बुधवार, 7 मई 2014

सुख के दिन न आये रे भैया, विपद के दिन आयो रे

विश्वत सेन

भारत की आधुनिक पत्रकारिता की एक बड़ी विडंबना है। देश में उदारवादी आर्थिक नीतियों के कारण अखबारों और मीडिया घरों की आमदनी बढ़ने के साथ ही संपादकों और प्रबंधन के लोगों की आय में बढ़ोतरी तो हुई, लेकिन निचले स्तर के पत्रकार और अन्य कर्मचारियों को अब भी औने-पौने वेतन पर ही काम करना पड़ रहा है। देश की सरकार ही नहीं, बल्कि मीडिया घराना भी अब बिना अदालती डंडा बरसाये अपने कर्मचारियों को आर्थिक लाभ देना नहीं चाहते। नौबत यहां तक पहुंच गयी है कि श्रमिक पत्रकारों की वेतन बढ़ोतरी के अदालती आदेश आने के बाद भी अखबारों के मालिक और मीडिया घराना अवमानना करने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे हैं। 

देश के लाखों पत्रकारों की माली हालत सुधारने के लिए जीएस मजीठिया की अध्यक्षता में गठित आयोग ने वर्ष 2011 में सरकार से सिफारिश की। मजीठिया आयोग की सिफारिश के आधार पर सरकार ने अधिसूचना जारी कर दी। इस अधिसूचना के विरोध में देश के बड़े मीडिया घरानों ने सुप्रीम कोर्ट की शरण गही. सुप्रीम कोर्ट ने इन मीडिया घरानों को फटकारते हुए अप्रैल के अंत तक मजीठिया आयोग की सिफारिशों के आधार पर अखबारों में वेजबोर्ड गठित कर वेतन बढ़ोतरी और 2011 से एरियर का लाभ देने की हिदायत दी। 

अदालत की ओर से कहा यह गया था कि सात मई, 2014 तक देश के अखबारों की ओर से पत्रकारों के खातों में बढ़े हुए वेतन के साथ एरियर की पहली भेज देनी चाहिए। आज सात मई समाप्त होने को है, मगर देश के अखबारों में टाइम्स ऑफ इंडिया, नवभारत टाइम्स, अमर उजाला, द हिंदू, आनंद बाजार पत्रिका आदि को छोड़ कर बाकी हिंदुस्तान, दैनिक जागरण, दैनिक भास्कर, राष्ट्रीय सहारा, रांची एक्सप्रेस, प्रभात खबर, राजस्थान पत्रिका, आज, देश बंधु, चौथी दुनिया, महानगर टाइटम्स, नवभारत, दबंग दुनिया सहित कई छोटे-बड़े अखबारों ने न तो वेजबोर्ड का गठन किया और न ही पत्रकारों और अपने कर्मचारियों को बढ़ा हुआ वेतन ही दिया। स्थिति यह है कि कई अखबारों ने तो अपने कर्मचारियों को अप्रैल महीने में मिलने वाला इन्क्रीमेंट भी नहीं दिया है। 

वहीं दूसरी ओर, जिन अखबारों ने तथाकथित तौर पर मजीठिया आयोग की सिफारिशों के आधार पर लाभ देने का ऐलान किया है, उनमें से ज्यादातर लोगों ने अप्रैल माह के इन्क्रीमेंट को ही मजीठिया का लाभ बता दिया है। नवभारत टाइम्स में तो कॉन्ट्रैक्चुअल पत्रकारों को मजीठिया की श्रेणी में भी शामिल नहीं किया गया है। 

यह पहला मौका नहीं है, जब देश के पत्रकारों के वेतन तय करने के लिए सरकार की ओर से आयोग का गठन किया गया है। मजीठिया आयोग के पहले देश की सरकारों ने पत्रकारों के वेतन तय करने के लिए पालेकर आयोग, बछावत आयोग, मणिसाणा आयोग का भी गठन किया था। इसके पहले वर्किग जर्नलिस्ट एक्ट-1955 बनाया गया और इससे भी पहले औद्योगिक विकस अधिनियम संसद से पास किया गया। 

