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बुधवार, 27 अगस्त 2014

अब नहीं रहेगी भाजपा में नेताओं की पहली पंक्ति

विश्वत सेन
भारत में जनसंघ से लेकर भारतीय जनता पार्टी के उत्थान तक देश के ये तीन कद्दावर नेता अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी पहली पंक्ति के नेता कहे जाते रहे। छह अप्रैल, 1980 को अस्तित्व में आने के बाद से पार्टी के उत्थान में इनकी भूमिका अहम रही है। समय की मांग और संघ के जोर के बाद आखिरश: इन्हें पार्टी की मुख्यधारा से हटाकर हाशिये पर ला दिया गया। मूलत: यह अमित शाह की अध्यक्षता में जो काम अभी हो रहा है, इसका बीजारोपण वर्ष 1999 के बाद से ही शुरू हो चुका था। उस समय भी कहा यह जा रहा था कि पार्टी में पहली पंक्ति के नेता दूसरी और तीसरी पंक्ति के नेताओं को पनपने नहीं दे रहे हैं और इसी का परिणाम है कि पार्टी के कार्यकर्ताओं में रोष है। पार्टी में वह काम नहीं हो रहा है, जो नये कार्यकर्ताओं के जोश के माध्यम से होना चाहिए। पार्टी के मुख्य पदों पर पहली पंक्ति के ही नेताओं से रसूख रखनेवालों को तवज्जो दी जा रही थी। अब जबकि पार्टी अध्यक्ष पद पर अमित शाह पदासीन हैं, तो उन्होंने संघ के फरमानों को सिर माथे पर बिठाते हुए पहली पंक्ति के नेताओं पूर्व प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी वाजपेयी, पूर्व उप प्रधानमंत्री लाल कृष्ण आडवाणी और पूर्व केंद्रीय मंत्री मुरली मनोहर जोशी को हाशिये पर लाकर पटक दिया।
दरअसल, वर्ष 1951 में डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के द्वारा जनसंघ से लेकर भारतीय जनता पार्टी के उदय तक इसकी पहली पंक्ति के नेताओं में डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी, दीनदयाल उपाध्याय, अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी और मुरली मनोहर जोशी सर्वमान्य रहे हैं। जनसंघ की स्थापना राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की राष्ट्रवादी विचारधारों को सत्ता के गलियारों तक पहुंचाने के लिए ही किया गया था। इसका मुख्य उद्देश्य राजनीतिक दल के रूप में देश की राजनीति में अपनी पैठ बनाना था। इसकी स्थापना के कुछ वर्ष डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी का आकस्मिक निधन के बाद इसे आगे बढ़ाने की जिम्मेदारी दीनदयाल उपाध्याय के कंधों पर आ गयी थी। जनसंघ के समय में भी मुखर्जी और उपाध्याय के बाद वाजपेयी, आडवाणी और जोशी का भी महत्वपूर्ण स्थान था। 1968 में जब पंडित दीनदयाल उपाध्याय की हत्या कर दी गयी, तो जनसंघ की बागडोर अटलजी को सौंप दी गयी और तब से लेकर भारतीय जनता पार्टी के गठन तक उसकी जिम्मेदारी उन्होंने बखूबी निभायी।
वर्ष 1980 के बाद से लेकर करीब डेढ़ दशकों के लंबे संघर्ष के बाद वर्ष 1996 में सत्ता में दखल देने के लायक भारतीय जनता पार्टी को सफलता मिली, तो इसकी पहली, दूसरी और तीसरी पंक्ति के नेताओं की खुशी का ठिकाना नहीं था। वर्ष 1996 में जब 13 दिन के लिए अटल जी की सरकार बनी, तो सभी सहमत थे, लेकिन वर्ष 1998 में दोबारा चुनाव होने के बाद पार्टी को सफलता मिलने और मजबूती के साथ सत्तासीन होने के बाद पार्टी की अंदरुनी स्थिति बिगड़ने लगी। यही वह समय था, जब दूसरी और तीसरी पंक्ति के नेताओं ने पहली पंक्ति के दो नेता अटल बिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी को हाशिये पर लाने की मुहिम छेड़ दी। इन्हीं नेताओं की भितरघाती रवैये का नतीजा रहा कि वर्ष 2004 के चुनाव में पार्टी को कई दलों के साथ गठबंधन के बावजूद हार का सामना करना पड़ा। हालांकि इस हार में पार्टी और राजग सरकार की नीतियां भी जिम्मेदार रही हैं, लेकिन मुख्य भूमिका भितरघातों की रही है। वर्ष 1998 से लेकर 20014 तक के अथक प्रयासों के बाद आखिरश: दूसरी और तीसरी पंक्ति के नेताओं को सफलता मिल ही गयी और उन्होंने संघ के साथ जुगलबंदी तथा भितरघातियों के साथ गोलबंदी करके इन तीनों नेताओं को पार्टी की मुख्यधारा से दरकिनार कर ही दिया।

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विश्वत सेन
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