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सोमवार, 25 जून 2012

वोट बैंक की सुरंग में मासूमों की बलि

विश्वत सेन
हरियाणा और देश के दूसरे राज्यों में वोट बैंक की राजनीति को चमकाने के लिए सुप्रीम कोर्ट के आदेशों को धता बताते हुए धरती का सीना चीर कर सैकड़ों फुट नीचे तक बोरवेल की सुरंग खोदी जा रही है और इसमें चढ़ाई जा रही है मासूमों की बलि। खुलेआम ताल ठोंककर प्रशासनिक अमले के सामने और उनकी मिलीभगत से बोरवेल खोदा जाता है और सरकार के नुमाइंदे ही मासूमों के जमींदोज होने पर उसे ईश्वर का कानून मानकर उन्हें मरने के लिए छोड़ देते हैं। मानेसर के खोह गांव में हुआ माही हादसा इसका जीता-जागता उदाहरण है। यहां वोटों की सुरंग में मासूमों की बलि चढ़ाई जा रही है। सिर्फ दिखावे के लिए आपदा कोष के लाखों रुपये पानी की तरह बहा दिया जाता है, मगर तब भी नहीं बचाई जाती है मासूम की जान। उसे बचना भी नहीं था, क्योंकि बचाव कार्य शुरू ही किया गया ‘शी इज नो मोर’ मानकर।
हरियाणा के मानेसर का औद्योगिक क्षेत्र ‘इंडस्ट्रियल मॉडल टाउन’ दर्जनों गांवों के लोगों के लिए सोने के अंडे देने वाली मुर्गी साबित हो रहा है। इन गांवों के किसानों को जमीन के मुआवजे के रूप लाखों रुपये दिए गए। पैसा हाथ में आते ही किसान वाहन और आलीशान मकान के मालिक और व्यापारी बन गए। मानेसर, खोह, कासन, नेवादा, नखरौल, कादीपुर, नैनवाल, पटौदी, गारौली, गढ़ी हरसरू, बांसगांव, जमालपुर, बांसलांबी सहित दर्जनों ऐसे गांव हैं, जहां लॉजनुमा आलीशान मकानों में लाखों मजदूर भेड़-बकरियों की तरह रहते हैं।
एक अनुमान के मुताबिक, इन लॉजनुमा मकानों कम से कम सौ कमरे बने हैं। इन कमरों में नीरज उपाध्याय के परिवार जैसा परिवार या फिर एक कमरे में चार मजदूर रहते हैं। हर कमरे से कम से कम दो हजार रुपये किराए की वसूली और पानी का बिल अलग से। इन मकानों में पानी सरकारी सप्लाई का नहीं आता, बल्कि बोरवेलों का आता है। यह बोरवेल अवैध है। यह पंच, सरपंच, विधायक, सांसद, प्रशासनिक अधिकारी और कर्मचारियों की मिलीभगत से लगता है। इसके लिए मोटी रकम भेंट चढ़ाई जाती है। सांसद से लेकर निचले स्तर तक के कर्मचारियों को चढ़ावा मिलता है। तब सबका मुंह बंद हो जाता है। सांसद और जनप्रतिनिधि वोट की खातिर चुप हो जाते हैं, तो अधिकारी पैसे के लिए। गांवों की मूल आबादी पांच हजार, मगर वोटर लिस्ट में मतदाताओं की संख्या मूल आबादी से कहीं अधिक। जितने मजदूर, उतने मतदाता और उतनी अधिक कमाई। ऐसे में यदि जीवनदायी पानी के लिए मासूमों की बलि चढ़ भी जाती है, तो किसी को क्या फर्क पड़ता। सुप्रीम कोर्ट के आदेश की अवहेलना करके रोज बोरवेल खोदे जाते हैं और भविष्य में भी खोदे जाते रहेंगे। मासूमों की बलि जैसे आज चढ़ी है, वैसे ही कल भी चढ़ेगी।  जैसे आज टोपी फिराई जा रही है, वैसे ही ढकोसले कल भी होंगे। स्थिति भयावह होती है, तो होती रहे। किसी की जान जाती है, किसी का अपना खोता है, तो खोता रहे, धरती के इन यमदूतों को फर्क नहीं पड़ता। फर्क पड़ता है उसे, जिससे अपना जुदा हो जाता है। सारा जीवन अपनों के बिछुड़ने का गम सालता रहता है, मगर उन्हें कुछ नहीं सालता और न सालेगा। तब तक जब तक वोट बैंक की राजनीति होती रहेगी।
"आज समाज" के 26 जून 2012 के अंक में प्रकाशित मध्यलेख।