गौर करने वाली बात यह भी है कि जब-जब सरकार की ओर से पत्रकारों का वेतन तय करने के लिए आयोग का गठन किया गया, देश के अखबारों के मालिकों और उसके नीति-निर्धारक तत्वों ने ऐतराज जाहिर किया।यहां तक कि ज्यादातर अखबारों के मालिकों ने सरकारी और अदालती आदेशों की नाफरमानी ही की। हां, यह बात दीगर है कि अखबारों के मालिकों को अपने संपादकों और प्रबंधकों को लाखों रुपये वेतन देने में ऐतराज नहीं है। वहीं, जब निचले स्तर के कर्मचारियों के वेतन में वृद्धि की बात आती है, तो उनकी मरी हुई नानी दोबारा मर जाती है। 

यह जानकर हैरानी होती है कि देश के कई अखबारों के संपादकों की तनख्वाह हजारों में नहीं, बल्कि लाखों में है। उनके सुख-सुविधा पर कंपनी की ओर से भारी-भरकम रकम खर्च की जाती है, वो अलग से। जितनी तख्वाह एक संपादक को दी जाती है, उतने में कम से कम 50 से भी ज्यादा निचले स्तर के कर्मचारी 25-50 हजार मासिक वेतन के आधार पर रखे जा सकते हैं।

दूसरी बात यह भी है कि अखबारों के मालिकों को निचले स्तर के पत्रकारों और कर्मचारियों को वेतन बढ़ाने में तब दिक्कत हो रही है, जबकि उन्हें कागज कोटे में रियायती दरों पर मिलता है। छपाई के लिए स्याही से लेकर प्रिंटर तक कोटा ही कोटा है। यहां तक कि सरकार की ओर से विज्ञापन भी कोर्ट में भरपूर दिया जाता है। फिर भी अखबारों के मालिकों को उसका लाभांश अपने कर्मचारियों में वितरित करने में हिचक हो रही है। 

इससे बड़ी बात और क्या हो सकती है कि अपनी ही बिरादरी का आदमी, जो कभी रिपोर्टर, उप संपादक और समाचार संपादक था, आज संपादक बनने के बाद अपने ही लोगों का खून चूसने के लिए तरह-तरह का तिलिस्म रचता है। इसे संपादकों और मालिकों की सामंती सोच नहीं कहेंगे, तो और कया कहेंगे। 

विडंबना यह भी है कि जब देश में महिलाएं दलित, अल्पसंख्यक और अन्य दूसरे समुदाय के लोग समस्याग्रस्त होते हैं, तब यहां की राजनेता अपनी राजनीति चमकाने लगते हैं। आज देश का चौथा स्तंभ और देश-समाज के लोगों की समस्याओं को सरकारों के सामने उजागर करने वाले ही वर्षो से समस्याग्रस्त हैं। फिर देश का कोई राजनेता अथवा संस्था, यहां तक कि खुद पत्रकारों की हितैषिणी संस्थाएं उनका साथ देने को तैयार नहीं है। इससे बड़ी बात और क्या हो सकती है कि पत्रकारों की सबसे बड़ी संस्था प्रेस क्लब ऑफ इंडिया भी देश के श्रमिक पत्रकारों को मजीठिया का लाभ दिलाने की दिशा में कोई ठोस कदम नहीं उठा रहा है। 

मंगलवार, 29 अप्रैल 2014

यह तप की या तपिश की है लाली

विश्वत सेन

हमरे बदरू मियां एक फूल की टहाटह लाली को देखकर काफी बेचैन हैं। उनका पेट गुड़गुड़ा रहा है, अपच हो रहा है और वाक्यबमन तक की स्थिति बन गयी है. लेकिन वह इस टहाटह लाली की बात कहें, तो किससे? यह एक बहुत बड़ा सवाल था। अली भाई विदेश गमन पर थे, हरिया, होरी और कमली अपने-अपने कामों में व्यस्त थे और नरहरी कहीं दिखाई नहीं दे रहे थे। स्वभाव से बदरू मियां पुरातन युग के देवताओं के संवदरिया नारद मुनि के अनुयायी, सृष्टि के पहले टंकक और सभी देवताओं में सबसे आगे पूजे जाने वाले भगवान श्री गणोश और विद्या की अधिष्ठात्री देवी मां शारदे के साधक रहे हैं। नारद मुनि के अनुयायी होने के नाते उनके पटे में औरतों की तरह बात पचती नहीं है और यही गुणावगुण उन्हें परेशान किये हुए है।

