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गुरुवार, 21 अप्रैल 2016

...और जब अंगूरी तड़ीपार हो गयी

विश्वत सेन
बिहार के मुख्यमंत्री सुशासन बाबू कहते हैं कि नासपीटी, अंगूर की इस बेटी ने उनके सूबे के लोगों को नशे में सराबोर करके जिंदगियों को बरबाद करके रख दिया है। वह गरीबों की जिंदगी को लील रही है। लोग दारू पीकर अपनी घरैतिन को पीटते हैं। बच्चों को दाने-दाने के बिना तरसाते हैं। अपनी कमाई का ज्यादातर हिस्सा अंगूर की बेटी को भेंट कर आते हैं। वे इतना ही नहीं कहते, बल्कि ये भी कहते हैं कि इसी अंगूर की बेटी ने बिहार के लोगों को बिगाड़कर अपराधी बना दिया। इसी नासपीटी की वजह से उनके शासन में अपराध के ग्राफ बढ़ रहे हैं। अचंभा तो तब होता है, जब वे यह कहते हैं कि पटना के श्रीकृष्ण हॉल में एक चुनावी कार्यक्रम के तहत एक महिला ने उनसे सूबे में बढ़ते शराब के चलन और उससे होने वाले नुकसान को देखते हुए उसे पूरी तरह बंद करने की गुजारिश की। इस कपोलकल्पित कहानी को सुशासन बाबृ ने हकीकत में बदल दिया और राजस्व के नुकसान की परवाह किये बिना एक अप्रैल, 2016 से बिहार में पूर्ण शराब बंदी का ऐलान कर दिया।
शराब दिल, लीवर और फेफड़ों को जलती है। इसके साथ ही लोगों के घरों को भी फूंक देती है। इसे पीने वाला सेवन करने के पहले तक लोगों को इससे दूर रहने की नसीहत देता है, लेकिन शाम ढलते ही रगों में कीड़े कुलबुलाने शुरू हो जाते हैं और दिन में नसीहत देने वाला देर रात तक मधुशाला में नजर आता है। मतलब साथ है कि जैसे शराब में घमंड नहीं है, वैसे ही शराब के सेवन करने वाले भी घमंडी नहीं होते। कसम खाते हैं, मगर अहम में उस पर अड़े भी नहीं रहते। मौका पाते ही कसम तोड़कर पहले वह काम करते हैं, जिसकी जरूरत होती है। दूसरा, जैसे शराब अमीर-गरीब और गंदगी और सफाई में फर्क नहीं करती, वैसे ही शराब के पुजारी अमीर-गरीब में फर्क नहीं समझते। समाजवाद का असली नजारा देर रात तक मयखाने में ही देखने को मिलता है। तीसरा, जैसे शराब कभी भी अपनी नशा चढ़ाने के लक्ष्य को नहीं भूलती, वैसे ही शराबी कभी अपने लक्ष्य को कभी नहीं भूलते। अंगूर की बेटी को हलक से उतारने के बाद चाहे नशा कितना भी चढ़ा हो, पहला लक्ष्य घर पहुंचने का होता है। इसका मतलब साफ है कि शराब और शराबी कभी अपने लक्ष्य से भटकते नहीं हैं। यह शराब का सामाजिक सरोकार है। सामाजिक सरोकार के इनते अधिक फायदे रखने के बाद भी बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार इसे अछूत मानकर अपने राज्य से तड़ीपार कर दिया।
आज अंगूर की बेटी अंगूरी को तड़ीपार हुए करीब 20 दिन हो गए हैं। इन 20 दिनों में पूरी दुनिया देख रही है कि बिहार में अपराध का ग्राफ पहले की ही तरह बरकरार है। लोगों के घर शराबी पतियों की वजह से नहीं, गरमी की आग से झुलसकर खाक हो रहे हैं। अब अंगूरी उत्पात नहीं मचा रही, बल्कि वे लोग तांडव कर रहे हैं, जिन्होने शराब बंदी के बाद सुशासन बाबू की तारीफ के पुल बांधे थे। अब बिहार और बिहारियों की नजर में अपराध नहीं हो रहा है। पूर्णत: शराब बंदी के बाद अपराध भी पूरी तरह समाप्त हो गया। अब बिहार में अपराध नहीं, राजनेताओं औ सियासतदानों का तांडव हो रहा है और सूबे में तांडव कर रहे हैं पालित-पोषित घाघ अपराधी। पीने वाले अब भी बाहर से मंगाकर पी रहे हैं। शराब और शराबी अमीर-गरीब में फर्क नहीं करता, लेकिन सरकार और सुशासन बाबू अमीर-गरीब फर्क कर रहे हैं। पैसे वाले पहले भी शराब की बहती गंगा में गरीबों को बदनाम करके शराब छलकाते थे। अब जबकि बिहार में शराब का सूखा पड़ा है, तब भी पैसे की गंगा बहाकर जाम छलका रहे हैं। सही मायने में महरूम तो वह बेचारा गरीब हो गया, जो दिनभर हाड़तोड़ मेहनत करने के बाद शाम को बदन का दर्द मिटाने के लिए अंगूरी की आगोश में चला जाता था। अब यदि दिनभर हाड़तोड़ मेहनत करने के बाद जब घरैतिन अपने आगोश में लेने के बजाय शाम को खरी-खोटी सुनाएगी, तो भला कौन इंसान ऐसा नहीं होगा, जो आगोश में जाने के लिए विकल्प की तलाश नहीं करेगा। सो, उसने किया, मगर उसकी घरैतिन और नासपीटी सुशासन बाबू की सरकार को वह भी नहीं सुहाया। 
सुशासन बाबू चाहे जितनी अपनी पीठ थपथपा लें, चाहे वह सूबे की घरैतिनों की चाहे जितनी वाहवाही ले लें, लेकिन इतना तय है कि बिहार के लाखों बेवड़ों की हाय उन्हें जरूर लगेगी। इन साफदिल और संगदिल बेवड़ों की हाय जब लगेगी, तो कहीं ऐसा न हो कि पांच साल बाद घरैतिनों का वोट मिलने के पहले ही उनकी सरकार भी तड़ीपार न हो जाए।

रविवार, 13 मार्च 2016

व्यापक होता रहा है ट्रिपल एस

विश्वत सेन
ट्रिपल एस (सेक्स, स्कैंडल एंड सिक्योर या सेक्स, सेंसेशन एंड सिक्वल) के फॉर्मूले को जिस किसी ने भी गढ़ा है, बड़ा ही नेक काम किया है. पहले इस फॉर्मूले को एक खास वर्ग द्वारा उपयोग किया जाता था, मगर आज यह सार्वभौमिक हो गया है. किसी भी क्षेत्र में नजर उठाकर देख लीजिए ट्रिपल एस का फॉर्मूला व्यापक तरीके से नजर आता है. ताज्जुब तो तब होता है, जब धार्मिक कार्यों में भी इसका उपयोग किया जाने लगा है. हालांकि, पहले भी इसका उपयोग होता रहा है, लेकिन किसी कार्यक्रम को खास बनाने के लिए तो यह खास तौर पर उपयोग किया जाता है. भाई, उपयोग आखिर क्यों न किया जाए. जमाना ही इसका है. युवाओं को आकर्षित करना है, तो इसका तड़का लगाना ही होगा, अन्यथा कोई भी कार्यक्रम नीरस हो जाएगा. सबसे बड़ी बात यह है कि इस ट्रिपल एस फॉर्मूले में एक एस का उपयोग प्राय: अपने फायदे के लिए किया जाता है.