से चलता है. तुम लोगों ने आज तक किया ही क्या है? सिवाय देश को कभी जाति के नाम पर, कभी धर्म और संप्रदाय के नाम पर, कभी आरक्षण के नाम तो कभी रामजी की पुलिया के नाम पर तोड़ने के. तुम अपने दामन के दाग को कभी नहीं देखते, मगर विरोधियों के बिस्तर पर पड़े सिकन को झांकने में न तो शर्म आती है और न ही जमीर धिक्कारता है.’
घरैतिन की दलील के आगे बदरू थोड़ा नरम पड़े, पर गरमी नहीं छोड़ी. बोले-‘तुम्हें क्या पता कि बाहर इस गर्मी से कितना कोलाहल मचा है.’ तपाक से घरैतिन ने जवाब देते हुए कहा-‘हां, मुङो तो यह भी पता है कि इस कोलाहल में इक शांति भी है. यह शांति तूफान आने के की शांति है. मगर ध्यान रखना इस तूफान से आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक, मानसिक और पारिवारिक विनाश ही होगा. यह विकास लीला नहीं, विनाश लीला है, जो देश-समाज को गर्त में ढकेलेगा. भाई को भाई से, परिवार को परिवार से, जाति को जाति से और धर्म से धर्म को तोड़ेगी.’