कई दिनों के इंतजार के बाद अली भाई की स्वदेश वापसी हुई। जैसे ही उन पर बदरू मियां की नजर पड़ी, भूखे भेड़िये की तरह बदरू मियां उन पर झपट पड़े। अली भाई को देखते ही चिल्लाने लगे-‘अरे, भइवा हो, भइवा। एतना दिन कहां रहे। न कोई संदेश, न कोई खोज खबर।’

अली भाई चूंकि बदरू मियां के पैजामी यार थे, इसलिए वे फटाक से समझ गये कि वे क्यों हाल-चाल पूछ रहे हैं। उन्होंने कहा-‘पेट गुड़गुड़ा रहा है क्या?’ बदरू-‘अरे भई, तुम भी पक्के लाल बुझक्कड़ ही हो।’ उन्होंने आगे कहा-‘भाई का बतायें। इस गर्मी में हमने टहाटह लाल आठ पंखुड़ियों वाले खिले हुए एक फूल को देखा है।’
अली भाई-‘तो! इसमें आश्चर्य की कौन सी बात हो गयी? हमरे यहां तो किसिम-किसिम के फूल हर मौसम में खिलते ही रहते हैं।’

बदरू-‘अरे भाई, तुम निरा निठल्ले के निठल्ले ही रहोगे। हम जिस फूल की बात कर रहे हैं, वह गर्मी के मौसम में खिला है। जबकि आम तौर पर गर्मी के मौसम में धूप की तपिश से पृथ्वी की हरियाली झुलस जाती है। फिर यह टहाटह लाल फूल कहां से आया?’ उन्होंने आगे कहा-‘भाई, सोचने वाली बात यह नहीं है कि वह गर्मी के दिन में खिला है। सवाल यह है कि उसकी यह लाली किसी तप की लाली है, धूप से निकली तपिश की लाली है या फिर प्राकृतिक लाली है?’
बदरू मियां की यह बात सुनकर अली भाई का दिमाग चकराया। उन्होंने झल्लाते हुए कहा-‘मियां, तुम हिंदी की छायावादी विधा में वास्तविक बात को छिपाकर व्यंजना में बात करना बंद करो। जो भी कहना है साफ-साफ कहो।’

बात की गाड़ी पटरी से उतरते देख बदरू मियां ने पाला बदला। बॉलीवुड के अभिनेता जीवन के कुटिल अदा वाले अंदाज में उन्होंने समझाते हुए कहा-‘देखो भाई, इस समय चुनाव के साथ ही गर्मी का भी मौसम है। इस मौसम में पूरे देश में एक ही फूल टहाटह लाल है। इस लाली में उसकी तप की, प्रकृति की, धूपिया तपिश या फिर किसी तीसरी शक्ति की लाली समायी हुई है।’

अली भाई उनके कथनों के निहितार्थ को समझ गये। उन्होंने समझाते हुए लहजे में कहा-‘बदरू मियां, वस्तुत: इसमें आपने जितने प्रकार की लाली की बात कही, उन सभी का इसमें सम्मिश्रण है।’ उन्होंने कहा-‘इस प्रतीकात्मक फूल की लाली को बरकरार रखने, राजयोगी कुंडली बनाने और राजपद प्रदान कराने के लिए कई सालों से तप कोई और कर रहा है। तप करने वालों की मंडली में लाखों लोग शामिल हैं और उनके तप का यशबल इसे लगातार प्राप्त हो रहा है। इसलिए यह खुद के नहीं, दूसरे के तप बल से लाल है।’

अली भाई अपनी बात जारी रखते हुए बोले-‘इसे हम दूसरे शब्दों में उधारी तप की लाली भी कह सकते हैं। मान लीजिए कि पुराने जमाने में हमारे यहां ऋषि-मुनि अपने शिष्यों के साथ वनों में आश्रम बनाकर तप करते और करवाते थे। इसके साथ ही, अपने शिष्यों को गार्हस्थ जीवन से लेकर सृष्टि के तमाम नियम-कानूनों का अध्ययन भी कराते थे। वैसे ही कलियुग में एक संस्था है, जो ऋषि-मुनियों सरीखा ब्रह्मज्ञान रखने वाला तप कर रहा है और उसके शिष्य अविवाहित रहते हुए राजमार्ग पर आगे बढ़ जाते हैं।’

बीच में टोकते हुए बदरू मियां ने कहा-‘यह बात तो ठीक है और हम समझ भी गये। लेकिन और दूसरी लाली?’

इस सवाल के जवाब में अली भाई ने कहा-‘देश-दुनिया में रहने के कारण प्राकृतिक रंग तो उसमें होगा ही और धूप की तपिश भी उसके ऊपर पड़ना तय है। इसलिए यह दोनों प्रकार की लाली भी संभव है। लेकिन एक बात और जान लो। तुम जिस लाली की बात कर रहे हो, वह बल का प्रतीक है और राजपद सिर्फ बल से ही प्राप्त नहीं होता। इसके लिए हरियाली, प्रगति, विकास, सच्चई, बल, कल और छल की भी दरकार होती है। इसीलिए बारंबार प्रयास करने के बाद भी इस फूल को लाली प्रदान करने वाले और उसके दूसरे धड़े को सालों से राजपद नहीं मिल पा रहा है। इसकी वजह यह है कि जो तप कर रहा है, उसने राजपद पाने के लिए एक दूसरा धड़ा भी तैयार किया है, जो उसका राजनीतिक मुखौटा है। तपी और मुखौटा दोनों राजनीति के बाकी अंगों को छोड़कर सिर्फ बलवती विधा को ही अपना रहे हैं। देश को अक्षुण्ण और अखंड बनाने के नाम पर देश को खंडित करने का काम कर रहे हैं। तपी जो दिशा-निर्देश जारी करता है, मुखौटा उसका अनुपालन नहीं करता है और सबसे अहम बात यह कि तपी भी वहमी और अहमी है। वह भी बल का पुजारी है। वह भी भारत के वसुधैव कुटुंबकम के सिद्धांत को तोड़कर किसी संप्रदाय और धर्म विशेष को लेकर ही चल रहा है। इसलिए उसे राजपद पाने में सफलता नहीं मिल रही है। हालांकि गलती से एक बार कुछ सालों के राज सिंहासन पर आरूढ़ हुआ था, लेकिन सत्ता पर आसीन होते ही तपी और मुखौटे में घमंड आ गया। इसलिए उसे लोगों ने पसंद करना ही छोड़ दिया।’

अली भाई का भाषण सुनने के बाद बदरू मियां ने एक अच्छे शिष्य की तरह सवाल किया। बोले-‘तो फूल को राजपद कैसे मिलेगा?’

अली भाई बोले-‘तपी और मुखौटा दोनों को सोच बदलनी होगी। काम करने का ढर्रा बदलना होगा और रूढ़िवादी सोच को त्यागकर सर्वजनहिताय, सर्वजन सुखाय की नीति का अनुसरण करने के साथ ही वसुधैव कुटुंबकम के सिद्धांत का अनुपालन करना होगा। तभी इस प्रजातांत्रिक देश में उसे राजपद मिलेगा। यदि उसने ऐसा नहीं किया, तो उसे जब तक इस देश में लोकतंत्र रहेगा, तब तक राजपद नहीं मिलेगा।’

रविवार, 27 अप्रैल 2014

यह विकास नहीं, विनाश लीला है

विश्वत सेन

हमरे बदरू मियां की कुंभकर्णी नींद टूटी तो वे बौखला गये. बौखलाहट में घरैतिन को भला-बुरा कहा, बच्चों को लपड़बताशा खिलाया और मेमनों पर डंडों की बारिश करायी. उनकी इस हरकत से सभी भौंचक थे. किसी को यह पता नहीं चल रहा था कि आखिर ये मेहरबानी किस बात की? हिम्मत करके घरैतिन ने मेहरबानी का सबब पूछा, तो वे बिफर पड़े. उन्होंने कहा-‘गर्मी से मेरी नींद खुल गयी. आनेवाले समय में लाखों-करोड़ों का नुकसान होने जा रहा है. आसमानी गर्मी, राजनैतिक गर्मी और बातूनी गर्मी से चुनावी सरगर्मी की तपिश बढ़ गयी है. इसका तो तुम लोगों को अंदाजा ही नहीं है.’
घरैतिन ने दोगुने गुस्से में कहा-‘सत्यानाश हो तुम्हारी नींद का. तुम्हें गर्मी सता रही है और तुम हमें. ऐसी कमाई को लुटेरे लूट ले जायें, तो अच्छा. मैं सत्ता की सीढ़ी पर चढ़कर सोनम्मा को मोदीचूर का लड्डू चढ़ाऊंगी.’
घरैतिन की कुटीली बात सुनकर बदरू मियां का गुस्सा सातवें आसमान पर चढ़ गया. उन्होंने बघिया चिग्घाड़ लेते हुए कहा-‘तुम्हें क्या पता है कि इस समर में गर्मी पैदा करने के लिए हजारों करोड़ रुपये दांव पर लगे हैं और तुम हो कि बस.’ घरैतिन ने उनसे भी दोगुने शेरनी दहाड़ में जवाब देते हुए कहा-‘इन हजारों करोड़ रुपये से मेरा क्या? मेरे लिए तो सोनम्मा ही बेहतर है. तुम्हारे लिए यह चुनावी सरगर्मी की तपिश मजेदार होगी. लोग जितना ज्यादा तड़पेंगे, तुम्हें उतना ही मजा आयेगा. मगर घर का चुल्हा-चौका गर्मी या फिर ख्याली पुलावों से नहीं चलता. चुल्हा-चौका खाद्यान्नों, घर की आमदनी और आपसी प्रेम से चलता है. तुम लोगों ने आज तक किया ही क्या है? सिवाय देश को कभी जाति के नाम पर, कभी धर्म और संप्रदाय के नाम पर, कभी आरक्षण के नाम तो कभी रामजी की पुलिया के नाम पर तोड़ने के. तुम अपने दामन के दाग को कभी नहीं देखते, मगर विरोधियों के बिस्तर पर पड़े सिकन को झांकने में न तो शर्म आती है और न ही जमीर धिक्कारता है.’
घरैतिन की दलील के आगे बदरू थोड़ा नरम पड़े, पर गरमी नहीं छोड़ी. बोले-‘तुम्हें क्या पता कि बाहर इस गर्मी से कितना कोलाहल मचा है.’ तपाक से घरैतिन ने जवाब देते हुए कहा-‘हां, मुङो तो यह भी पता है कि इस कोलाहल में इक शांति भी है. यह शांति तूफान आने के की शांति है. मगर ध्यान रखना इस तूफान से आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक, मानसिक और पारिवारिक विनाश ही होगा. यह विकास लीला नहीं, विनाश लीला है, जो देश-समाज को गर्त में ढकेलेगा. भाई को भाई से, परिवार को परिवार से, जाति को जाति से और धर्म से धर्म को तोड़ेगी.’

शुक्रवार, 16 अगस्त 2013

आजादी आजाद हुई

आजादी आजाद हुई रे परवाने,
आ जल्दी वो भाग रही है अनजाने।
आजादी में है रहना जोर लगाओ,
आबादी से है कहना शोर मचाओ।
पीछे-पीछे दौड़ लगाओ पकड़ो तो,
जो बांहों में ताकत हो तो जकड़ो तो।
जो ना दौड़े तो न बनेंगे अफसाने,
आ जल्दी वो भाग रही है अनजाने।।

वीरों ने था जो पकड़ा खून बहा था,
अत्याचारों को सबने खूब सहा था।
गोली खाई थी सबने लाल मरा था,
अंग्रेजों ने भारत से माल भरा था।
जंजीरों में कैद रही थी हतभागी,
जंजीरों से मुक्त हुई तो उड़ भागी।
गांधी जी से जीवन जीना सब जाने,
आ जल्दी वो भाग रही है अनजाने।।

नेताओं ने था ललकारा तब जागे,
अंग्रेजों ने भारत छोड़ा सब भागे।
वो आजादी भाग रही है सब जानो,
बर्बादी भी जाग रही है तुम जानो।
लोगों की है फूट रही किस्मत देखो,
राहों में ही लूट रही अस्मत देखो।
आजादों से जन्म रहे हैं मनमाने,
आ जल्दी वो भाग रही है अनजाने।।

नेता जो मासूम बना घूम रहा है,
जैचंदों से चांद दिखा चूम रहा है।
कानूनों को ढाल बना के मदमाता,
मासूमों सा हाल बता के शरमाता।
संदेशों को ना समङो तो रब जाने,
आ जल्दी वो भाग रही है अनजाने।।

विश्वत सेन
अगस्त 15, 2013

शुक्रवार, 5 अप्रैल 2013

:::सुगंधा:::

"प्रहर्षिणी" छंद की कविता
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:::सुगंधा:::

उत्तप्त अधर अधीर हो रहा था,
पीने को जहर सुधीर हो रहा था।
ढाया जो कहर अमीर हो रहा था,
सारा ये शहर जमीर खो रहा था।।

कौमारी बदन यहां रही सुगंधा,
जोरों से रुदन करे वही सुगंधा।
आंखों से नित बहती निर्मल गंगा,
बातों से इक कहती कथा सुगंधा।।

प्रेमी की बनकर प्रेयसी सजी वो,
फूलों की सजकर सेज सी बिछी वो।
हंसा की बनकर हंसिनी रही वो,
हो प्रेमातुर तब संगिनी बनी वो।।

मार्ग प्रेम पर रती रती चली थी,
रातों में बनकर रोशनी जली थी।
पात्रों में बन मदगंध सी ढली थी,
बागों में इक मकरंद की कली थी।।

उत्तप्त अधर अधीर हो रहा था,
पीने को मदिर अचीर हो रहा था।
दो तंगी शिखर उतंग हो रहा था,
दो प्रेमी युगल निशंक हो रहा था।।

ज्वाला सा तन दहका जरूर ही था,
शोला भी इक भड़का समीर से था।
नीड़ों में तन उसका लुका-छिपा था,
फूलों से मन बहका खिला खिला था।।

बागों से मलयज को जरा चुराती,
पेड़ों के किसलय से सुरा बनाती।
प्राणों के प्रियतम को वही पिलाती,
सांसों में तब खुद को रही बसाती।।

प्राणों में वह जिसको रही बसाती,
बातों में वह उसको रखा फसादी।
सोची थी वह उससे रचाय शादी,
भागा था, तब डरके वही कुघाती।।

घातों के इस दुख से दुखी जवानी,
सालों से इस जग को कहे कहानी।
रातों में वह सबको कहे रवानी,
आंखों से सब उसको कहें जुबानी।।

रातों में इक दिन आ गया कुमारा,
दूजा था, पर वह था नहीं अवारा।
आते ही वह उससे मिला बिचारा,
बातों से दिल उसका भरा दुबारा।।

पायी जो सरसिज श्याम कोमलांगी,
लाली पाकर फिर वो खिला विभांडी।
माया सी जब कहने लगी शुभांगी,
जाया सी तब रहने लगी विभांगी।।

प्राणों के प्रियतम की हुई सुगंधा,
रातों के अब तम से गई सुगंधा।
आंखों से अब उसके बहे न गंगा,
जानूं के घर अपने बसी सुगंधा।।

नोट: यह कविता पिंगल शास्त्र में वर्णित प्रहर्षिणी छंद में रची गई है।
प्रहर्षिणी छंद का स्वरूप है:-

‘‘उत्तुंग, स्तन कलश द्वयोन्नतांगी,
लोलाक्षी, विपुल नितंब शालिनी च।
बिम्बोष्ठी, नर-वर मुष्टि-मेय-मध्या,
सा नारी, भवतु मन: प्रहर्षिणी ते।।’’

-विश्वत सेन
अप्रैल पांच, 2013

बुधवार, 20 मार्च 2013

करुणाकर

वल्कलधारी गंगधर सदा करें कल्याण।
पलपल तारें अंकधर सदाशिव भगवान।।

गरल अमित सम समझ के किए कंठ विषपान।
सरल सुधा सम जगत में जनमें सरल सुजान।।

हिमधर्म धर उठ उतंग जस फैला हिमालय।
मनधर्म धर उठ उतंग बन शैल करुणालय।।

हरित धर्म धर हरितवन हरित करे संसार।
सरिस धर्म धर हरित मन संकट हरें अपार।।

चौपाई:-
जन जड़मति मत करहु निधाना। हरहु कुमति देहु विज्ञाना।।
एहि छन वर देहु भगवाना। धन संपति बढ़े निधाना।।

मन संतोष दिवस नहि यामा। बिनु संपति बिगड़ै कामा।
मलिन मलेच्छ कहे सब तबहि। मनई हेठ दिखे तब जबहि।।

बिनु संपति नहि होय उद्योगा। बिनु संपति लगै नहि भोगा।।
जनि जड़मति करे ढिठाई। जानबूझ हंसे ठठाई।।

बोलई बात अति खिसियानी। बिनु बातहि बात लड़ानी।।
धरम कमर कर करूं उद्योगा। धन धार बनै नहि योगा।।

दली कपटी रहइ निज संगा। चहकि दहकि मरदइ अंगा।।
तट तड़ाग सोचूं तब बाता। दीन दिवस दिखावे दाता।।

ऐसा कर मन रचे विधाता। करम सो न बढ़े अख्याता।।
शतकोटि जनी मानस होई। विंश कोटि जनि अरु सोई।।

पंचकोटि धरनी पर बालक। अधकोटि बनै कुलघालक।।
अधकोटि तहि चमकै अकासा। पर उपकार करै परकासा।।

शतकोटि कृषक तहि भयऊ। धर धरणि लिपट जहि गयऊ।।
दश कोटि भए वाणिज्य वणिक। समकोटि करे राज अधिक।।

द्वादश कोटि मन के मालिक। जिन चरणन बरसे माणिक।।
शतकोटि जेहि करे किसानी। ताहि समान मोहि जानी।।

जिनके ढिग बैठे नहि कोई। लगे मलेच्छ जस कोई।।
दुरवासा सम करे आचरण। निज को सभ्य कहे जो जन।।

रक्त रुधिर सम बहे शरीरा। सभ्य समाज भेदै गिरा।।
अरथ न कामहि सम बटवारा। समरथ सब लगावे पारा।।

सकल जगत फैली खुदगजी। सब मिल करई मनमरजी।।
भोलेनाथ सुनौं मम बानी। शीघ्र उठाहु अब पानी।।

जन-जन के दुख हरौं पुरंदर। जगत के कल्याण सुंदर।।
सम समाज सुंदर करौं शंकर। जगत पिता हे जगदीश्वर।।

दोहा:-
मनुज बन करहु मनुज के अबहिं रक्षा भरतार।
मनुज बनवाहु दनुज के करुणाकर करतार।।

-विश्वत सेन
मार्च 20, 2013

बुधवार, 13 मार्च 2013

बइयां ना मरोड़ (होली गीत)

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बइयां ना मरोड़, अरे बरजोर,
बलमवा झटका लागै न।
पइयां ना पड़ूं तोहे करजोर,
बलमवा फटका मारै न...2

झटका लागई ना रे सजनवा,
मोहे फटका लागै ना।
खटका लागई मन में सजनवा,
मोहे लटका मारै ना।
कलइया न मरोड़ अरे चितचोर,
सजनवा कचका मारै न...
बइयां न मरोड़ अरे बरजोर,
बलमवा झटका लागै न...2

जौं मोहे झकझोरे सजन मोरि,
गले से अंगिया खिसके ना।
जौं पकड़ो बरजोर बलम मोरी,
सिर से सारी सरके ना।
अंगिया न निचोड़ अरे चितचोर,
सजनवा लाजो लागै न...
होरिया में करो नाहि हरहोर,
सजनवा डरवा लागै न...
बइयां न मरोड़ अरे बरजोर,
बलमवा झटका लागै ना...2

डरवा लागई ना रे बलमवा,
मोहे डरवा लागै ना।
जीयरा कांपै थर-थर सजनवा,
मोहे देहिया कांपै ना।
नेहिया मत जोड़, अरे चितचोर,
सजनवा रहिया ताकूं न...
बइयां न मरोड़, अरे बरजोर,
बलमवा झटका लागै ना...2



-विश्वत सेन
मार्च 13, 2013
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